भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इस कल्पनाके बीज ऋग्वेदमें भी मिलते हैं। जैसे:— चक्षु मिले सूर्यमें प्राण वायुमें जा तू द्यौ या पृथ्वीमें धर्मानुसार । जा तू जलमें अथवा जहां चाहो रह नव-देह सह ओषधीमें ॥ अथवा— देहधारी आत्मा कभी न थकते आता जाता है अपने स्वभावसे । आता जाता है जो इस जगतमें संयोग वियोग युत स्व-शक्तिसे । रचा जिसने इसको न देखता यह रहता वह इससे गुप्त । किंतु देखता वह इसे सदैव तभी गर्भावृत हो भोगता (यह) दुःख । ऐसे मंत्र कहीं कहीं मिलते हैं। आगे उपनिषदोंमें इसका विकास देखनेको मिलता है। कठोपनिषदमें एक स्थान पर कहा गया है कि मनुष्य घासकी भांति सूखकर-वृद्ध होकर-मरता है और वैसे ही घासकी भांति पैदा होता है !" वैसे बृहदारण्यकमें कहा गया है "जैसे झिनगा घासकी एक पात छोड़ते समय दूसरे पात पर आंख गड़ाता है वैसे आत्मा एक देह छोड़ते समय दूसरी देह पर आंख गड़ाता है और उसमें प्रवेश करता है ।" "यह पुरुष काममय है। जैसी इच्छा करता है वैसे सत्कर्म या कुकर्म करनेवाला साधू या पापी होकर पैदा होता है !" ऐसे विचार कई स्थान पर आये हैं। ऐसी ही बातोंको लेकर "वासनानुसार कर्म, कर्मानुसार जन्म, तथा वासनाक्षयसे मोक्ष" जैसे कर्म-सिद्धांतोंका विकास हुवा। अनेक उपनिषद और गीतामें "कर्म तथा पुनर्जन्मका संबंध" स्पष्ट बताया गया है । भारतीय दर्शनोंमें भी "मोक्ष प्राप्त होनेतक मानवी जीव अपने अपने कर्मानुसार अनेक योनियोंमें भ्रमण करता रहता है !" यह सिद्धांत सांख्य, योग, न्याय, वेदांत, जैन, बौद्ध आदि दार्शनिकोंने स्वीकार किया है। इस विषयमें सांख्य कहता है "ऐसा कहना गलत है कि सर्व- व्यापक पुरुष एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है। निर्गुण पुरुषका पुनर्जन्म नहीं होता है किंतु सूक्ष्म-लिंग देहका पुनर्जन्म होता है। अंतःकरणचतुष्टय तथा इंद्रियां, उनकी तन्मात्राओंके तत्वोंसे आत्माकी चारों ओर लिंगदेहका सूक्ष्म कोष तैयार होता है। इस लिंगदेहके साथ आत्मा हृदया- काशमें रहता है। आकाश अंगुष्ठमात्र होनेसे लिंगदेह भी उतना ही होता है। इस लिंगदेहमें कर्म-संस्कार सुरक्षित रहते हैं। यही पुनर्जन्मके कारण होते हैं।" इस विषयमें जैनोंका मत इससे कुछ भिन्न है। जैनदर्शनके अनुसार कर्म जीवमें संपूर्ण रूपसे मिल जाता है। व्याप्त हो जाता है। इसलिये वही कर्म, जीवको संसार क्षेत्रमें खींच लाता है। जीवको इसी कर्मानुसार पुनर्जन्म मिलता है। सतत पुण्यकर्म करनेसे प्राप्त होनेवाले सम्यग्ज्ञानसे जीव जन्ममृत्युसे मुक्त होता है। किंतु बौद्ध-दर्शन आत्माको न मान कर भी पुनर्जन्म मानता है। बिना आत्माके पुनर्जन्म कैसे और किसका ? इस प्रश्नके उत्तरमें बौद्ध दार्शनिक कहते हैं। मनुष्यके कर्मका कभी नाश नहीं होता। उसका यथोचित फल-भोग भोगना ही पडता है। मनुष्यका वर्तमान जन्म उसके पूर्व-जन्मका फल है जैसे एक दीपकसे दूसरा दीपक जलता हुवा दीप-माल तैयार होती है। एक जन्मका कर्म दूसरे जन्मकी स्थिती निश्चित करता है। कर्मकी एकता अथवा अखंडताके कारण मृत जीव और नये जीवमें अभिन्नता रहती है। यही पुनर्जन्म है। १६५ परिशिष्ट ५