ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदृष्टिसे गिरनेका भाव पाप है। ऋग्वेद कालमें भी यह कल्पना थी। वहां पापको बंधन माना है ! वहां एक प्रार्थना है "जैसे बछड़ेसे रस्सी दूर करते हैं वैसे तू मुझे पापसे दूर कर ! क्यों कि बिना तेरे सामर्थ्यके आंख भी नहीं झपकती !" वहां पानीसे पापको धोनेकी प्रार्थना की है और अग्निसे पापको जलानेकी ! आगे शास्त्रज्ञोंने किन किन बातोंसे मनुष्य अपनी दृष्टिसे आप गिरता है उसका विचार करके उन सब बातोंको पापमें गिना और मनुष्यको उन उन बातोंसे दूर रहनेका आदेश दिया। जैसे माता शिशुको जहां जहां धोखा है वहांसे दूर रहना सिखाती है। इस शिक्षा पद्धति कारण पापके (१) प्रकीर्ण (२) अपाङ्क्तेय (३) मलिनीकरण (४) जातिभ्रंशकर (५) उपपातक (६) अतिपातक (७) महापातक ऐसे सात प्रकार बने। भिन्न भिन्न शास्त्र- कारोंने इसको भिन्न भिन्न नाम दिये हैं। धर्म शास्त्रोंमें अपनी तथा समाजकी निगाहोंसे गिरने या गिरानेके अनेक कारणोंकी लंबी सूची दी है। यह पापवृत्ति एक प्रकारसे मानसिक अनारोग्य है। जैसे कोई रोग पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवंशिक चलता है वैसे पापवृत्ति भी आनुवंशिक चलती है। इसलिये कहीं कहीं एकके पापमें दूसरेकी जिम्मेदारी भी बतायी गयी है। जैसे सेवकके पापमें स्वामी, प्रजाके पापमें राजा, शिष्यके पापमें गुरु, पुत्रके पापमें पिता, यजमानके पापके पुरोहित आदि। जैसे पाप आनुवंशिक वैसे ही आनुषंगिक भी होता है। जैसे छूतकी बीमारी। गुरूका अनुकरणरूप, अथवा राजाके अनुकरणरूप अथवा समाज धुरीणोंके अनुकरणरूपमें, पाप समाजमें फैलता है ! ऐसे समय ये महाजन कठोर दंडके भागीदार माने गये हैं। पाप, मनुष्यके, पर्या- यसे समाजके नैतिक तथा आत्मिक अधःपतनका कारण होता है। खास करके कोई तत्वज्ञान जब मनुष्यके पाप छिपाने अथवा पापके समर्थनका साधन बनता है तब तो दंभ बढ़ जाता है और वह समाजके पतनका-सर्वतोमुखी पतनका साधन बनता है। विश्वके सभी धर्म-शास्त्रोंमें पापका विचार किया गया है। आधुनिक बुद्धिवादियोंने इस पर अनेक प्रकारसे विचार किया है। कुछ लोगोंने इसकी अवहेलना भी की है। सामान्य जनताको नीतिमार्ग पर स्थिर रखने के लिये इस कल्पनाकी अत्यंत आवश्यकता है। तथा गुप्तपापोंको रोकनेके लिये ईश्वरीय शासनकी भी। बिना इसके दूसरा चारा नहीं। पुण्य—जैसे पाप वैसे पुण्य। जो भिन्न प्रकारका इष्टफल देता है वह पुण्य है। ऐसी पुण्य शब्दकी व्याख्या की है। साथ साथ "विहित कर्मसे उत्पन्न होनेवाला" ऐसा भी कहा गया है। जैसे पाप अपनी निगाहोंसे गिराता है और क्लेश देता है वैसे पुण्य अपनी निगाहोंमें उठाता है और मनको समाधान देता है। धर्मशास्त्रोंने जैसे अपनी निगाहोंसे गिरानेवाले कार्योंकी सूचि दी है वैसे उठानेवाले कार्योंकी भी सूचि दी है। पुण्यसे, विहित काम करनेसे, व्यक्ति तथा पर्यायसे समाजकी शक्ति बढ़ती है। किये हुए पुण्यका प्रचार करनेसे पुण्य नष्ट होता है। इसलिये उसका प्रचार न करनेका आदेश दिया है। पुनर्जन्म—यह भारतीय दर्शनका वैशिष्ट्य है। कुछ अपवाद छोड़ कर भारतके सभी दर्शन पुनर्जन्म मानते हैं। मृत्युका अर्थ मनुष्यका शरीरपात है। मनुष्यका शरीर छूटने पर भी उसके आत्माका नाश नहीं होता। वह आत्मा-अपने कपड़े बदलनेवाले मनुष्यकी भांति दूसरा शरीर धारण करता है। इस सिद्धांतको पुनर्जन्म कहते हैं। ज्ञानेश्वरी १६५