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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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आकाशसे उत्पन्न होकर आकाशमें लीन होते हैं। आकाश सर्व श्रेष्ठ है। छांदोग्य उपनिषदमें “ आकाशको अग्निसे भी श्रेष्ठ कहा है। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, बिजली आदि आकाशमें रहते हैं। इन सबपर आकाशका आवरण रहता है। आकाशके विषयमें ऐसा भी एक विचार है कि खोखलापन का अर्थ शून्य अथवा अभाव है। इसलिये आकाशका अस्तित्वही नहीं ! चार्वाक आकाश नहीं मानता । उपनिषद् कहते हैं आकाश वायूसे भरा है। जहां जहां आकाश है वहां वायु है । आकाशमें अनंत तत्वोंको रहनेकी गुंजाइश है। आकाशमें अनंत तत्वोंका भ्रमण एक दूसरेमें विलीन होना आदि क्रियायें चलती रहती हैं। आकाश एक अखंड महाशून्य है। उसमें नीचे ऊपर आगे पीछे ऐसा कुछ नहीं है। आकाश अनेक तरंगोंका जाल है। सारा विश्व आकाशसे उद्भित होकर आकाशमें लीन होता है । शब्द आकाश तत्वजन्य है। श्रुतिमें “ आत्मासे संभुत आकाश कहा गया है । न्याय और वैशेषिक मानते हैं कि आकाशके अपने परमाणु नहीं हैं। पंच-प्राण—भारतीय तत्व-चिंतकोंने प्राण शक्तिका गहरा अध्ययन करके अपने शरीरमें चलनेवाली कौनसी क्रियायें प्राण-तत्वकी किस प्रकारकी शक्तिसे चलती हैं यह देख कर प्राण तत्वके पांच विभाग किये हैं। इनको पंचप्राण कहा जाता है। उनका नाम हैं (१) प्राण (२) अपान (३) व्यान (४) उदान (५) समान । निम्न छंदोंमें शरीरमें इन पांच प्राणोंका क्या काम है इसको समझाया गया है। जीता है प्राणसे प्राणी उठाता बोझ व्यानसे । मल-मूत्र सदा नीचे उतारता अपानसे ॥ उदानसे चलती वाक् हत्क्रिया है समानसे । चलती जो क्रियां ऐसी देहधारी मनुष्यकी ॥ पंचाग्नि—(१) प्रलयानल, (२) विद्युदनल (३) वडवानल (४) शिवनेत्रानल (५) द्वादशादित्यानल ये पंचाग्नि हैं । प्रलयानल पृथ्वी पर रहता है । विद्युदनल आकाशमें बिजलियोंमें-रहता है। बडवानल समुद्रमें होता है। शिवनेत्रानल रुद्रके क्रोधमें रहता है। द्वादशादित्यानल सूर्यका तेजस है। परमार्थ—परमार्थका अर्थ श्रेष्ठ प्रकारका लाभ । व्यावहारिक लाभ जिसे हम लाभ कहते हैं वे क्षणिक हैं। वे सब लाभ नष्ट हो सकते हैं। किंतु आत्मज्ञान-अपने आपको जाननेका ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता । इसलिये “मैं” क्या है यह जानना, अपने आपको जानना, श्रेष्ठ प्रकारका लाभ है। तभी इसे परमार्थ कहा है। इस ज्ञानसे सुख मिलता है और वह सुख निरालंब सुख होता है। वह किसी बाह्य वस्तु पर आधारित नहीं होता। आपसे अपनेमें अनुभव करनेका होता है । इसलिये वह शाश्वत सुख होता है। कभी नष्ट न होनेवाले शाश्वत सुखका लाभ परमार्थ है। इस प्रकारके सुखको प्राप्त करनेके लिये जो जो कुछ किया जाता है उसको परमार्थ साधना कहते हैं। पाप—पाप एक मल है। जो अंतःकरणको चिपकता है। पश्चात्तापसे उसको दूर किया जाता है। पतितता उत्पन्न करनेवाला, अमंगल, अशुभ, अनिष्टको जन्म देनेवाला क्रियाविशेष ही पाप है । सामान्यतः निसर्ग नियमोंके विरुद्ध चलना पाप है। पाप मनुष्यको गिराता है। प्रत्येक मनुष्य अनेक प्रकारसे-पाप पुण्य न माननेवाला भी-अपनी दृष्टिसे गिरता उठता है। अपनी १६३ परिशिष्ट ५