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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

आकाशसे उत्पन्न होकर आकाशमें लीन होते हैं। आकाश सर्व श्रेष्ठ है। छांदोग्य उपनिषदमें “ आकाशको अग्निसे भी श्रेष्ठ कहा है। सूर्य, चंद्र, नक्षत्र, बिजली आदि आकाशमें रहते हैं। इन सबपर आकाशका आवरण रहता है। आकाशके विषयमें ऐसा भी एक विचार है कि खोखलापन का अर्थ शून्य अथवा अभाव है। इसलिये आकाशका अस्तित्वही नहीं ! चार्वाक आकाश नहीं मानता । उपनिषद् कहते हैं आकाश वायूसे भरा है। जहां जहां आकाश है वहां वायु है । आकाशमें अनंत तत्वोंको रहनेकी गुंजाइश है। आकाशमें अनंत तत्वोंका भ्रमण एक दूसरेमें विलीन होना आदि क्रियायें चलती रहती हैं। आकाश एक अखंड महाशून्य है। उसमें नीचे ऊपर आगे पीछे ऐसा कुछ नहीं है। आकाश अनेक तरंगोंका जाल है। सारा विश्व आकाशसे उद्भित होकर आकाशमें लीन होता है । शब्द आकाश तत्वजन्य है। श्रुतिमें “ आत्मासे संभुत आकाश कहा गया है । न्याय और वैशेषिक मानते हैं कि आकाशके अपने परमाणु नहीं हैं। पंच-प्राण—भारतीय तत्व-चिंतकोंने प्राण शक्तिका गहरा अध्ययन करके अपने शरीरमें चलनेवाली कौनसी क्रियायें प्राण-तत्वकी किस प्रकारकी शक्तिसे चलती हैं यह देख कर प्राण तत्वके पांच विभाग किये हैं। इनको पंचप्राण कहा जाता है। उनका नाम हैं (१) प्राण (२) अपान (३) व्यान (४) उदान (५) समान । निम्न छंदोंमें शरीरमें इन पांच प्राणोंका क्या काम है इसको समझाया गया है। जीता है प्राणसे प्राणी उठाता बोझ व्यानसे । मल-मूत्र सदा नीचे उतारता अपानसे ॥ उदानसे चलती वाक् हत्क्रिया है समानसे । चलती जो क्रियां ऐसी देहधारी मनुष्यकी ॥ पंचाग्नि—(१) प्रलयानल, (२) विद्युदनल (३) वडवानल (४) शिवनेत्रानल (५) द्वादशादित्यानल ये पंचाग्नि हैं । प्रलयानल पृथ्वी पर रहता है । विद्युदनल आकाशमें बिजलियोंमें-रहता है। बडवानल समुद्रमें होता है। शिवनेत्रानल रुद्रके क्रोधमें रहता है। द्वादशादित्यानल सूर्यका तेजस है। परमार्थ—परमार्थका अर्थ श्रेष्ठ प्रकारका लाभ । व्यावहारिक लाभ जिसे हम लाभ कहते हैं वे क्षणिक हैं। वे सब लाभ नष्ट हो सकते हैं। किंतु आत्मज्ञान-अपने आपको जाननेका ज्ञान कभी नष्ट नहीं होता । इसलिये “मैं” क्या है यह जानना, अपने आपको जानना, श्रेष्ठ प्रकारका लाभ है। तभी इसे परमार्थ कहा है। इस ज्ञानसे सुख मिलता है और वह सुख निरालंब सुख होता है। वह किसी बाह्य वस्तु पर आधारित नहीं होता। आपसे अपनेमें अनुभव करनेका होता है । इसलिये वह शाश्वत सुख होता है। कभी नष्ट न होनेवाले शाश्वत सुखका लाभ परमार्थ है। इस प्रकारके सुखको प्राप्त करनेके लिये जो जो कुछ किया जाता है उसको परमार्थ साधना कहते हैं। पाप—पाप एक मल है। जो अंतःकरणको चिपकता है। पश्चात्तापसे उसको दूर किया जाता है। पतितता उत्पन्न करनेवाला, अमंगल, अशुभ, अनिष्टको जन्म देनेवाला क्रियाविशेष ही पाप है । सामान्यतः निसर्ग नियमोंके विरुद्ध चलना पाप है। पाप मनुष्यको गिराता है। प्रत्येक मनुष्य अनेक प्रकारसे-पाप पुण्य न माननेवाला भी-अपनी दृष्टिसे गिरता उठता है। अपनी १६३ परिशिष्ट ५

दृष्टिसे गिरनेका भाव पाप है। ऋग्वेद कालमें भी यह कल्पना थी। वहां पापको बंधन माना है ! वहां एक प्रार्थना है "जैसे बछड़ेसे रस्सी दूर करते हैं वैसे तू मुझे पापसे दूर कर ! क्यों कि बिना तेरे सामर्थ्यके आंख भी नहीं झपकती !" वहां पानीसे पापको धोनेकी प्रार्थना की है और अग्निसे पापको जलानेकी ! आगे शास्त्रज्ञोंने किन किन बातोंसे मनुष्य अपनी दृष्टिसे आप गिरता है उसका विचार करके उन सब बातोंको पापमें गिना और मनुष्यको उन उन बातोंसे दूर रहनेका आदेश दिया। जैसे माता शिशुको जहां जहां धोखा है वहांसे दूर रहना सिखाती है। इस शिक्षा पद्धति कारण पापके (१) प्रकीर्ण (२) अपाङ्क्तेय (३) मलिनीकरण (४) जातिभ्रंशकर (५) उपपातक (६) अतिपातक (७) महापातक ऐसे सात प्रकार बने। भिन्न भिन्न शास्त्र- कारोंने इसको भिन्न भिन्न नाम दिये हैं। धर्म शास्त्रोंमें अपनी तथा समाजकी निगाहोंसे गिरने या गिरानेके अनेक कारणोंकी लंबी सूची दी है। यह पापवृत्ति एक प्रकारसे मानसिक अनारोग्य है। जैसे कोई रोग पीढ़ी दर पीढ़ी आनुवंशिक चलता है वैसे पापवृत्ति भी आनुवंशिक चलती है। इसलिये कहीं कहीं एकके पापमें दूसरेकी जिम्मेदारी भी बतायी गयी है। जैसे सेवकके पापमें स्वामी, प्रजाके पापमें राजा, शिष्यके पापमें गुरु, पुत्रके पापमें पिता, यजमानके पापके पुरोहित आदि। जैसे पाप आनुवंशिक वैसे ही आनुषंगिक भी होता है। जैसे छूतकी बीमारी। गुरूका अनुकरणरूप, अथवा राजाके अनुकरणरूप अथवा समाज धुरीणोंके अनुकरणरूपमें, पाप समाजमें फैलता है ! ऐसे समय ये महाजन कठोर दंडके भागीदार माने गये हैं। पाप, मनुष्यके, पर्या- यसे समाजके नैतिक तथा आत्मिक अधःपतनका कारण होता है। खास करके कोई तत्वज्ञान जब मनुष्यके पाप छिपाने अथवा पापके समर्थनका साधन बनता है तब तो दंभ बढ़ जाता है और वह समाजके पतनका-सर्वतोमुखी पतनका साधन बनता है। विश्वके सभी धर्म-शास्त्रोंमें पापका विचार किया गया है। आधुनिक बुद्धिवादियोंने इस पर अनेक प्रकारसे विचार किया है। कुछ लोगोंने इसकी अवहेलना भी की है। सामान्य जनताको नीतिमार्ग पर स्थिर रखने के लिये इस कल्पनाकी अत्यंत आवश्यकता है। तथा गुप्तपापोंको रोकनेके लिये ईश्वरीय शासनकी भी। बिना इसके दूसरा चारा नहीं। पुण्य—जैसे पाप वैसे पुण्य। जो भिन्न प्रकारका इष्टफल देता है वह पुण्य है। ऐसी पुण्य शब्दकी व्याख्या की है। साथ साथ "विहित कर्मसे उत्पन्न होनेवाला" ऐसा भी कहा गया है। जैसे पाप अपनी निगाहोंसे गिराता है और क्लेश देता है वैसे पुण्य अपनी निगाहोंमें उठाता है और मनको समाधान देता है। धर्मशास्त्रोंने जैसे अपनी निगाहोंसे गिरानेवाले कार्योंकी सूचि दी है वैसे उठानेवाले कार्योंकी भी सूचि दी है। पुण्यसे, विहित काम करनेसे, व्यक्ति तथा पर्यायसे समाजकी शक्ति बढ़ती है। किये हुए पुण्यका प्रचार करनेसे पुण्य नष्ट होता है। इसलिये उसका प्रचार न करनेका आदेश दिया है। पुनर्जन्म—यह भारतीय दर्शनका वैशिष्ट्य है। कुछ अपवाद छोड़ कर भारतके सभी दर्शन पुनर्जन्म मानते हैं। मृत्युका अर्थ मनुष्यका शरीरपात है। मनुष्यका शरीर छूटने पर भी उसके आत्माका नाश नहीं होता। वह आत्मा-अपने कपड़े बदलनेवाले मनुष्यकी भांति दूसरा शरीर धारण करता है। इस सिद्धांतको पुनर्जन्म कहते हैं। ज्ञानेश्वरी १६५

इस कल्पनाके बीज ऋग्वेदमें भी मिलते हैं। जैसे:— चक्षु मिले सूर्यमें प्राण वायुमें जा तू द्यौ या पृथ्वीमें धर्मानुसार । जा तू जलमें अथवा जहां चाहो रह नव-देह सह ओषधीमें ॥ अथवा— देहधारी आत्मा कभी न थकते आता जाता है अपने स्वभावसे । आता जाता है जो इस जगतमें संयोग वियोग युत स्व-शक्तिसे । रचा जिसने इसको न देखता यह रहता वह इससे गुप्त । किंतु देखता वह इसे सदैव तभी गर्भावृत हो भोगता (यह) दुःख । ऐसे मंत्र कहीं कहीं मिलते हैं। आगे उपनिषदोंमें इसका विकास देखनेको मिलता है। कठोपनिषदमें एक स्थान पर कहा गया है कि मनुष्य घासकी भांति सूखकर-वृद्ध होकर-मरता है और वैसे ही घासकी भांति पैदा होता है !" वैसे बृहदारण्यकमें कहा गया है "जैसे झिनगा घासकी एक पात छोड़ते समय दूसरे पात पर आंख गड़ाता है वैसे आत्मा एक देह छोड़ते समय दूसरी देह पर आंख गड़ाता है और उसमें प्रवेश करता है ।" "यह पुरुष काममय है। जैसी इच्छा करता है वैसे सत्कर्म या कुकर्म करनेवाला साधू या पापी होकर पैदा होता है !" ऐसे विचार कई स्थान पर आये हैं। ऐसी ही बातोंको लेकर "वासनानुसार कर्म, कर्मानुसार जन्म, तथा वासनाक्षयसे मोक्ष" जैसे कर्म-सिद्धांतोंका विकास हुवा। अनेक उपनिषद और गीतामें "कर्म तथा पुनर्जन्मका संबंध" स्पष्ट बताया गया है । भारतीय दर्शनोंमें भी "मोक्ष प्राप्त होनेतक मानवी जीव अपने अपने कर्मानुसार अनेक योनियोंमें भ्रमण करता रहता है !" यह सिद्धांत सांख्य, योग, न्याय, वेदांत, जैन, बौद्ध आदि दार्शनिकोंने स्वीकार किया है। इस विषयमें सांख्य कहता है "ऐसा कहना गलत है कि सर्व- व्यापक पुरुष एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाता है। निर्गुण पुरुषका पुनर्जन्म नहीं होता है किंतु सूक्ष्म-लिंग देहका पुनर्जन्म होता है। अंतःकरणचतुष्टय तथा इंद्रियां, उनकी तन्मात्राओंके तत्वोंसे आत्माकी चारों ओर लिंगदेहका सूक्ष्म कोष तैयार होता है। इस लिंगदेहके साथ आत्मा हृदया- काशमें रहता है। आकाश अंगुष्ठमात्र होनेसे लिंगदेह भी उतना ही होता है। इस लिंगदेहमें कर्म-संस्कार सुरक्षित रहते हैं। यही पुनर्जन्मके कारण होते हैं।" इस विषयमें जैनोंका मत इससे कुछ भिन्न है। जैनदर्शनके अनुसार कर्म जीवमें संपूर्ण रूपसे मिल जाता है। व्याप्त हो जाता है। इसलिये वही कर्म, जीवको संसार क्षेत्रमें खींच लाता है। जीवको इसी कर्मानुसार पुनर्जन्म मिलता है। सतत पुण्यकर्म करनेसे प्राप्त होनेवाले सम्यग्ज्ञानसे जीव जन्ममृत्युसे मुक्त होता है। किंतु बौद्ध-दर्शन आत्माको न मान कर भी पुनर्जन्म मानता है। बिना आत्माके पुनर्जन्म कैसे और किसका ? इस प्रश्नके उत्तरमें बौद्ध दार्शनिक कहते हैं। मनुष्यके कर्मका कभी नाश नहीं होता। उसका यथोचित फल-भोग भोगना ही पडता है। मनुष्यका वर्तमान जन्म उसके पूर्व-जन्मका फल है जैसे एक दीपकसे दूसरा दीपक जलता हुवा दीप-माल तैयार होती है। एक जन्मका कर्म दूसरे जन्मकी स्थिती निश्चित करता है। कर्मकी एकता अथवा अखंडताके कारण मृत जीव और नये जीवमें अभिन्नता रहती है। यही पुनर्जन्म है। १६५ परिशिष्ट ५

महाभारतमें कर्मानुसार जन्मका सिद्धांत समझाते हुए "अव्यक्त आत्मा ही देहधारी प्राणिमात्रका बीज है। बीज भूत आत्मा गुणोंके कारण जीव बनता है। वही काल और कर्मके प्रभा- वसे संसारमें भ्रमण करता है। वृक्षमें यह चैतन्य बीज होता है। सुख दुःख भी होता है। इतना ही नहीं उनकी इंद्रियां भी होतीं हैं।" महाभारतके शांतिपर्वमें इसका विस्तृत दिवचन है। जीव चंद्रलोक तक जा कर वहांसे वनस्पतिमें आता है और अन्नरूपसे वह प्राणिमात्रमें जाकर मातृगर्भमें प्रवेश करता है इस तरह देह त्यक्त जीवका भ्रमण कक्षा बताया गया है। आधुनिक जीव-शास्त्र भी इस सिद्धांतका समर्थन करता है। भारतके बाहरके दार्शनिक इस सिद्धांतको नहीं मानते किंतु भारतीय दार्शनिकोंने हजारों वर्षोंसे, ४.५॥ हजार वर्षसे इस सिद्धांतको स्वीकार किया है और उपनिषदोंसे स्वीकृत पुनर्जन्मके विचारोंका आधुनिक विज्ञान समर्थन करता है। प्राचीन ऋषियोंने स्पष्ट रूपसे कहा है "पुत्र पौत्र प्रपौत्रके रूपमें वंश-सातत्यसे मेरी आत्मा अमर होगी।" "आत्मा पुत्र रूपसे जन्मता है !" यह वाक्य प्रसिद्ध है। पुनर्जन्मका सिद्धांत अमान्य करनेवाले विद्वानोंके "तो पूर्व-जन्मका स्मरण क्यों नहीं रहता ?" इस प्रश्नका उत्तर देते समय भारतीय दार्शनिक "आत्माके अज्ञानावरणके कारण !" कहते हुए इस अज्ञानावरणको दूर हटा कर पूर्व-जन्मका स्मरण प्राप्त करनेका विधान भी-योगमें-बताते हैं। गीतामें पुनर्जन्मका व्यवस्थित विवेचन और समर्थन मिलता है और ज्ञानेश्वरीमें इसका सुंदर स्पष्टीकरण दिया है जो अत्यंत बुद्धिगम्य हैं और आज जो आधुनिक विद्वान वैज्ञानिक ढंगसे अनुसंधान करते हैं वह भी पुनर्जन्मके भारतीय सिद्धांतका समर्थन करता जाता हैं। पुरुष—सांख्य शास्त्रमें प्रकृति और पुरुष यह दो अनादि तत्त्व होनेकी बात कही गयी है। गीताने भी यह कहा है। सांख्य, शुद्ध चैतन्यको जो गुणोंसे परे है पुरुष कहता है। अज्ञानके कारण प्रकृति पुरुषमें जो विपरीत बुद्धि होती है, विवेक द्वारा उसको दूर करके पुरुषको प्रकृतिसे मुक्त देखना ही सांख्यका परम उद्देश्य है। इसीको वे विवेक ख्याति कहते हैं। सांख्यका पुरुष अतींद्रिय है। वैसे सांख्यके तीन प्रकारके पुरुष हैं (१) रूप पुरुष, (२) बद्ध पुरुष (३) मुक्त पुरुष । अनाश्रितत्व, अलिंगत्व, निरवयत्व, स्वतंत्रत्व, अत्रिगुणत्व, विवेक्तित्व, अविषयत्व, असामान्यत्व, चेतनत्व, अप्रसवधर्मित्व, साक्षित्व, कैवल्य, माध्यस्थ्य, औदासिन्य, द्रष्टृत्व, अकर्तृत्त्व ये रूप पुरुषके लक्षण हैं। इसी निर्लिप्त पुरुषका बिंब, बुद्धि या महत्तत्त्व पर पडता है। ऐसे समय बुद्धि या महत् जड होते हुए भी उसमें चैतन्यका भास होता है जो बद्ध पुरुष जीव है। वह सांख्य विवेकसे मुक्त होता है। पुरुष और प्रकृतिका संबंध अनादि है। पुरुषका बिंब जब प्रकृति पर पडता है प्रकृति या बुद्धि अपनेको चैतन्य समझने लगती है। व्युत्क्रम रूपसे बुद्धिके स्वरूपका भास पुरुषसे होता है। जिससे निष्क्रिय, निर्लिप्त, त्रिगुणातीत पुरुषभी अपनेको कर्ता, भोक्ता, आसक्तादि-सा लगता है। यही पुरुषका कल्पित बद्धत्व है। पुरुषका अपने आपको पहचानना मुक्ति है। वही सांख्यका विवेक है। इस विवेकसे-ज्ञानसे-कैवल्य प्राप्त होता है। इस विवेकके द्वारा पुरुषका चैतन्यत्व और प्रकृतिका जडत्व स्पष्ट हो जाता है। गीतामें भी इन तीन पुरुषोंका विचार है तथा ज्ञानेश्वरीमें इसका विस्तृत विवेचन है। सांख्यमें पुरुषके विषयमें जो विवेचन है यहां उसकी झलक मात्र है। पुरुषार्थ—मनुष्यको अपना जीवन कृतार्थ करनेके लिये जो पराक्रम करना होता है उसको पुरुषार्थ कहा गया है। पुरुषार्थ मानवी जीवनका कर्तव्य है। वे चार हैं। (१) काम, काम ज्ञानेश्वरी* १६६

मनुष्यकी, नहीं प्राणिमात्रकी सहज प्रवृत्ति हैं। वह आत्माके अमरत्व प्रस्थापनाका भौतिक प्रयास है। वेदोंमें कहा गया है आत्मा पुत्र रूपसे प्रकट होता है। उपनिषदोंमें कहा गया है "प्रजातंतुका छेदन मत करो!" संतानेत्पादन पितृ ऋणसे मुक्ति है। कुलमर्यादाके साथ कुलवृद्धिका मूल काम है। इसीलिये गृहस्थाश्रम है। गृहस्थाश्रमके इस काम-पूर्तिके लिये, तथा संतानको योग्य संस्कार देनेके लिये अर्थकी- धनकी आवश्यकता है। धन प्रथम पुरुषार्थ काम तथा काम पूर्तिके दायित्व निभानेका साधन है। इसलिये अर्थ-साधना द्वितीय कर्तव्य है। साथ साथ अर्थ साधनमें जुट जानेसे काम-वृत्तिका संकोच भी होता है। वह सीमित होती है। वैसे ही धर्म अर्थलालसाका संकोच करता है। धनकी आवश्यकता है "किंतु सन्मार्गसे" यह धर्म कहता है। चाहे जैसे, जैसे चोरीसे, डाकेसे, जूएसे, अत्याचार अना- चारसे, आनेवाला धन नहीं चाहिए, कैसा धन स्वीकार करना कैसे नहीं करना यह कहनेका कार्य धर्म करता है। अर्थात धर्म, अर्थ लालसाका संकोच करता है और इन सबसे मुक्त करता है। काममें जो सुख है, धनमें जो सुख है, धर्म भावनाका जो सुख है वह क्षणिक है। वह पराश्रित है। बाह्य वस्तुओं पर आश्रित है। इसलिये वह सच्चा नहीं। सच्चा सुख स्वाश्रित होना चाहिए। अपनेमें आपसे भोगा जानेवाला सुख। शाश्वत चिरंतन सुख। ऐसे सुखको मोक्ष कहा गया है। वह मनुष्यको स्थायी सुख देता है इसलिये वह सर्वोच्च पुरुषार्थ है। चतुर्थ पुरुषार्थ है। काम मानवी कर्तव्य तथा सुखकी पहली सीढ़ी है और मोक्ष मानवी कर्तव्य और सुखकी अंतिम स्थिति है। जीवनका सारा प्रयत्न उसके लिये हैं। जीव उसी सुखके लिये बार बार जनमता और मरता है। इसी आशासे कि कभी न कभी वह मिलेगा। पुरोडाश—यज्ञकार्यमें आहुति देनेके लिये बनाया गया अन्न विशेष। यह बनानेका विधि-विधान समंत्र होता है। इसमें भूने गये चावल या जौका सत्तू होता है जो गरम पानीमें गूंद कर कच्छपके आकारके गोले बनाकर मिट्टीके तवे पर भूने जाते हैं। इसको घी लगानेके बाद यह पुरोडाश बनता है। ये पुरोडाश मिट्टीके कितने तवोंपर-खपरैलोंपर-भूने जाते हैं इस पर उसका सप्तकपाल, अष्टकपाल, दशकपाल, एकादशकपाल, द्वादशकपाल आदि नाम होते हैं। पुरोडाशका विशिष्ट भाग यज्ञमें आहुति दे कर जो बचा रहता है वह यज्ञ करनेवाले "यज्ञशेष" के रूपमें खाते हैं। प्रकृति—सांख्यमतानुसार सत्व-रज-तमकी साम्यावस्था ही प्रकृति है। यह सांख्योंके चौबीस तत्वोंमें दूसरा तत्त्व है। गीतामें यह क्षर तत्त्व है जो अपरा प्रकृति कही गयी है। यह अपरा प्रकृति अनादि कालसे पुरुषसे संबद्ध है। इसीसे सब बद्ध हैं। कल्पांतमें भूतमात्र इसमें लीन होते हैं और कल्पारंभमें इसीसे उत्पन्न होते हैं। पुरुष इसका अधिष्ठान मानकर अपनी मायासे सारा विश्व चलाता है। इस अपरा प्रकृतिके ऊपरके स्तरपर परा प्रकृति है। यही जगतको धारण करती है। यह ईश्वरांश है। जो शरीरत्यागके बाद एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाकर इंद्रियादिकेद्वारा विषयोंका भोग करती है। सांख्यमतानुसार मूलप्रकृति अव्यक्त है। उसीसे अन्य २३ तत्त्व उत्पन्न होते हैं। मूल अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न सभी तत्त्व व्यक्त हैं। इन प्रत्येक व्यक्त तत्त्वमें अव्यक्त प्रकृतिके (?) तीन गुण हैं। ये ही गुण संस्थानभेदसे अनेक रूपसे अभिव्यक्त होते हैं। यह मूलप्रकृति जो तीन गुणोंके साम्यावस्थासे बनी है, अव्यक्त है। यह १६७ परिशिष्ट ५

महत्तत्त्वादि अन्य तत्त्वोंमें अपनी अव्यक्त शक्तिसे प्रवेश करती है। और अन्यान्य भेदोंका समन्वय करती है। प्रकृति जड और नित्य है जो अनादि कालसे पुरुषसे जुड़ी हुई है। प्रकृति पर पुरुषका बिंब पड़नेसे वह अपनेको चेतनकी भांति समझती है। प्रकृतिके इसी स्वरूपके आभासके कारण निष्क्रिय निर्लिप्त पुरुष भी अपनेको कर्ता भोक्ताके रूपमें लगता है, यही पुरुष पर आरोपित प्रकृ- तिका बंधन है। इसीका पहचान कर दूर करना स्वरूप ज्ञान है। प्रकृति ही सृष्टि रचनाका कार्य करती है। इस कार्यमें प्रकृति किसीका सहाय नहीं लेती। प्रकृति पर पड़ा पुरुषका बिंब स्वाभाविक है। सृष्टिरचना प्रकृतिका स्वभाव है। गायके थानमेंसे निकल कर बछड़ेके मुखमें जानेवाले अचेतन दूधकी भांति प्रकृतिका कार्य चलता है। इस दूधसे जैसे बछडेको जीवन मिलता है वैसे प्रकृतिके सृष्टि-कार्यसे पुरुषको मुक्ति मिलती है। पुरुषकी मुक्तिके लिये वह अनेक प्रकारके उपाययोजना करती है। वह अपने प्रभुत्वसे, बुद्धिके भावोंकी सहायतासे, एक शरीर छोडकर दूसरा शरीर धारण करती है। इन सब बातोंका एक मात्र उद्देश्य पुरुषको बंधनमुक्त करना है। प्रकृतिको आत्मा समझनेवाला पुरुष, शरीर छूटनेके बाद प्रकृतीमें ही लीन हो जाता है। अथवा प्रकृतिलीन पुरुष मुक्त-सा हो कर भी पुनः हिरण्यगर्भ स्वरूपको धारण करता है। अर्थात् प्रकृतिलीन पुरुषको उत्तरकालमें बन्धन होनेकी संभावना बनी रहती है और ईश्वर जो सदा मुक्तावस्थामें रहता है कभी किसीभी प्रकारसे प्रकृतिके बंधनमें नहीं आता। महत्तत्त्वसे लेकर पृथ्वीतत्त्व तक सभी तत्त्वोंका मूल प्रकृति है। यह सत्य रज तमकी साम्यावस्था है। इस अवस्थामें गुणोंका कोई प्रधान या गौणभाव नहीं रहता। प्रकृति तत्त्वमें ये गुण विभक्त नहीं रहते। परस्पर समन्वित रहते हैं। इस प्रकृतिके दो भेद माने गये हैं। व्यामोहिका प्रकृति तथा मूल प्रकृति। इसी कारण संसारमें अवस्थाभेद हैं। व्यामोहिका प्रकृतिमें पुरुष बद्धावस्थामें जीव कहलाता है और मूल प्रकृतिमें स्वरूप लीन होकर जगत्कारण आत्मा कहलाता है। प्रकृतिका सिद्धांत कहनेवाला सांख्यदर्शन अत्यंत प्राचीन-दर्शन है। इसके विचार अत्यंत व्यापक हैं। सांख्यके बाद कई दर्शनकारोंने तथा भाष्यकारोंने इस पर इतना विचार किया है, इतने विवेचन किये हैं, जिससे अनेक प्रकारके मतभेद दीख पड़ते हैं। कई भाष्यकारोंने इसके अनेक पर्यायवाची शब्द देकर विषयको अधिक उलझा दिया है। यहां तक कि सांख्यकी प्रकृति तथा गीताकी प्रकृति एक नहीं हैं!! इस परसे लगता है कि सांख्यके तत्त्वोंका-प्रकृतिका विवेचन करनेवालोंने अपने अपने अनुभवसे विवेचन किया है। प्राण—पिंड तथा ब्रह्मांडका एक मूलतत्त्व। इस शब्दका अर्थ करते समय "शरीरमें संचार करनेवाला वायु" ऐसा अर्थ किया गया है। इसके साथ ही साथ "सदैव अर्थात् नींदमें भी नाक तथा मुखसे अंदर बाहर जानेवाला तत्त्व" भी कहा गया है। यही तत्त्व है जो "मनुष्य और विश्वको जोडता है!" अनेक उपनिषदोंमें इसका विचार आया है। एक स्थान पर "यह जीवनतत्त्व है" कह कर आगे "प्राण ही ब्रह्म" कहा गया है। यह केवल मनुष्यका ही नहीं "समग्र विश्वका जीवन तत्त्व है!" दूसरे एक उपनिषदमें "प्राण ही विश्वाधार वस्तु कहा है क्यों कि सभी वस्तु प्राणसे निर्माण हो कर प्राणमें ही लीन होते हैं।" चक्रके आरे जैसे नाभीमें गढे रहते हैं वैसे सारा विश्व प्राणमें मिला रहता है।" ज्ञानेश्वरी ७ १६८

विश्वके प्रत्येक वस्तुके पीछे जो सदैव त्रिकालाबाधित गतिमान् शक्ति है वह प्राण है। गुरुत्वाकर्षण, विद्युत्, ग्रहमंडल और नक्षत्रोंका भ्रमण तथा चराचर जीव सृष्टिमें यह प्राणतत्त्व ओतप्रोत है। विश्वके अम्याम्य आकार प्रकारका, विश्वकी विविध शक्तियोंका, तेजका आधार यही प्राणतत्त्व है। विश्वके जीवनका आधारभूत, विश्व-जीवनको नियमित करनेवाला महान तत्त्व हवामें है किंतु हवा प्राण नहीं है। अन्नमें प्राण है किंतु अन्नका पौष्टिक अंश प्राण नहीं। पानीमें प्राण है। किंतु पानी जिन द्रव्योंसे बनता है वह प्राण नहीं ! सूर्य प्रकाशमें प्राण है किंतु उसका प्रकाश या किरण प्राण नहीं है। विश्वके सभी चराचर सृष्टिकी चिच्छक्ति प्राण है और विश्वके सभी वस्तु इस प्राणशक्तिके वाहक हैं। प्राणका अर्थ श्वास प्रश्वास नहीं किंतु जिसके कारण यह श्वसनप्रणाली चलरही है वह प्राण है। आंखोंसे देखना, कानसे सुनना, जीभसे चखना, शरीरसे छूना आदि इसी प्राणतत्वका परिणाम है। जिस शक्तिसे विश्वमें गतिमानता है वह प्राण है किंतु विश्वकी गतिमानता प्राण नहीं। इस बातको अनेक उदाहरण देकर उपनिषदमें समझाया गया है। इस प्राण शक्तिको आधार मानकर उपनिषदोंने दो नीतितत्त्व कहे हैं (१) इंद्रियोंकी विषय प्रीति पाप अर्थात् मृत्युका कारण बनती है, इसलिये प्राणधारणापरूप जीवनव्यापारको महत्व देना (२) तत्वतः सबका प्राण एक होनेसे सबसे प्रेम करना। किसीसे द्वेष नहीं करना। यह औपनिषदीय नीतिशास्त्रका आधार है। प्राणायाम-अष्टांग-योगका चौथा अंग। इस शब्दका प्राण+आयाम ऐसा विभाजन है। श्वासप्रश्वासकी स्वाभाविक गतिपर नियंत्रण रखना प्राणायाम शब्दका अर्थ और उद्देश्य है। जो प्राण अथवा वायु हम बाहर छोड़ते हैं जिसे प्रश्वास कहते हैं उसको प्राणायामकी प्रक्रि- यामें "रेचक" कहा गया है। जो वायू अंदर लेते हैं जिसे श्वास लेना कहा जाता है उसको प्राणायाममें "पूरक" कहा गया है। तथा बाहरी श्वास अंदर लेकर उसको अंदर ही रोकनेकी क्रियाको "कुंभक" कहा जाता है। पूरक कुंभक रेचक मिलकर प्राणायामकी प्रक्रिया चलती है। यह कुंभक एक प्रकारसे श्वास प्रश्वासमें विराम है। यह विराम दो प्रकारका हो सकता है। एक पूरकके बाद अर्थात् बाहरका वायू अंदर लेनेके बाद दूसरा रेचकके बाद अर्थात् अंदरका वायू बाहर छोडनेके वाद। इस दो प्रकारके विरामको अंतर कुंभक और बाह्यकुंभक कह सकते हैं। विरामका यह काल घटाना बढ़ाना, प्राणायामका वास्तविक अभ्यास है। (१) बाहरका वायू अपने फेफड़ोंमें भरना (२) वहां उसको रोकना (३) अंदरका वायू बाहर फेंकना (४) उसको बाहर ही रोकना। इसमें जो प्रकार हैं इससे प्राणायामके अनेक प्रकार बने हैं। जैसे नाकके दोनों नथुनोंसे सांस लेकर तुरंत दोनों नथुनोंसे छोड़ना भस्त्रिका कहलाता है। ऐसे करते समय पेटको लुहारकी धोकनीकी भांति फुला कर छोड़ना पड़ता है। इस भस्त्रिकाके भी उपविभाग हैं। जैसे एक नथुनेसे ले कर तुरंत दूसरे नथुनेसे छोड़ना। ऐसे (१) सूर्यभेदन (२) उज्जार्ड (३) सीत्कारी (४) शीतली (५) भस्त्रिका (६) भामरी (७) मूर्छा (८) प्लाविनी ऐसे आठ प्रकारके मुख्य प्राणायाम हैं। किंतु सामान्यतः दीर्घ-श्वसन, अभ्यास करने जैसा प्राणायामका एक प्रकार है। इसमें हम जो श्वास प्रश्वास लेते छोड़ते हैं, उसका समय धीरे धीरे बढ़ायें। वह शरीर और मनको प्रसन्न रखनेका एक अच्छा और बिना किसी धोखेका साधन है। १६९ परिशिष्ट ५ (13)

इसके बाद शांत एकांत स्थान पर सुबह उठते ही, शामको, रातको सोते समय, अथवा अन्य किसी योग्य समय पर धीरेसे दायों नथुना दबा कर बाये नथुनेसे पूरक करना-श्वास अंदर लेना फिर दोनों नथुने दबाकर उसको कुंभक-अंदर रोकना-करना तथा धीरेसे दहिने नथुनेसे बाहर छोड़कर पुनः बाहर रोकना प्राणायामका एक अत्यंत सरल लाभप्रद प्रकार है । इसमें पूरक - १ कुंभक - अंदरका - ४ - रेचक २ - तथा बाह्य कुंभक ४ । यह कालमर्यादा है । इसको इसी प्रमाणमें अपनी शक्तिके अनुसार बढाते जाना । जैसे ४ - १६ - ८ - १६ । इस प्रकारको सूर्य भेदन कहते हैं । इसके विपरीत दाहिने नथुनेसे पूरक, कुंभक, बाये नथुनेसे रेचक कुंभकको चंद्रभेदन कहते हैं । सूर्य भेदन और तुरंत चंद्रभेदनसे एक प्राण चक्र पूर्ण होता है । इस प्राणायाम प्रकारके साथ, पूरकके साथ मूलबंध, कुंभकके साथ जालंधर बंध और रेचकके बाद उड्डियानबंध अत्यंत लाभप्रद है । वस्तुतः उड्डियानबंध ही बाह्यकुंभक है । इसी प्रकार दोनों नथुनोंसे धीरे धीरे कंठ भागको स्पर्श तथा घर्षण करें, इस प्रकारसे-आगे आगे हृदयको भी श्वास नलिकाके हृदय भागमें भी घर्षण हो सके, ऐसे पूरक करके फिर कुंभक करना, वैसे ही दोनों नथुनोंसे श्वासनलिकाको अंदरसे बाहरतक घर्षण हो सके ऐसे रेचक करना भी एक सरल प्रकारका प्राणायाम है । इसके बाद भी बाह्य कुंभक उड्डियान करें । इसका प्रमाण भी १-४-२-४ है । यह कभी कर सकते हैं । इससे कार्यमें उत्साह बढ़ता है । इसके साथ भी मूल बंधादि कर सकते हैं । आरोग्यकी दृष्टिसे यह उत्तम साधन है । विशेषतया जब सांस फूलता है तब अत्यंत लाभप्रद होता है । यदि इसका सही ढंगसे अभ्यास किया जाय तथा नियमित रूपसे इस पद्धतिसे प्राणायाम किया जाय तो यह कई रोगोंसे बचाता है । इस प्रकारके प्राणायामको उजायी कहते हैं । इसी प्रकार अन्य पांच छ प्रकार हैं । इनमें सूर्यभेदन और उजायी ठंडके दिनोंमें अनुकूल होते हैं तो शीतला, सीत्कारी गरमीके दिनोंमें अनुकूल होते हैं । भस्त्रिका अनेक प्रकारके रोगोंको नाश करता है । प्राणायामसे बुद्धि तीव्र और कुशाग्र होती है । शरीर आरोग्य-संपन्न रहता है । हठ योगके अनेक ग्रंथोंमें इसका वर्णन किया गया है । प्राणायाम प्रातःकाल, माध्यान्हकाल, सायंकाल तथा मध्यरात्रीके बाद करना चाहिए । किंतु प्राणायाम सदैव एकांतमें करना चाहिए । प्राणायाम करनेका स्थान अधिक तर खुला, तथा प्रकाशयुक्त हो । शुद्ध हो । चाहे जहाँ प्राणायाम नहीं करना चाहिए । प्राणायाम करते समय सरल बैठना चाहिए । अनामिका और मध्यमा अंगुलिसे बायां नथुना और अंगूठेसे दायां नथुना दबाना चाहिए । तर्जनी अंगुलीका कहीं भी स्पर्श नहीं होना चाहिए । प्राणायामका समय धीरे धीरे बढाते जाना । समय बढ़ानेमें उतावलापन नहीं करना चाहिये । सारी व्यवस्था सहज हो । प्राणायामके इन आठ प्रकारके अलावा और दो प्रकार हैं । (१) सगर्भ (२) अगर्भ । संमत्र प्राणायाम सगर्भ कहलाता है और मंत्र रहित प्राणायाम अगर्भ कहलाता है । संमत्र प्राणायाम विशेष परिणामकारी होता है । वैसे ही जब भूख लगी हो, प्यास लगी हो, नाक भरा हुवा हो, हर्ष शोक आदिसे मन उद्विग्न हुवा हो, नींद आ रही हो अथवा ठीक मल-विसर्जन न हुवा हो, ऐसे समय प्राणायाम नहीं ज्ञानेश्वरी १७०

करना चाहिए । गलत प्रकारसे प्राणायाम करनेसे अनेक प्रकारके रोग हो सकते हैं। यह अपनी मूल-भूत जीवन शक्तिसे खेलना है। इसलिये इसके विषयमें पूर्ण विचार करके, पूर्ण जानकारी लेकर, किसी-सच्चे अनुभवीके मार्ग-दर्शनमें ही यह करना चाहिए । क्यों कि सही तरीकेसे प्राणायाम करनेसे जैसे सब प्रकारके रोग दूर हो कर शरीर संपूर्ण स्वस्थ और तेजस्वी हो जाता है वैसे ही गलत ढंगसे प्राणायाम करनेसे शरीर सदैवके लिये रोगोंका घर भी हो सकता है । बंध—योग-साधनामें जैसे मुद्राएं हैं वैसे ही कुछ बंध भी हैं। प्राणायाम करते समय नवद्वारोंमें कुछ द्वार बंध करनेमें इन बंधोंकी आवश्यकता होती है। मूलबंध, उड्डियानबंध, जालंधर बंध इन्हे त्रिबंध कहते हैं और ये तीन प्रसिद्ध हैं। वैसे ही विपरीत करणी, वज्रोली, महाबंध, महावेधबंध, आदि बंध है जो शरीरशुद्धि, प्राणायामादिमें सहायक हो जाते हैं । बुद्धि—स्वीकृत-गृहीत-बातमेंसे अनुमान करनेवाली जो शक्ति है, अथवा तर्कसे अनुमान अटकल-लगानेकी एक शक्ति। मनुष्य बुद्धिमान है कहनेमें यही सार है। बिना मनुष्यके अन्य पशुओंमें यह अनुमान करनेकी शक्ति नहीं है। फिर भी अधिक विकसित मानवेतर प्राणी कुछ अटकल लगाते हैं किंतु वह निम्न श्रेणीके-अविकसित-श्रेणीके मानवोंके समान होते हैं। विद्वानोंका यह मत है कि मानवी अनुमानमें आत्मज्ञान होता है और पाशवी अनुमानमें वह नहीं होता । पशु, मानवके समान कल्पना-चित्र चितारता रहता है इसका कोई आधार नहीं मिला । बुद्धिका अर्थ करते हुए विद्वानोंने कहा है कि "जिस शक्तिसे मूलसत्यका बोध होता है वह अंतःस्फूर्त शक्ति ही बुद्धि है ।" कुछ विद्वान कहते हैं "सर्वव्यापी तत्त्वके सहारे सभी बौद्धिक विचार एक करनेवाली शक्ति बुद्धि है !" यह व्यवहारिक बुद्धि से जो छोटे मोटे काम करनेमें आवश्यक होती है, भिन्न है। उपनिषदोंमें बुद्धिको जीवनका सारथी माना है। उपनिषदोंके अनुसार इंद्रियां घोडे हैं, मन उनकी रास है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी और आत्मा रथी है । मनकी राससे इंद्रियरूपी घोडोंको वह अपने ध्येयकी ओर चलाती है। यदि सारथी अच्छा नहीं होता तो जैसे घोडे रथको मनमाने ले जाते हैं वैसे बुद्धि यदि आत्मस्थ न हो तो जीवन-रथ गढ़ेमें जायेगा ! सांख्यशास्त्रमें "महत्तत्त्व-संज्ञक बुद्धिको अंतःकरण" कहा है तो न्यायशास्त्रमें "आत्मा और अंतःकरणके संयोगजन्य समझ=ज्ञान" कहा है । किसी बातको जाननेके किये आवश्यक शक्तिको बुद्धि शक्ति कहा गया है। सांख्य-मतके अनुसार बुद्धि एक तत्त्व है। प्रकृतिके सात्त्विक अंशसे बुद्धितत्त्वकी अभिव्यक्ति होती है । इसलिये बुद्धिमें सत्त्वके प्रकाश और लघुत्व ये गुण हैं। निश्चय, बुद्धिका स्वरूप है। निश्चय करना बुद्धीका कार्य है । रजोप्रधान बुद्धि चंचल होती है। यह विकृत बुद्धि है। निश्चय टिक नहीं सकता। ऐसी बुद्धि अहंकारको उत्पन्न करती है। बुद्धि-जन्य इस अहंकारके भी दो प्रकार हैं। सात्त्विक अहंकार-धर्म, ज्ञान, वैराग्य ऐश्वर्य । तामसिक अहंकार-अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य । बुद्धि जीवके भोगका प्रधान साधन है। बुद्धि प्रकृति-पुरुषके सूक्ष्म-भेदको दर्शाती है। बुद्धिसे ही मुक्ति और मुक्तिके भाव जगते हैं। वे भाव लिंग शरीरमें रहते हैं। सांख्यमतके अनुसार अविद्याके कारण बुद्धि वृत्तिको अपौरुषेय चैतन्यसे एकाकार माना गया है। बुद्धितत्त्वके सूक्ष्म भागके कारण ही "मै हूं" इसका ज्ञान होता है। किंतु पुरुष इस बुद्धिसे परे है। अविद्याके कारण ही बुद्धिमें आत्माका भान होता है। सांख्यमतके अनुसार बुद्धि अहंकार तथा मन मिलकर अंतःकरण बनता है। ज्ञानेंद्रियां और १७१ परिशिष्ट ५

कर्मेन्द्रियां इसका साधन है । इन्हीं साधनोंसे वह " बाह्य ज्ञान " प्राप्त करता है । इंद्रियां अंतःकरणका द्वार हैं । मन संकल्प-विकल्प करता है । बुद्धि निश्चय करती है और अहंकार मुझे ज्ञान हुवा ऐसा अनुभव करता है । अर्थात् बुद्धि निश्चय करनेवाली शक्ति है । जब बुद्धि शरीर भावसे उठकर आत्म-रत होती है तब इसीमें चैतन्यका प्रतिबिंब ग्रहण करनेकी शक्ति आती है । गीतामें भी स्थितप्रज्ञ तथा स्थिरमति इन शब्दोंसे बुद्धिके विषयमें कुछ कहा है । वैसे ही "मिश्र-वचनोंसे मेरी बुद्धिपर मोहावरण क्यों डालता है ?" ऐसा प्रश्न पूछनेवाले अर्जुनको द्विविध निष्ठा सांख्य-निष्ठा और योग-निष्ठाके रूपमें सांख्य-बुद्धि और योग-बुद्धि ऐसे बुद्धिके दो प्रकार कहे हैं । ऊपर सांख्य शास्त्रके अनुसार बुद्धि शक्ति अथवा बुद्धि तत्त्वका विवेचन किया ही हैं । उसके अनुसार चैतन्यका प्रति-बिंब ग्रहण करना अर्थात् आत्मज्ञान प्राप्त करना बुद्धिका कार्य है अथवा आत्म-ज्ञान ही बुद्धि है । तथा गीतामें कर्म-कुशलता योग " कहते हुए आत्मज्ञानानुसार कर्माचरण की कलाको योग-बुद्धि कहा है । कला और शास्त्र दोनोंको समन्वय बुद्धिकी स्थिरता है जो ब्रह्म-निर्वाणका साधन है । कहीं कहीं कहा गया है " शुद्ध बुद्धि एक चिनारीकी भांति है, वह कितनी ही कम क्यों न हो अविद्या-राशिको जला देती है । " फल-निरपेक्ष कुशाग्रता " शुद्ध-बुद्धिका लक्षण है । किसी भी प्रकारकी फलापेक्षासे बुद्धि मैली हो जाती है । फलापेक्षासे बुद्धिकी निर्मलता नष्ट होती है। वह कभी चैतन्यका प्रतिबिंब ग्रहण नहीं कर सकती । कर्तव्य निश्चय, फल-निरपेक्षता, कुशाग्रता, निर्मल बुद्धिका लक्षण है जिससे ब्रह्मज्ञान होता है । वैसे ही ग्रीक तत्त्वज्ञ पहले पहले मानते थे विश्वका मूल-भूत तत्त्व सत्य है । उस सत्यका निश्चय करने-जानने-के लिये किया जानेवाला तर्क ही बुद्धि है । बुद्धि सत्यानुसंधानका साधन है । प्लेटो कहता है मूल-भूत-तत्त्व ईश्वरविषयक विचार है ! किंतु अरस्तूका कहना है " बुद्धिके मूलभूत- तत्त्व विश्व-व्यवस्थामें गूंथे हुए हैं । इसलिये विश्वको छोड़कर सत्यका अनुसंधान करना असंभव है !" अरस्तूका यह भी विश्वास है " मनुष्यमें प्राण इस ईश्वरी तत्त्वसे बुद्धि-तत्त्वका प्रवेश होता है । अन्य भौतिक तत्त्वसे नहीं।" वैसे ही वह " इंद्रिय संवेदनामेंसे बुद्धि निर्माण होती है" ऐसा सिद्धांत प्रतिपादन करता है । वह अपने सिद्धांत कहनेके लिये तर्कका ऐसा जाला बुनता है कि उससे छूटना कठिन हो जाता है । उसके तर्कोंका अध्ययन करते करते कुछ सिद्धांत निकलते हैं । वह भी बुद्धिके दो प्रकार मानता है एक निर्मल बुद्धि दूसरी समझ बुद्धि ! मनुष्य अपनी निर्मल बुद्धिके बल- बूते पर विश्वके अंतिम सत्यको पा सकता है समझ बुद्धिसे वह असंभव है । प्लेटो भी इस बातको स्वीकार करता है अरस्तूके मतसे "बुद्धि भी आत्माकी भांति अमर है । वह भौतिक शरीरका भाग नहीं । आत्माकी भांति उसका शरीरसे साहचर्य रहता है । बुद्धि मनुष्यकी मृत्युके बाद आकाशतत्वमें लीन होती है । इस प्रकारकी निर्मल-बुद्धिको वह आकाश तत्त्वसे जोडता है । किंतु समझ बुद्धिको वह अन्य चार तत्त्वोंसे जोडता है । इस क्रियाशील बुद्धिको वह नाउस कहता है । उसके मतमें जैसे शरीरमें पृथ्वी आप तेज वायू आकाश ऐसे स्थूलसे सूक्ष्म सूक्ष्मतर ऐसे घटक है वैसे बुद्धिके भी हैं । नाउस बुद्धिका यह सूक्ष्म तत्त्व है । वही ईश्वरको अनुभव करता है । वह आत्मकी भांति अमर हैं । उपनिषदमें भी एक स्थान पर इंद्रियां ईश्वरी वैभव देखनेके लिये जो सर्वत्र फैला है बाहर दौड़ती हैं ईश्वरके वैभव-दर्शनमें उलझे हुए इंद्रियोंको इस वैभवके स्वामित्वका भान कराकर उन्हे अंतर्मुख करना और आत्म-रत करना ही योग है और " वह हैं " इस अचल श्रद्धासे बुद्धिको ज्ञानेश्वरी १०३

वह शक्ति प्राप्त होती है और फल निरपेक्ष निर्मल बुद्धि (नाऊस ?) उनको आत्मरत करती है। शायद अरस्तूका नाउस मेधा अथवा केनोपनिषदकी "उमा" हो जो इंद्रके शरीरस्थ ईश बुद्धि है-अंतरिक्षमें उठकर व्योमस्थ होने पर ब्रह्मका रहस्य कहती है। बुद्धियोग—निष्काम कर्म-योगको बुद्धि-योग कहा गया है। बुद्धिको कर्म फलासक्तिमें न लगाते हुए कर्म करनेकी कुशलताको बुद्धि-योग कहा गया है। ईश्वर-चिंतनपूर्वक, ईश्वरेच्छा मानकर, प्राप्त कर्तव्य करके। उसमें या उससे किसी प्रकारकी अपेक्षा नहीं करना। ऐसे कर्म करते समय बुद्धिको ईश्वर निष्ठा अथवा ईश्वर चिंतनमें लीन रखना। इंद्रियों द्वारा बुद्धिको विषयोके पीछे न पड़ने देना। यह बुद्धि योगकी साधना है। बुद्धिको विषय, कर्म कर्मकांडादिमें लीन न होने देते हुए केवल ईश्वरसे जोडकर ईश्वर-लीन या आत्मलीन रखना ही बुद्धियोग है। ब्रह्म—ब्रह्म यह शब्द बृहद् बड़ा बहुत बड़ा जिससे बड़ा कुछ भी न हो ऐसे अर्थमें आया है। ऋग्वेदमें यह शब्द मंत्रस्तुति अथवा गूढ़ शक्ति इस अर्थमें आया है ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है। किंतु उपनिषदकालमें ही इस शब्दका अधिक प्रयोग पाया जाता है। ओंकारको-प्रणवको-ब्रह्म वाचक माना है। शतपथ ब्राह्मणमें "परम तत्व" इस अर्थमें यह शब्द सर्वप्रथम आया है। आगे आगे ब्रह्म शब्दका अर्थ इतना व्यापक हो गया कि "यह सारा ही ब्रह्म है!" ऐसे कहा जाने लगा। सारे विश्वके मूलमें जो तत्त्व है उसको ब्रह्म माना जाने लगा। इस तत्त्वके विषयमें उपनिषदोंमें अनेक सिद्धांत कहे गये हैं। ब्रह्मके विषयमें जहां चर्चा है उसको "ब्रह्म-विद्या" कहा गया है। उत्तर मीमांसाका जो ग्रंथ है उसका नाम ही "ब्रह्म-सूत्र" है। "अथातो ब्रह्म- जिज्ञासा" यह इसका सबसे पहला सूत्र है। इस सूत्र ग्रंथ पर करीब २८ लोगोंने भाष्य लिखा है। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्यके अद्वैत सिद्धांत श्री श्री रामानुजाचार्यके विशिष्टाद्वैत सिद्धांत श्री श्री मध्वाचार्यके द्वैत सिद्धांत तथा श्री श्री वल्लभाचार्यके शुद्धाद्वैत सिद्धांतकी आधार शिला यही ब्रह्मसूत्र है। ब्रह्मके विषयमें श्री शंकराचार्यके अद्वैत सिद्धांतके अनुसार ब्रह्म एक मात्र पारमार्थिक सत्य है। श्री शंकराचार्यके मतसे इस ब्रह्मको छोड कर और सब असत् है। यह ब्रह्म निर्विशेष तत्त्व है। यह सर्वव्यापी और चैतन्यमय है। यह स्वयं सिद्ध है। अज्ञानग्रस्त जीव इसको नहीं जान सकता। अज्ञानमुक्त जीव ही इसको देख सकता है। ज्ञान इसका साधन है! ज्ञानसे "तत् त्वं असि" "वहे तू है!" का अनुभव आता है! वैसे ही श्री भास्कराचार्यके मतसे ब्रह्म ही इस विश्वका एकमात्र तत्त्व है। इसको जाननेका साधन आगम है। यह अद्वितीय है। जगतका उपादान कारण भी ब्रह्म ही है। कारण ब्रह्ममें ही कार्य ब्रह्म निहित रहता है। ब्रह्मके विषयमें अलग अलग दार्शनिकोंने इतना अधिक कहा है उन सबको देखनेसे "ब्रह्मका भ्रम" बड सकता है। इसलिये उपनिषदकी शिक्षापद्धति अच्छी है। ब्रह्म मौन है। मौन ही ब्रह्मका वास्तविक रूप है। एक कन्नड संतने कहा है "बिना ओर छोरके लहर मारनेवाले आनंद सागरको शब्दके चम्मचसे कितना भार जायेगा ? और इसकी आवश्यकता भी क्या है ? मौन ही वास्तविक ब्रह्म ज्ञान है।" ब्रह्मचर्य—सतत सर्वत्र ब्रह्मचिंतन जन्य श्रेष्ठ आचरण। विषय चिंतनसे अन्य आचरण होता है। जिसके जीवनमें ब्रह्म-चिंतन जितना अधिक उसके आचरणमें एक प्रकारकी प्रतिष्ठा उतनी अधिक आती है। उसको बाहरी भोगादिकी आवश्यकताका अनुभव नहीं होता। अपनेमें ही एक पूर्णताका अनुभव बढ़ता जाता है। वह अपन आपमें सुखसंतोषका अनुभव करने लगता है। उसका मन सदैव प्रसन्न रहता है। उचटा हुवा नहीं रहता। इसलिए उसको मनोरंजनके लिए १७३ परिशिष्ट ५

बाहरी साधनोंकी आवश्यकता नहीं होती जो आंतरिक अपूर्णताके कारण बाह्य-विषय चिंतनसे अनुभव होती है। ब्रह्मचर्य एक धनात्मक भाव और पूर्णताजन्य आचरण है। ऋणात्मक भावसे प्रेरित नकारात्मक आचरण नहीं । सदा सर्वत्र ब्रह्म चिंतनजन्य प्रसन्न मनका प्रकटरूप ही ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मभाव—आत्मा अथवा ब्रह्मकी कोई उपाधि नहीं । वह निरुपाधिक है । उस निरुपाधिक ब्रह्ममें अपनेको विलीन करके, स्वयं ब्रह्मरूप हो कर-निरुपाधिक हो कर-रहना ही ब्रह्म-भाव है । ब्रह्म-भावमें सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है बिना ब्रह्मका और कुछ नहीं इसका अनुभव करते हुए “सोऽहं” भावसे निर्विषय हो रहना ही ब्रह्मभाव है । “बिना ब्रह्मके और कुछ भी नहीं; मैं ही ब्रह्म हूं” इस भावसे मनुष्य द्वंद्वातीत और निर्विषय हो जाता है। सब कुछ मैं हूँ तब भला किससे राग करें किससे द्वेष करें ? अथवा किससे डरें ? ऐसी स्थितिमें साम्य-भाव जगता है जो ब्रह्म भावका प्रकटीकरण है ! निरुपाधिक हो कर इस स्थितिमें रहना ही ब्रह्मभाव है । ब्रह्मरंध्र—इसको दशमद्वार भी कहा गया है। यह मस्तक पर-तालूमें-रहनेवाला एक गुप्त छेद है। इसको सहस्रार भी कहा गया है। जब कुंडलिनी इस ब्रह्मरंध्र अथवा सहस्रारमें प्रवेश करती है तब आत्म-दर्शन होता है। वैसे आत्म-निष्ठ योगी शरीरत्यागके समय इसी ब्रह्मरंध्रसे प्राणोत्क्रमण करता है । ब्रह्मसूत्र—ब्रह्मसूत्रोंको वेदांत कहते हैं। बादरायण इसका रचयिता है। व्यासने इन ब्रह्मसूत्रोंमें उपनिषदोंका सारा ज्ञान भर दिया है। एक ही शब्दमें ब्रह्म-सूत्रोंको “उपनिषद्का सार सर्वस्व” कह सकते हैं। प्रत्येक सूत्रके मूलमें कई उपनिषदमंत्रोंका सार है। इन्हीं ब्रह्म- सूत्रोंके आधार पर अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि संप्रदाय बने हैं। आद्य शंकरा- चार्य, श्रीरामानुजाचार्य श्रीमन्मध्वाचार्य श्रीवल्लभाचार्य आदि आचार्योंने इन सूत्रोंपर भाष्य लिखे हैं। श्रीमध्वाचार्यके चरित्रमें इस प्रकारके २१ भाष्य और भाष्यकारोंके नाम मिलते हैं । ब्रह्मसूत्र अत्यंत प्राचीन ग्रंथ है । भगवद्गीतामें इस ग्रंथका उल्लेख है। इस परसे कह सकते हैं यह कि गीतासे भी प्राचीन है ! इसके चार अध्याय हैं। इस पर आद्य शंकराचार्यका अद्वैतभाष्य आज प्राप्त भाष्योंमें सर्व प्राचीन है। इस ग्रंथ पर लिखे महत्वपूर्ण भाष्योंका विचार किया जाय तो शांकरभाष्य (ई. स. ७८८-८२०) भास्करभाष्य (नववी सदी) रामानुज भाष्य (बारहवी सदी) निंबार्कभाष्य (तेरहवी सदी) मध्वभाष्य (तेरहवी सदी) श्रीकंठभाष्य (तेरहवी सदी) श्रीकरभाष्य (चौदहवी सदी) वल्लभभाष्य (१४७९-१५४४) विज्ञानमुसुक्षुभाष्य (सोलहवी सदी) बलदेव भाष्य (अठारहवी सदी) शक्तिभाष्य (बीसवी सदी) इ. ब्रह्मसूत्रोंमें ब्रह्म या आत्माके स्वरूपका विचार किया है। ब्रह्मसूत्रका ब्रह्म, निर्विशेष तत्व है। यह सर्वव्यापी चेतन है। यह स्वयंसिद्ध और स्वप्रकाश है। अज्ञानके कारण यह अनुभवमें नहीं आता। ज्ञानसे देख सकते हैं । भक्ति—मोक्ष-प्राप्तिके अनेक मार्गोंमें एक मार्ग । इसके विषयमें इतना अधिक साहित्य है कि एक एक पुस्तकमैसे सार-भूत एक एक वाक्य चुन लिया तो भी वह एक छोटीसी पुस्तिका हो जायेगी । इसके साथ ही साथ इस विषयमें इतने अधिक भ्रम हैं कि भक्तिका वास्तविक रूप समझना उससे अधिक कठिन है ! ज्ञानेश्वरी १७४

ईश्वरसे अनुरक्त होनेसे मोक्ष मिलता है यह भक्ति-मार्गका मुख्य प्रतिपादन है। यह ज्ञान और कर्मसे भिन्न मार्ग है। सभी वैष्णवसंप्रदाय भक्तिको साध्य-तत्त्व मानते हैं। यह भागवत धर्मका सार है। किंतु शैवोंने भी इस पर विचार किया है। शैव संतोंने भी यह साधना की है। उनकी भक्ति-साधनामें गहराईका अधिक अनुभव आता है। भक्तिका अर्थ करते समय "परमात्मामें अनुरक्ति ही भक्ति है।" ऐसे शांडिल्यमुनिने कहा है तो "नारदने परमात्मासे परम प्रेमका रूप ही भक्ति" कहा है और पराशर "परमात्मासे पूजादि अनुराग ही भक्ति" कहते हैं। भक्तिके विषयमें ऐसे अनेक सूत्र कहे जा सकते हैं। किंतु सबका सार "परमात्मतत्त्वमें विलीनता" है। एक ही शब्दमें कहना हो तो "मेरा नाम मरे हरिका नाम रहे !" ही भक्ति है। इस भक्तिके विषयमें अनेक विद्वानोंने अनेक प्रकारके अनुसंधान किये हैं। अनेक प्रकारके "अनुसंधानात्मकभ्रम" फैलाये हैं। कुछ विद्वानोंके मतानुसार "भारतमें भक्तिकी कल्पना अर्वाचीन है। वह ईसाई धर्ममेंसे हिंदुओंने ली है।" किंतु "ईसासे पूर्व कई सदियोंसे भारतमें भक्तिका विकास हुवा था और बौद्धधर्मकेद्वारा वह ईसाई धर्ममें गया !" यह दूसरे विद्वानोंने सिद्ध कर दिया है। इतने पर भी "वेदमें भक्तिके लिये कोई स्थान नहीं है !" कहनेवाले विद्वान भी कम नहीं है "वेद कोरा कर्मकांड है !" "वैदिकधर्म कर्मप्रधान है।" "उपनिषद ज्ञान प्रधान है !" आदि कहा जाता है। किंतु यदि "ईश्वरसे अपना कोई नाता जोड कर उससे अविभक्त होना" (भगवान रामकृष्ण परमहंस) भक्ति है तो ऋग्वेदका पहला सूक्त 'अग्निमीळे पुरोहितं' भक्ति सूक्त है! इस सूक्तका अंतिम मंत्र है- देवा अग्नि सहज हो गम्य तू जैसे "पुत्रको पिता।" कल्याण कर पास रहके ॥ वैदिक ऋषि यहां अग्निको पिता मान कर अग्निसे अपने लिये "तू (मुझसे) सहज हो" ऐसे कहता है जैसे अबोध बालक अपने पितासे हाथ उठाकर "गोदीमें ले" कहता है। और यदि पिता गोदीमें नहीं लेता है तो धोती पकडकर ऊपर उछलता है ! मानो वह कहता है "यह मेरा अधिकार है ! आंख क्यों बताता है ? सहज हो कर देख ! प्रेमसे देख ! मेरा अधिकार मुझे दे !" यह वैदिक ऋषिकी तेजस्वी भक्ति है। ऋग्वेदके कई सूक्तोंमें इस प्रकारकी तेजस्वी भक्तिका पावन दर्शन हो सकता है ! भक्तिका अर्थ 'भगवानके सम्मुख दीन और भिखारी बन कर रोना ही नहीं है। "भक्त पुत्रभावसे, सखा भावसे, भगवानसे लडता भी है। जैसे संत तुकाराम कहता है " क्या तू समझता है तूने मुझे बनाया है ? ना मैंने तुझे बनाया है। भक्त भगवानका बाप है ! तू अपने चरण मुझसे छीन नहीं सकता ! "यहां पर भी पिता पुत्र नाता है। ऋग्वेदके ऋषिके "देवा ! तू मुझे सहज हो गम्य हो !" के आगेकी बात तुकाराम कहता है। इसी तेजस्वी भक्तिका और एक रूप है "तेरी मायाने सारे विश्वको लपेट लिया है किंतु तुझे मेरे हृदयने लपेट किया है !" जैसे सारे परिवारको अंगुलियों के इशारे पर चलानेवाली गृहस्वामिनी नन्हेसे दूध मुहे बच्चेकी मुट्ठीमें रहती है ! यह समर्पण- जन्य तेजस्विता है। भक्तिमार्ग अथवा भक्तियोग भावशक्तिसे परमात्म-प्राप्तिकी साधना है जैसे ज्ञानयोग बुद्धि शक्तिसे तथा कर्मयोग क्रियाशक्तिसे परमात्म तत्वको प्राप्त करनेके मार्ग हैं। वस्तुतः ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि जीवनके पृथक् पृथक् विभाग नहीं हैं। १७५ परिशिष्ट ५

जीवन एक अखंड प्रवाह है। बुद्धिमत्तित्वसे सत्यको जानना ज्ञान है तो जो जाना उसको आचरणमें लाना कर्म है। जैसे सच बोलना चाहिए यह जानना ज्ञान है और सच बोलना कर्म। और झूठ बोलना अज्ञान ! वैसे ही परमात्म तत्त्वसे प्रेम करना भक्ति है, जिससे प्रेम किया जाता उसीका चिंतन करना (जो सहज है) ध्यान है, और जिससे प्रेम किया जाता, सदैव जिसका चिंतन होता है उसको जानना (यह भी सहज है) ज्ञान है। इसलिये ज्ञान, भक्ति, ध्यान, कर्म आदिमें एकता है। इनका संबंध ३६ का नहीं ३३ का है। एकके बाद एक सहज है। भारतके धार्मिक अथवा आध्यात्मिक आंदोलनका इतिहास वेद-कालसे प्रारंभ होता है। इसका अर्थ इसके पहले कुछ नहीं था ऐसा नहीं किंतु इसके पूर्वकालकी विशेष कोई जानकारी नहीं ऐसे कहना ही समुचित होगा। प्राचीन वैदिक धर्मका आंदोलन यजन प्रधान-यज्ञ-प्रधान था। वहां यज्ञप्रधान कर्म था। इसका इतना अधिक सुव्यवस्थित “शास्त्र” बना कि इस “शास्त्र” से बाह्य ढांचेसे-परमात्माका ज्ञान होना असंभव है ऐसे मान कर जिसके लिये यज्ञादि किया जाता है उसका “ज्ञान” प्राप्त करनेके लिये “चिंतन” और अनुसंधान प्रारंभ हुआ। यह है उपनिषद- काल। उपनिषदकाल ज्ञानप्रधान कर्मका काल है। निःश्रेयस प्रधान साधनाका काल रहा। किंतु इसमेंसे ज्ञानोत्तर जीवनमें कर्म आवश्यक या अनावश्यक ? ज्ञानोत्तर संन्यास जैसे विचारोंने जन्म लिया। उसके बाद उपनिषद प्रणीत निर्गुण निराकार ब्रह्मतत्वका आकलन-सर्व सामान्य लोगोंके लिये-असंभव होनेसे यजनप्रधान कर्मके स्थानपर भजनप्रधान या पूजनप्रधान कर्मका प्रारंभ हुआ। इसे भक्तिमार्ग कहा गया। इसमें सगुण अथवा साकार प्रतीक-यज्ञकुंडके स्थान पर मूर्तिकी- स्थापना हुई। यज्ञमें आहुति डालकर यज्ञ-शिष्ट खानेके स्थान पर मूर्तिके सम्मुख रखकर-नैवेद्य- करके प्रसाद खाया जाने लगा। भक्तिका भी एक तंत्र बना। शास्त्र बना। उसके बाह्य उपचार बने। आवरण बना। निर्गुण ब्रह्मके सगुण प्रतीक बने। निराकार तत्त्वके अलग अलग आकार बने। उसके अलग अलग पूजा-प्रकार बने। यजन प्रधान यज्ञकर्म पूजन प्रधान भक्ति-कर्म बना। भक्तिका तंत्र विकसित हुआ। उसके प्रकार बने। इस प्रकारकी भक्ति परंपरा भगवद्- गीतोत्तरकालमें विकसित हुई। इसे भागवत धर्म कहा गया है। विद्वानोंने इस भागवत धर्मके इतिहासका भी अनुसंधान किया है। इसका पहला नाम नारायणीय धर्म था। इसके आचार्य नरनारायण ऋषि थे। इसी धर्ममें, धर्म-परंपरामें श्रीकृष्णका जन्म हुआ। भगवद्गीता इसी नारायणीय धर्मका तत्वज्ञान कहती है ! इसी भगवद्गीता तथा उसको कहनेवाले भगवान कृष्णसे भागवत धर्मका प्रसार हुआ। यह काल ई. पू. १४०० साल माना जाता है। इन ३०००-३५०० सालोंमें इस भागवत धर्ममें अनेक परिवर्तन हुए। अनेक शाखा उपशाखाओंसे वह फैला यद्यपि आजभी उसके मूल-तत्त्व उसमें स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। इस मूल एकेश्वरी भक्ति पंथमें उस समय प्रचलित योगादि साधन प्रणालियोंके अच्छे अंगोंको स्वीकार किया गया। उसके बाद भक्तिके तंत्र और व्यूहोंका विकास हुआ। वैष्णव आगम शास्त्रका विस्तार हुआ। फिर ई. स. ११ वीं सदीमें श्रीरामानुजाचार्यने, बारहवीं सदीमें श्रीमध्वाचार्यने, इसके बाद श्रीवल्लभाचार्यने अपने अपने ढंगसे भागवत धर्मका विस्तार किया। इस बीचमें श्रीभास्कराचार्य और श्रीनिंबार्काचार्यने भी इस दिशामें पर्याप्त कार्य किया है। किंतु इसी बीच, महाराष्ट्रमें ज्ञानेश्वर महाराजने अपने ही ढंगसे नवोदित भागवत धर्मकी नींव डालकर उसका विस्तार किया। उपरोक्त आचार्य और ज्ञानेश्वर महाराजमें जो विशेष अंतर रहा वह, भाषाका रहा, आचार्योंने विद्वन्मान्य संस्कृत-भाषाका ज्ञानेश्वरी १७५

सहारा किया और ज्ञानेश्वर महाराजने लोक-भाषा या ज्ञानेश्वरके शब्दोंमें कहना हो तो "देशी" का आसरा लिया। आचार्योंने भक्तिका शास्त्र रचा । नव-विधा भक्तिके प्रकार (१) श्रवण (२) कीर्तन (३) स्मरण (४) पादसेवन, (५) अर्चन (६) वंदन (७) दास्य (८) सख्य (९) आत्मनिवेदन बताकर उसमें एक एक प्रकारका रूप दिखाते हुए भक्तिका तंत्र रचा ! अर्चनके रूपमें अनेक प्रकारकी पूजा-पद्धतिका विकास किया । प्रातःकालमें कैसी पूजा करनी चाहिए, माध्याह्नमें क्या करना चाहिए, शामको कैसी पूजा करनी चाहिए, भगवानको अर्पण करनेवाला तुलसीदल किन अंगुलियोंसे पकडना चाहिए । अभिषेकके समय शंख कैसा पकडना चाहिए । एक या दो, सूक्ष्म सूक्ष्म नियमोंसे भक्तिको सजाया । वंदनमें भी ! कब कैसा वंदन करना चाहिए, कब कब साष्टांग नमस्कार करना चाहिए, नमस्कारमें कौन कौन अंग भूमिको लगने चाहिए, यहां तक विवेचन किया ! फिर उन्होंने पुराणादिमें खोज खोज कर किस प्रकारकी भक्तिसे किसका उद्धार हुवा ! यह बता कर कहा । परीक्षितकी भांति श्रवण भक्ति करनी चाहिए, नारदकी भांति कीर्तन और प्रल्हादकी भांति स्मरण भक्ति करनी चाहिए, लक्ष्मीकी भांति पाद- सेवन करना चाहिए, अक्रूरकी भांति वंदन भक्ति करनी चाहिए, हनुमानकी भांति दास्य-भक्ति करनी चाहिए, अर्जुनकी भांति सख्यभक्ति करनी चाहिए, बलिकी भांति सर्वस्व समर्पण करना चाहिए !!" इससे भक्तिका वातावरण तैयार हुआ । उत्सवादि होने लगे । वैभव-प्रदर्शन हुवा किंतु भक्ति भाव जकड गया ! भक्तिका धर्म बना किंतु उसकी आध्यात्मिकता गयी । भक्तिका तंत्र खिला किंतु मंत्र मुर्झा गया ! भक्तिका प्रदर्शन खूब हुवा किंतु आत्म-दर्शन खो गया । ज्ञानेश्वर महाराजने भक्तिका तंत्र, जो बहिरंग प्रदर्शन करता है उसको छोड कर, भक्तिके मंत्र, हृदयको ले लिया । गीताका नौवा और बारहवा अध्याय भक्तिका रहस्य खोलकर बताता है । नौवे अध्यायमें भक्तिका हृदय है और बारहवे अध्यायमें उसके लक्षण । नौवा अध्याय कहता है " सर्वत्र मैं हूं" बारहवा अध्याय कहता है " इसलिये भक्तको सबसे द्वेषरहित होना चाहिए, सबसे प्रेमपूर्वक रहना चाहिए, कहीं भी अहंकार नहीं करना चाहिए, सुख दुःख सम मानना चाहिए, क्षमामूर्ति बनना चाहिए, समदृष्टि बनना चाहिए " आदि चोबीस गुणोंकी सूची है ! भगवद्गीता पढ़ते समय वे "केवल शब्द" से लगते हैं किंतु ज्ञानेश्वर महाराजने सैकडो छंदोंमें उसका भाव-गांभीर्य और अर्थ-व्याप्तिका परिचय दिया है । ये चौबीस गुण सजीव हो गये हैं । वैसे ही तेरहवे अध्यायमें ज्ञानीके लक्षण कहे गये हैं। उसमें भी ज्ञानीके अमानित्व, अदंभ, अनहंकार, आदिका अर्थ कहनेमें पांच सात सौ छंद कहे हैं। "आचार्योपासना" इस एक शब्दका अर्थ कहनेमें तो "गुरु-भक्ति" वर्णन करते करते भक्तिके "आर्तभाव दास्य-भाव, सखा-भाव, वात्सल्य-भाव, मधुरा-भाव" इन पांच भावोंका रहस्य खोलकर रख दिया है। साथ साथ, उपनिषदमें कही गयी अपनेको "गुरुसेवामें निःशेष कर" देनेकी पराकाष्ठा बतायी गयी है ! वैसे ही शिष्यको किस तरह अपनी क्रिया-शक्ति प्राण-शक्ति, बुद्धि-शक्ति, चिंतन-शक्ति, तथा भाव- शक्तिसे गुरु-हृदयको प्रसन्न करके अपना लेना चाहिए इसका भी दर्शन है । इस प्रकार "गुरुको सम्मुख रख कर सगुणोपासना" का रहस्य समझाया है । ऐसे करते समय मंदिर, मठ, पूजाके तांत्रिक विधि-विधानकी कठोर आलोचना अथवा उपरोधिक व्यंगादि नहीं है फिर भी नौवे अध्यायमें भगवानके मुखसे ही अर्जुनको इस प्रकारकी पूजा अर्चा विधि विधानयुक्त भक्तिका अत्यंत सौम्य शब्दोंमें व्यर्थता दिखाई है । यदि परमात्मा सर्वत्र है तो वृक्षलताओंमें भी है न ? तब भला पेड भगवान पर खिले हुए फूल मोच कर पत्थर भगवान पर चढ़ानेमें क्या स्वारस्य है ? १७७ परिशिष्ट ५

वैसे ही, यद्यपि ज्ञानेश्वर महाराजने महाराष्ट्रमें नवोदित भागवत धर्मकी नींव डाली, फिर भी ज्ञानेश्वर महाराजकी गुरु-परंपरा शैव है। नाथसंप्रदाय शैवसंप्रदाय है। आज कल सर्वत्र भक्ति साहित्य अथवा भक्ति संप्रदायके रूपमें वैष्णव साहित्य और वैष्णव संप्रदाय ही प्रचलित है किंतु भारतीय संस्कृतिमें शैव संप्रदायका महत्व-पूर्ण स्थान रहा है। शैव संप्रदायमें भी भक्ति-साधना की गयी है। और उसमें अधिक गहराई है। शैव-भक्ति साधनामें उत्सवादिका बाहरी आडंबर उतना नहीं है जितना वैष्णव भक्ति साधनामें है किंतु आध्यात्मिक गहराई पर्याप्त है। शैव भक्ति “सभनोंके हृदयमें परमात्मा मान कर "भक्त देह ही मम देह कहता है शिवजी !" इस पर विश्वास रखती है। इस कारणसे वह "देह ही देवालय" मान कर "यह परमात्माके निवास योग्य हो !” इस प्रकारके प्रयासको भक्ति मानता है। शैवोंने दीक्षासे जीवनमुक्तावस्था तक भक्ति साधनाको “प्रवास क्षेत्र" मान कर भक्ति साधनामें आनेवाले अनुभवोंके आधार पर भक्तिके छ पड़ाव-स्थल-माने हैं। तथा भक्तिके छ प्रकार माने हैं। किस स्थल पर किस प्रकारके अनुभव आयेंगे तथा कौनसा अनुभव आनेपर क्या करना ? ऐसा साधनाक्रम कहा गया है जो अधिकतर आंतरिक चित्त-शुद्धिका है। वहां भक्तके लिये व्रत कहे हैं जो गुण-विकास प्रधान है जैसे गीतामें अद्वेष आदि हैं। शैव भक्तों ने पर्याप्त नाम महात्म्य गाकर भी “जैसे रोटी रोटी कहनेसे पेट नहीं भरता, दीप दीप कहनेसे प्रकाश नहीं मिलता" ऐसे उदाहरण देकर “केवल नाम जपसे कुछ नहीं बनता ! भगवानका नाम जीभ पर लेनेके पहले, असत्य वचन छोड़ कर, कटु वचन छोड़ कर, पर निंदा छोड़कर...... जीभ शुद्ध करनी चाहिए ! तभी वह जीभपर खेलेगा ! फलेगा !!" ऐसे जीवन शुद्धिका मार्ग बताते हुए "पर-द्वेष छोड़ कर, सबसे प्रेमसे रहकर, परवित्त परदारापहरणका विचार भूलकर......हृदय शुद्ध होने पर “जप दैवत" हृदयमें स्थिर होगा !" आदि सिद्धांत अथवा विधि-निषेध बताकर भक्ति मार्गके छ पड़ाव बताये हैं। इन्होंने भक्ति-साधनाके लिये जो व्रत कहे हैं वे भी विचारणीय हैं। "परायी संपत्तिको न छूना व्रत है ! तथ्योंको गलत न समझना और समझाना एक व्रत है ! जो जो जैसे अनुभव होता है उसको निर्वचनासे वैसे ही व्यक्त करना एक व्रत है ! अपने उपास्यसे एक निष्ठ रहना एक व्रत है !” इसी भांति उनका पूजा विधान है ! वे कहते हैं “बिना इसके कोटि कोटि जप भी व्यर्थ हैं !” इस प्रकार व्रतस्थ भक्तोंमें ऐक्य-भक्त, गीताकी भाषामें जो “मद्रूप" हुआ है सर्व श्रेष्ठ है। इसमें और परमतत्वमें कोई अंतर ही नहीं। इससे नीचे है शरण भक्त है। वह सर्वस्वी ईश्वर शरण है। उसने सब कुछ ईश्वरापंण करके अपना कुछ नहीं रखा है। ऐसा भक्त सदैव ईश्वराधार होता है। अगर कुछ उसका है तो ईश्वर है। भूख-प्यास लगी तो वह ईश्वरको पेट दिखा कर रोता है ! वह कहता है "तुझे पूजूंगा, तुझे गाऊंगा। तेरा स्मरण करूंगा। तेरा ही आधार चाहूंगा ! तेरे बिना मेरा और कुछ नहीं !! तू है तू है तू ही है !!!" ऐसे भक्तोंने आचार्योंसे प्रचलित "विधिविधान युक्त तांत्रिक पूजा अर्चाका" उपहास किया है। ऐसे भक्तोंने अपने स्वामीका परिचय देते समय “सर्वात्मक देव !" "जगदंतर्यामी !” "आदि पुरुष" आदि शब्दोंके प्रयोग किये हैं। तथा जैसे देव-भक्त हैं वैसे देश-भक्त भी हैं। देव तथा देश इसका विचार छोड़ दिया जाय तो भी पतिभक्ति, परिवारभक्ति, ध्येयभक्ति, भक्तिके ये अनेक प्रकार हैं। किंतु किसी भी प्रकारकी भक्तिकी आधारशिला निष्ठा है। और उसके लिये आवश्यक सातत्यको टिकानेके लिये मनुष्यको कुछ गुणोंकी आवश्यकता है। वे गुणही भक्तिका हृदय है। इसके लिये बाहरी आचरणकी कोई आवश्यकता नहीं दीखती। दैवी गुणोंकी उपासना करते ज्ञानेश्वरी १७८

करते, अपनेमें दैवी गुण का कर उनका विकास करते करते, मनुष्यको महादेव बनना है। मनुष्यका ऐसे महान बननेकी साधना ही भक्ति है। मानव समाजके पूर्वज अपनी थाथीके रूपमें जो आनेवाले मानवी समाजको देते आये हैं, भले ही वह समाज शैव हो, वैष्णव हो, हिंदू हो, मुसलमान हो, या ईसाई; पाश्चात्य हो या पौर्वात्य। सबके सब जगदंतर्यामीके भक्त हैं! क्यों कि वह जगदंतर्यामीसे अविभक्त है। अनेक कारणोंसे मनुष्य इस अविभक्तत्वका, एकताका अनुभव नहीं कर सकता इतना ही। इसी एकताके अनुभवके लिये मानवकुलने जो जो साधना की है उसकी संस्कार संपत्ति, आनेवाले वारसको दी है। ऐसे देते आये हैं। इसलिये भक्तिका इतिहास मानव-कुलके इतिहासके साथ जुडा हुआ है। भले ही देश-कालके अनुसार उसका बाह्यरूप बदलता गया हो। इसका अंतरंग एक है। वह है अपने पूर्वदांतर्यामीसे ऐक्यताका अनुभव करना। इस अनुभवसे जीवनमें पूर्णता आती है। वह जीवन सदैव आनंद-विभोर रहता है। यही मानव-जीवनका अंतिम साध्य है। सदैव, सर्वत्र, निरालंब शाश्वत आनंदमें लीन रहे ! भ्रूमध्य—दो भौवोंके बीचका स्थान। योग-मार्गमें इस स्थानका अत्यंत महत्त्व है। षट्चक्रोंमें यह आज्ञाचक्रका स्थान है। ज्ञानतंतुओंकी, अथवा इडा, पिंगला, सुषुम्नाके अतिरिक्त गांधारी, हस्तिजिन्हा, पूषा, पयस्विनी, अलंबुसा, कौशिकी, कुहू, शंखिनी, वारुणी, विश्वोदरी, सरस्वती आदि सूक्ष्म नाडियोंके उलझनसे बने हुए कमलकी ६ चक्राकृतियोंको योग-शास्त्रमें चक्र कहा है। कहीं कहीं कमल भी कहा गया है। मूलाधार चक्रसे-जो कुंडलिनी शक्तिका स्थान है- जागृत कुंडलिनी शक्ति जब सहस्रारकी ओर बढ़ती है तब उसके स्पर्शसे ये चक्र कमलसे खिलते हैं। इसको कुंडलिनीद्वारा किया गया चक्रभेदन अथवा षट्चक्र शोधन कहते हैं। दो भौवों के मध्य जो आज्ञाचक्र होता है उससे मेरूदंडस्थित सुषुम्नाका सीधा संबंध है। दो भौंवोंका बीचका यह चक्र इसकी सीधमें, पीछे मेरुदंडके अंतिम छोर पर है। वह विद्युत् वर्णका है तथा इसकी दो पंखुडियां हैं। सद्गुरु इस चक्रकी देवता है। आज्ञाचक्रमें ध्यान करनेसे उपनिषदमें कहे गुरुहृदय निकटता, गुरुमें निःशेष होनेकी साधना सिद्ध होती है तथा गुरुकी इच्छाशक्ति शिष्यमें कार्य करने लगती है। इससे शिष्यका शिष्यत्व-पृथक्त्व-नष्ट हो कर गुरु-शिष्यके जीवनका समरसैक्य होते हुए साधक पूर्णत्वस्थाको पहुंचता है। मन—ऋग्वेदमें विराट्-पुरुषका वर्णन करते समय "चंद्रमा जिसका मन है!" कहते हुए मनके विषयमें अत्यंत सूचक ज्ञान दिया गया है ऐसे विद्वानोंको कहना है ! चंद्रमा पर-प्रका- शित है। स्वप्रकाशित नहीं। वैसे ही मन है। यह परोपजीवी है ! इसी मनके विषयमें कहा है "वह त्रिकालके विषयमें जानता है। मनके कारण इंद्रियोंसे सब काम होता है। जागृतिमें वह दूरातिदूर जाकर निद्रामें समीप आकर आत्म-दर्शनमें समर्थ होता है। वह इंद्रियोंका प्रेरक है। मनमें विश्वका सभी ज्ञान घर किया हुआ है। जैसे सारथी रथको सही रास्ते पर चलाता है वैसे यह मन इंद्रियोंको चलाता है। हृदयस्थ इसी मनके कारण सदैव युवावस्थामें रहता है। इसलिये मनको सदैव शुभ संकल्पसे युक्त रखना चाहिए!" उपनिषदोंमें मनके विषयमें बहुत कुछ कहा गया है। उपनिषदमें कहा है "मन अन्नमय है और वह अन्नसे बना है। उसका अस्तित्व अथवा शुभाशुभत्व पचन क्रिया पर निर्भर है। मनुष्य जो कुछ खाता है उसका ठोस भाग मल बनाता है, मध्यम ठोस तत्त्वका मांसादि बनता है और अत्यंत सूक्ष्म जीवन-तत्त्वसे मन बनता है ! दही मथनेसे जैसे उसमेंसे अत्यंत सूक्ष्म-भाग मक्खन ३७९ परिशिष्ट ५

के रूपमें ऊपर आता है वैसे!" यह छांदोग्य उपनिषदका मंतव्य है। भारतकी कई भाषाओंमें "जैसे अन्न वैसे मन" वाला मुहावरा भी चलता है। भगवद् गीतामें भी "सात्त्विक, राजसिक, तामसिक आहारसे वैसे मन बनता है!" ऐसा कहा गया है। इसीलिये भारतीय विचारकोंने "नैतिक दृष्टिसे भी अन्नशुद्धिका विचार" किया है। उपनिषद् कहते हैं "पवित्र अन्नसे सत्त्व-शुद्धि होती है। सत्त्व शुद्धिसे स्मृति दृढ होती है। स्मृति दृढ होनेसे मनुष्य-मन-बंधन मुक्त होता है।" उपनिषदोंमें कहा गया है "मनसे ही मनुष्य सुनता देखता है। मनसे ही वह संकल्प करता है। काम, चिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लाज, भीति आदि सब मनके ही रूप हैं।" मनोव्यापारोंका विवेचन करते समय ऐतरेयोपनिषदमें कहा गया है "संज्ञान, अज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, स्मृति, संकल्प, क्रतु, प्राण, जीववशा, काम, आत्मसंयम, ये सब मनके अलग अलग नाम हैं!" इसी उपनिषदमें उपरोक्त शब्दोंसे वर्णित मनके अनुभवोंका विश्लेषण भी किया गया है। बृहदारण्यकोपनिषदमें "वृक्ष तोड़ने पर उसकी जड़ सजीव होनेसे जैसे वह पुनः जीवित हो उठती है वैसे मृत्युरूपी वृक्ष तोडनेवालेने बार बार तोड़ने पर भी बहर कर बढनेवाले इस जीवन-वृक्षकी जड़ कौनसी होगी भला?" ऐसे प्रश्न करके "मनमें पूँजीभूत किये हुए संस्कार जिससे जीव पुनः पुनः शरीर लेकर आता है" ऐसे कहा गया है। मीमांसा दर्शनके अनुसार मन अंतरिंद्रिय है। वह भौतिक है। मन स्वतंत्र रूपसे आत्म- गुणोंका ग्रहण कर सकता है। मनको आत्माके संयोगसे ज्ञानेंद्रियों द्वारा बाहरी विश्वका ज्ञान होता है। न्यायदर्शनमें मनको अंतरिंद्रिय मानकर कहा गया है। "मनके द्वारा ही सुख दुःख राग द्वेषादि अनुभव होता है। मन अणु-परिमाण है। मन एक समय एक ही स्थान पर रहता है। आत्मा तथा इंद्रियोंके साथ न हो तो मनको कोई ज्ञान नहीं होता। मन शरीरमें रहता है। मरनेके साथ यह शरीरसे निकल जाता है। यह उपसर्पण कर्म कहाता है। यही मन अपने संस्कारोंके साथ आगे दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। न्याय-दर्शनके अनुसार मोक्षावस्थामें भी मन आत्माके साथ रहता है।" इतना मनका महत्त्व है। दर्शनकारोंने मनको "संकल्प-विकल्पात्मक" माना है। आधुनिक मानस-शास्त्री भी शरीर और मनका संबंध मानकर पचन-क्रिया और मनका संबंध स्वीकार करते हैं। अंग्रेजी भाषाकी "सुदृढ शरीरमें ही सुदृढ मन" कहावत प्रसिद्ध है। इसीलिये हठ योगमें मनको स्थिर करनेके लिये-शरीर पर ध्यान दिया है। वहाँ शरीर शुद्धिका अत्यंत महत्त्व है। उनका कहना है "संपूर्ण स्वस्थ शरीरमें ही सदैव मन एकाग्र रहता है!" कुछ विद्वान मनको अग्नि-तत्त्वका अंश मानते हैं। तथा मन उसके विषय एक हैं। मनुष्यमें मन और आत्मतत्त्वका संयोग होनेसे ही मनुष्य अन्य प्राणियोंसे भिन्न है और अन्य कोई प्राणि नहीं कर सकते ऐसे महत्त्वके काम करता है। इसी कारणसे उसको ज्ञानेंद्रियोंकेद्वारा बाहरी विश्वका ज्ञान होता है। मानव और मानवेतर प्राणियोंमें इंद्रिय संवेदनकी सभी क्रियायें समान हैं। किंतु मनकी विचार करनेकी शक्ति मानवकी विशेषता है। शरीरस्थ मनका आत्मासे संबंध आता है, इसीसे वह ज्ञानेंद्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके सहारे उसको स्मरणमें रखकर-विचार कर सकता है। विचार करनेका अर्थ अपने उस अव्यवस्त ज्ञानसंग्रहको जो इंद्रियोंके द्वारा एकत्र किया गया है तरतीबसे रखकर रूप देता है! मनके दो प्रकार होते हैं। (१) क्रियाशील मन (२) निष्क्रिय मन। निष्क्रिय मन शरीरके साथ ही जन्म लेता है और शरीरके साथ समाप्त भी होता है किंतु क्रियाशील मन ज्ञानेश्वरी १६०

चिरंतन स्वरूपका है जो संस्कार रूपसे पुनर्जन्ममें भी साथ जाता है। जीवनके सारे संस्कारोंको वह संग्रह कर लेता है। स्मरणके रूपमें वही विचारका साधन बनता है। मनुष्यकी सभी इच्छाएं, भावनाएं, विचार, विकार आदिका संघर्ष मनमें होता है और बुद्धि इन सबका विवेचन, विश्लेषण, तुलना, आदि करके तर्कसे अनुमान लगा कर निर्णय करती है। और जीवनको निश्चयानुसार चलाती है ! महत्तत्त्व—यह सांख्यका शब्द है। प्रकृतिके सात्विक अंशसे महत् तत्त्वकी-जिसे बुद्धितत्त्व भी कहते है-अभिव्यक्ति होती है। महत्को प्रकृतिकी विकृति भी कहा गया है। महत्त्वमें भी सत्व रज तम हैं। किंतु सत्व इसका प्रधान गुण है। सत्वका धर्म तथा प्रकाश इसके सूक्ष्म रूपमें निहित है। सभी गुण महत् तत्त्वमें परिणत नहीं होते। अंतमें-प्रलयकालमें-महत् तत्व त्रिगुणोंमें ही विलय होता है। जब महत्तत्त्व गुणत्रयमें लीन होता है तब वह बारह हिस्सोंमें बंटा जाता है। उसमें दस हिस्से शुद्ध सत्वमें तथ एक एक रजस् और तमस्‌में लीन होते हैं। फिर सृष्टिके समय इन्हीं भागोंसे महत् तत्व बनता है। महाशून्य—बौद्ध योगाचारमें अथवा बुद्धागममें शून्य अनिर्वचनीय है। बौद्ध दर्शनमें कहा गया है "जो इस शून्यको समझ सकता है वह सब कुछ समझ सकता है। तथा जो शून्यको नहीं समझता वह कुछ भी नहीं समझता !” यही सत्य है। यही अंतिम तत्त्व है। सारी सत्ताएं आंतरिक और बाहरी सत्ताएं-इसी शून्यमें लीन हो जाती हैं। यह शून्य सत् और असत्-अस्ति नास्ति-दोनोंसे विलक्षण है और सत् असत् दोनों शून्यके गर्भमें लीन हैं। शून्य अभावात्मक नहीं हैं क्यों कि इसी शून्यमेंसे समस्त विश्वकी अभिव्यक्ति है। यही परमपद है। इस शून्यका विवेचन करते समय कहा गया है न है सत् या न है असत् जो दोनोंसे रहा भिन्न। चारोंसे यह है मुक्त विश्नोंका पद श्रेष्ठ है॥ कुछ विद्वानोंका कहना है कि इसी शून्यवादको लेकर आद्य शंकराचार्यने अपने अद्वैतवादका विकास किया है। किंतु ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें इसका दर्शन होता है जो कुछ भी नहीं था तब था और उसीमेंसे यह सब निकला है। वह भी अनिर्वचनीय है। कुछ नहीं था तब “वह” था ऐसे कहा गया है और नासदीय सूक्तका “वह” यहां शून्य हुआ है। दक्षिणके शैव संतोंने इस शून्यका उल्लेख किया है। शून्यको निःशून्य भी कहा है वह ज्ञानेश्वरीमें शून्य और महाशून्यके रूपमें आया है। सृष्टिकी रचनाका विचार करते समय “शून्यको शून्यमें बोकर शून्यकी फसल काटी !” ऐसा वर्णन है। यह सारा शून्य है और यह सारा ब्रह्म है। दोनों एक है, उपनिषदोंमें ब्रह्मका वर्णन करते समय भी “वह अनिर्वचनीय और सत् असत्से परे” होनेकी बात कही है। वहां ब्रह्मका वर्णन मौनसे है। मौनसे जिस प्रश्नका उत्तर दिया जाता वह ब्रह्म है !! माया—कुछ विद्वानोंकी मान्यता है कि माया अथवा मायावाद श्रीआद्यशंकराचार्यके प्रतिभा-संपन्न मस्तिष्ककी कल्पना है। अथवा वह उन्होंने बौद्धोंके शून्यवादसे ली है! किंतु “मायावाद” की कल्पना उपनिषदमें मिलती है। इतना ही नहीं ऋग्वेदमें स्वयं “माया” भी मिलती है। ऋग्वेदमें कहा गया है। १८१ परिशिष्ट ५

मायासे-दीखता इंद्र आप विविध रूपसे !" यहां माया एक आवरण है जिससे इंद्र विविध रूपसे दीखता है। आवरण की यही कल्पना ईशावास्योपनिषदमें— आवृत्त है सत्यका मुख जो हिरण्मय पात्रसे । पूषा कर तू निरावृत्त सत्य-धर्म रतके हित ॥ १५ ॥ ऐसे ही १७ वे मंत्रमें ऋषि प्रार्थना करता है— पूषा तू एकाकी ऋषि यम सूर्य प्रजापति निरावृत्त कर तेरे रश्मि-व्यूह-समूहको ॥ परम-कल्याणमय रूप देख करता मैं “वह पुरुषही मै हूं" ऐसी ही बोधानुभूति ॥ इसमें संदेह नहीं कि उपनिषदमें बार बार यह शब्द नहीं आया है किंतु माया के मूलमें जो कल्पना है उसको पर्याप्त मात्रामें देखनेको मिलती है । इतनाही नहीं आद्य-शंकराचार्यजीके मायावादके लिये आवश्यक सारी विचार सामग्री वहां विद्यमान है। इसके बाद गीतामें भी— रहा है सब भूतोंके हृदयमें परमेश्वर । मायासे ही चलाता जो यंत्रों पर चढा कर ॥ यहां भगवान अपनी मायासे सभी भूतोंको चलाता है तो गीताके सातवे अध्यायमें— हीन मूढ दुराचारी मेरा आश्रय छोडके । भ्रांत होकर मायासे पाते हैं भाव आसुरी ॥ मायामें भ्रांत हो कर भगवानको भूल जाते है । माया शब्दका यहां एक अर्थ नहीं है। यहां मायाके भिन्न भिन्न अर्थ दीखते हैं। वेदमें जो इंद्रकी माया है वह इंद्रकी शक्ति है। ईशावास्यका हिरण्मय आवरण ईश्वरकी शक्ति है, और मुंडकोपनिषदकी गांठ है वह जीवकी माया है, जो अविद्या रूप है। प्रश्नोपनिषदमें भी इस प्रकारके आवरणका उल्लेख है जिससे जीव छल कपटादिमें लिपट जाता है। प्रश्नोपनिषदका यह आवरण तथा ईशावास्यका रश्मिव्यूहसमूह एक है जिसके निरावृत्त करनेसे "वह पुरुषही मैं हूँ ऐसा बोधानुभव" होता है। यही श्री आद्य शंकराचार्यके मायावादका प्रेरणास्रोत है। यह “उसे” ढकनेवाला स्वर्ण पात्र-चमकीला है जिसके विषयमें, देखने वालेको मोह हो ! जो देखने वालेकी आंखोंको चौंधिया देता है ! फिर रश्मि व्यूह समूह है जो विविध नाम रूपसे बुना गया है ! इसी प्रकार कठोपनिषदमें, मुंडकोपनि षद्में, भिन्न उपमाएँ देकर "सत्य पर आवरण” होनेकी बात कही गयी है और इस "आवरणको" अविद्या अथवा “अज्ञान” नाम दिया गया है। आगे मुंडकोपनिषदमें इसे गांठकी उपमा देते हुए कहा है। रहता हृदय गुहामें तू जान उस पुरुषको । वहां है जो अविद्या ग्रंथी खोले बिन नहीं दीखता ॥ इसीलिये उपनिषद विद्याको सामर्थ्य मानकर अविद्याको दौर्बल्य मानते हैं। अपने ही सामर्थ्यसे यह हृदय-ग्रंथी खोलनी पडती है। इसका भी वर्णन है। ज्ञानेश्वरी १८२