ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंईश्वरसे अनुरक्त होनेसे मोक्ष मिलता है यह भक्ति-मार्गका मुख्य प्रतिपादन है। यह ज्ञान और कर्मसे भिन्न मार्ग है। सभी वैष्णवसंप्रदाय भक्तिको साध्य-तत्त्व मानते हैं। यह भागवत धर्मका सार है। किंतु शैवोंने भी इस पर विचार किया है। शैव संतोंने भी यह साधना की है। उनकी भक्ति-साधनामें गहराईका अधिक अनुभव आता है। भक्तिका अर्थ करते समय "परमात्मामें अनुरक्ति ही भक्ति है।" ऐसे शांडिल्यमुनिने कहा है तो "नारदने परमात्मासे परम प्रेमका रूप ही भक्ति" कहा है और पराशर "परमात्मासे पूजादि अनुराग ही भक्ति" कहते हैं। भक्तिके विषयमें ऐसे अनेक सूत्र कहे जा सकते हैं। किंतु सबका सार "परमात्मतत्त्वमें विलीनता" है। एक ही शब्दमें कहना हो तो "मेरा नाम मरे हरिका नाम रहे !" ही भक्ति है। इस भक्तिके विषयमें अनेक विद्वानोंने अनेक प्रकारके अनुसंधान किये हैं। अनेक प्रकारके "अनुसंधानात्मकभ्रम" फैलाये हैं। कुछ विद्वानोंके मतानुसार "भारतमें भक्तिकी कल्पना अर्वाचीन है। वह ईसाई धर्ममेंसे हिंदुओंने ली है।" किंतु "ईसासे पूर्व कई सदियोंसे भारतमें भक्तिका विकास हुवा था और बौद्धधर्मकेद्वारा वह ईसाई धर्ममें गया !" यह दूसरे विद्वानोंने सिद्ध कर दिया है। इतने पर भी "वेदमें भक्तिके लिये कोई स्थान नहीं है !" कहनेवाले विद्वान भी कम नहीं है "वेद कोरा कर्मकांड है !" "वैदिकधर्म कर्मप्रधान है।" "उपनिषद ज्ञान प्रधान है !" आदि कहा जाता है। किंतु यदि "ईश्वरसे अपना कोई नाता जोड कर उससे अविभक्त होना" (भगवान रामकृष्ण परमहंस) भक्ति है तो ऋग्वेदका पहला सूक्त 'अग्निमीळे पुरोहितं' भक्ति सूक्त है! इस सूक्तका अंतिम मंत्र है- देवा अग्नि सहज हो गम्य तू जैसे "पुत्रको पिता।" कल्याण कर पास रहके ॥ वैदिक ऋषि यहां अग्निको पिता मान कर अग्निसे अपने लिये "तू (मुझसे) सहज हो" ऐसे कहता है जैसे अबोध बालक अपने पितासे हाथ उठाकर "गोदीमें ले" कहता है। और यदि पिता गोदीमें नहीं लेता है तो धोती पकडकर ऊपर उछलता है ! मानो वह कहता है "यह मेरा अधिकार है ! आंख क्यों बताता है ? सहज हो कर देख ! प्रेमसे देख ! मेरा अधिकार मुझे दे !" यह वैदिक ऋषिकी तेजस्वी भक्ति है। ऋग्वेदके कई सूक्तोंमें इस प्रकारकी तेजस्वी भक्तिका पावन दर्शन हो सकता है ! भक्तिका अर्थ 'भगवानके सम्मुख दीन और भिखारी बन कर रोना ही नहीं है। "भक्त पुत्रभावसे, सखा भावसे, भगवानसे लडता भी है। जैसे संत तुकाराम कहता है " क्या तू समझता है तूने मुझे बनाया है ? ना मैंने तुझे बनाया है। भक्त भगवानका बाप है ! तू अपने चरण मुझसे छीन नहीं सकता ! "यहां पर भी पिता पुत्र नाता है। ऋग्वेदके ऋषिके "देवा ! तू मुझे सहज हो गम्य हो !" के आगेकी बात तुकाराम कहता है। इसी तेजस्वी भक्तिका और एक रूप है "तेरी मायाने सारे विश्वको लपेट लिया है किंतु तुझे मेरे हृदयने लपेट किया है !" जैसे सारे परिवारको अंगुलियों के इशारे पर चलानेवाली गृहस्वामिनी नन्हेसे दूध मुहे बच्चेकी मुट्ठीमें रहती है ! यह समर्पण- जन्य तेजस्विता है। भक्तिमार्ग अथवा भक्तियोग भावशक्तिसे परमात्म-प्राप्तिकी साधना है जैसे ज्ञानयोग बुद्धि शक्तिसे तथा कर्मयोग क्रियाशक्तिसे परमात्म तत्वको प्राप्त करनेके मार्ग हैं। वस्तुतः ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि जीवनके पृथक् पृथक् विभाग नहीं हैं। १७५ परिशिष्ट ५