ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीवन एक अखंड प्रवाह है। बुद्धिमत्तित्वसे सत्यको जानना ज्ञान है तो जो जाना उसको आचरणमें लाना कर्म है। जैसे सच बोलना चाहिए यह जानना ज्ञान है और सच बोलना कर्म। और झूठ बोलना अज्ञान ! वैसे ही परमात्म तत्त्वसे प्रेम करना भक्ति है, जिससे प्रेम किया जाता उसीका चिंतन करना (जो सहज है) ध्यान है, और जिससे प्रेम किया जाता, सदैव जिसका चिंतन होता है उसको जानना (यह भी सहज है) ज्ञान है। इसलिये ज्ञान, भक्ति, ध्यान, कर्म आदिमें एकता है। इनका संबंध ३६ का नहीं ३३ का है। एकके बाद एक सहज है। भारतके धार्मिक अथवा आध्यात्मिक आंदोलनका इतिहास वेद-कालसे प्रारंभ होता है। इसका अर्थ इसके पहले कुछ नहीं था ऐसा नहीं किंतु इसके पूर्वकालकी विशेष कोई जानकारी नहीं ऐसे कहना ही समुचित होगा। प्राचीन वैदिक धर्मका आंदोलन यजन प्रधान-यज्ञ-प्रधान था। वहां यज्ञप्रधान कर्म था। इसका इतना अधिक सुव्यवस्थित “शास्त्र” बना कि इस “शास्त्र” से बाह्य ढांचेसे-परमात्माका ज्ञान होना असंभव है ऐसे मान कर जिसके लिये यज्ञादि किया जाता है उसका “ज्ञान” प्राप्त करनेके लिये “चिंतन” और अनुसंधान प्रारंभ हुआ। यह है उपनिषद- काल। उपनिषदकाल ज्ञानप्रधान कर्मका काल है। निःश्रेयस प्रधान साधनाका काल रहा। किंतु इसमेंसे ज्ञानोत्तर जीवनमें कर्म आवश्यक या अनावश्यक ? ज्ञानोत्तर संन्यास जैसे विचारोंने जन्म लिया। उसके बाद उपनिषद प्रणीत निर्गुण निराकार ब्रह्मतत्वका आकलन-सर्व सामान्य लोगोंके लिये-असंभव होनेसे यजनप्रधान कर्मके स्थानपर भजनप्रधान या पूजनप्रधान कर्मका प्रारंभ हुआ। इसे भक्तिमार्ग कहा गया। इसमें सगुण अथवा साकार प्रतीक-यज्ञकुंडके स्थान पर मूर्तिकी- स्थापना हुई। यज्ञमें आहुति डालकर यज्ञ-शिष्ट खानेके स्थान पर मूर्तिके सम्मुख रखकर-नैवेद्य- करके प्रसाद खाया जाने लगा। भक्तिका भी एक तंत्र बना। शास्त्र बना। उसके बाह्य उपचार बने। आवरण बना। निर्गुण ब्रह्मके सगुण प्रतीक बने। निराकार तत्त्वके अलग अलग आकार बने। उसके अलग अलग पूजा-प्रकार बने। यजन प्रधान यज्ञकर्म पूजन प्रधान भक्ति-कर्म बना। भक्तिका तंत्र विकसित हुआ। उसके प्रकार बने। इस प्रकारकी भक्ति परंपरा भगवद्- गीतोत्तरकालमें विकसित हुई। इसे भागवत धर्म कहा गया है। विद्वानोंने इस भागवत धर्मके इतिहासका भी अनुसंधान किया है। इसका पहला नाम नारायणीय धर्म था। इसके आचार्य नरनारायण ऋषि थे। इसी धर्ममें, धर्म-परंपरामें श्रीकृष्णका जन्म हुआ। भगवद्गीता इसी नारायणीय धर्मका तत्वज्ञान कहती है ! इसी भगवद्गीता तथा उसको कहनेवाले भगवान कृष्णसे भागवत धर्मका प्रसार हुआ। यह काल ई. पू. १४०० साल माना जाता है। इन ३०००-३५०० सालोंमें इस भागवत धर्ममें अनेक परिवर्तन हुए। अनेक शाखा उपशाखाओंसे वह फैला यद्यपि आजभी उसके मूल-तत्त्व उसमें स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। इस मूल एकेश्वरी भक्ति पंथमें उस समय प्रचलित योगादि साधन प्रणालियोंके अच्छे अंगोंको स्वीकार किया गया। उसके बाद भक्तिके तंत्र और व्यूहोंका विकास हुआ। वैष्णव आगम शास्त्रका विस्तार हुआ। फिर ई. स. ११ वीं सदीमें श्रीरामानुजाचार्यने, बारहवीं सदीमें श्रीमध्वाचार्यने, इसके बाद श्रीवल्लभाचार्यने अपने अपने ढंगसे भागवत धर्मका विस्तार किया। इस बीचमें श्रीभास्कराचार्य और श्रीनिंबार्काचार्यने भी इस दिशामें पर्याप्त कार्य किया है। किंतु इसी बीच, महाराष्ट्रमें ज्ञानेश्वर महाराजने अपने ही ढंगसे नवोदित भागवत धर्मकी नींव डालकर उसका विस्तार किया। उपरोक्त आचार्य और ज्ञानेश्वर महाराजमें जो विशेष अंतर रहा वह, भाषाका रहा, आचार्योंने विद्वन्मान्य संस्कृत-भाषाका ज्ञानेश्वरी १७५