भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1123, कुल 1172 में से

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पृष्ठ 1123

सहारा किया और ज्ञानेश्वर महाराजने लोक-भाषा या ज्ञानेश्वरके शब्दोंमें कहना हो तो "देशी" का आसरा लिया। आचार्योंने भक्तिका शास्त्र रचा । नव-विधा भक्तिके प्रकार (१) श्रवण (२) कीर्तन (३) स्मरण (४) पादसेवन, (५) अर्चन (६) वंदन (७) दास्य (८) सख्य (९) आत्मनिवेदन बताकर उसमें एक एक प्रकारका रूप दिखाते हुए भक्तिका तंत्र रचा ! अर्चनके रूपमें अनेक प्रकारकी पूजा-पद्धतिका विकास किया । प्रातःकालमें कैसी पूजा करनी चाहिए, माध्याह्नमें क्या करना चाहिए, शामको कैसी पूजा करनी चाहिए, भगवानको अर्पण करनेवाला तुलसीदल किन अंगुलियोंसे पकडना चाहिए । अभिषेकके समय शंख कैसा पकडना चाहिए । एक या दो, सूक्ष्म सूक्ष्म नियमोंसे भक्तिको सजाया । वंदनमें भी ! कब कैसा वंदन करना चाहिए, कब कब साष्टांग नमस्कार करना चाहिए, नमस्कारमें कौन कौन अंग भूमिको लगने चाहिए, यहां तक विवेचन किया ! फिर उन्होंने पुराणादिमें खोज खोज कर किस प्रकारकी भक्तिसे किसका उद्धार हुवा ! यह बता कर कहा । परीक्षितकी भांति श्रवण भक्ति करनी चाहिए, नारदकी भांति कीर्तन और प्रल्हादकी भांति स्मरण भक्ति करनी चाहिए, लक्ष्मीकी भांति पाद- सेवन करना चाहिए, अक्रूरकी भांति वंदन भक्ति करनी चाहिए, हनुमानकी भांति दास्य-भक्ति करनी चाहिए, अर्जुनकी भांति सख्यभक्ति करनी चाहिए, बलिकी भांति सर्वस्व समर्पण करना चाहिए !!" इससे भक्तिका वातावरण तैयार हुआ । उत्सवादि होने लगे । वैभव-प्रदर्शन हुवा किंतु भक्ति भाव जकड गया ! भक्तिका धर्म बना किंतु उसकी आध्यात्मिकता गयी । भक्तिका तंत्र खिला किंतु मंत्र मुर्झा गया ! भक्तिका प्रदर्शन खूब हुवा किंतु आत्म-दर्शन खो गया । ज्ञानेश्वर महाराजने भक्तिका तंत्र, जो बहिरंग प्रदर्शन करता है उसको छोड कर, भक्तिके मंत्र, हृदयको ले लिया । गीताका नौवा और बारहवा अध्याय भक्तिका रहस्य खोलकर बताता है । नौवे अध्यायमें भक्तिका हृदय है और बारहवे अध्यायमें उसके लक्षण । नौवा अध्याय कहता है " सर्वत्र मैं हूं" बारहवा अध्याय कहता है " इसलिये भक्तको सबसे द्वेषरहित होना चाहिए, सबसे प्रेमपूर्वक रहना चाहिए, कहीं भी अहंकार नहीं करना चाहिए, सुख दुःख सम मानना चाहिए, क्षमामूर्ति बनना चाहिए, समदृष्टि बनना चाहिए " आदि चोबीस गुणोंकी सूची है ! भगवद्गीता पढ़ते समय वे "केवल शब्द" से लगते हैं किंतु ज्ञानेश्वर महाराजने सैकडो छंदोंमें उसका भाव-गांभीर्य और अर्थ-व्याप्तिका परिचय दिया है । ये चौबीस गुण सजीव हो गये हैं । वैसे ही तेरहवे अध्यायमें ज्ञानीके लक्षण कहे गये हैं। उसमें भी ज्ञानीके अमानित्व, अदंभ, अनहंकार, आदिका अर्थ कहनेमें पांच सात सौ छंद कहे हैं। "आचार्योपासना" इस एक शब्दका अर्थ कहनेमें तो "गुरु-भक्ति" वर्णन करते करते भक्तिके "आर्तभाव दास्य-भाव, सखा-भाव, वात्सल्य-भाव, मधुरा-भाव" इन पांच भावोंका रहस्य खोलकर रख दिया है। साथ साथ, उपनिषदमें कही गयी अपनेको "गुरुसेवामें निःशेष कर" देनेकी पराकाष्ठा बतायी गयी है ! वैसे ही शिष्यको किस तरह अपनी क्रिया-शक्ति प्राण-शक्ति, बुद्धि-शक्ति, चिंतन-शक्ति, तथा भाव- शक्तिसे गुरु-हृदयको प्रसन्न करके अपना लेना चाहिए इसका भी दर्शन है । इस प्रकार "गुरुको सम्मुख रख कर सगुणोपासना" का रहस्य समझाया है । ऐसे करते समय मंदिर, मठ, पूजाके तांत्रिक विधि-विधानकी कठोर आलोचना अथवा उपरोधिक व्यंगादि नहीं है फिर भी नौवे अध्यायमें भगवानके मुखसे ही अर्जुनको इस प्रकारकी पूजा अर्चा विधि विधानयुक्त भक्तिका अत्यंत सौम्य शब्दोंमें व्यर्थता दिखाई है । यदि परमात्मा सर्वत्र है तो वृक्षलताओंमें भी है न ? तब भला पेड भगवान पर खिले हुए फूल मोच कर पत्थर भगवान पर चढ़ानेमें क्या स्वारस्य है ? १७७ परिशिष्ट ५

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