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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1124

वैसे ही, यद्यपि ज्ञानेश्वर महाराजने महाराष्ट्रमें नवोदित भागवत धर्मकी नींव डाली, फिर भी ज्ञानेश्वर महाराजकी गुरु-परंपरा शैव है। नाथसंप्रदाय शैवसंप्रदाय है। आज कल सर्वत्र भक्ति साहित्य अथवा भक्ति संप्रदायके रूपमें वैष्णव साहित्य और वैष्णव संप्रदाय ही प्रचलित है किंतु भारतीय संस्कृतिमें शैव संप्रदायका महत्व-पूर्ण स्थान रहा है। शैव संप्रदायमें भी भक्ति-साधना की गयी है। और उसमें अधिक गहराई है। शैव-भक्ति साधनामें उत्सवादिका बाहरी आडंबर उतना नहीं है जितना वैष्णव भक्ति साधनामें है किंतु आध्यात्मिक गहराई पर्याप्त है। शैव भक्ति “सभनोंके हृदयमें परमात्मा मान कर "भक्त देह ही मम देह कहता है शिवजी !" इस पर विश्वास रखती है। इस कारणसे वह "देह ही देवालय" मान कर "यह परमात्माके निवास योग्य हो !” इस प्रकारके प्रयासको भक्ति मानता है। शैवोंने दीक्षासे जीवनमुक्तावस्था तक भक्ति साधनाको “प्रवास क्षेत्र" मान कर भक्ति साधनामें आनेवाले अनुभवोंके आधार पर भक्तिके छ पड़ाव-स्थल-माने हैं। तथा भक्तिके छ प्रकार माने हैं। किस स्थल पर किस प्रकारके अनुभव आयेंगे तथा कौनसा अनुभव आनेपर क्या करना ? ऐसा साधनाक्रम कहा गया है जो अधिकतर आंतरिक चित्त-शुद्धिका है। वहां भक्तके लिये व्रत कहे हैं जो गुण-विकास प्रधान है जैसे गीतामें अद्वेष आदि हैं। शैव भक्तों ने पर्याप्त नाम महात्म्य गाकर भी “जैसे रोटी रोटी कहनेसे पेट नहीं भरता, दीप दीप कहनेसे प्रकाश नहीं मिलता" ऐसे उदाहरण देकर “केवल नाम जपसे कुछ नहीं बनता ! भगवानका नाम जीभ पर लेनेके पहले, असत्य वचन छोड़ कर, कटु वचन छोड़ कर, पर निंदा छोड़कर...... जीभ शुद्ध करनी चाहिए ! तभी वह जीभपर खेलेगा ! फलेगा !!" ऐसे जीवन शुद्धिका मार्ग बताते हुए "पर-द्वेष छोड़ कर, सबसे प्रेमसे रहकर, परवित्त परदारापहरणका विचार भूलकर......हृदय शुद्ध होने पर “जप दैवत" हृदयमें स्थिर होगा !" आदि सिद्धांत अथवा विधि-निषेध बताकर भक्ति मार्गके छ पड़ाव बताये हैं। इन्होंने भक्ति-साधनाके लिये जो व्रत कहे हैं वे भी विचारणीय हैं। "परायी संपत्तिको न छूना व्रत है ! तथ्योंको गलत न समझना और समझाना एक व्रत है ! जो जो जैसे अनुभव होता है उसको निर्वचनासे वैसे ही व्यक्त करना एक व्रत है ! अपने उपास्यसे एक निष्ठ रहना एक व्रत है !” इसी भांति उनका पूजा विधान है ! वे कहते हैं “बिना इसके कोटि कोटि जप भी व्यर्थ हैं !” इस प्रकार व्रतस्थ भक्तोंमें ऐक्य-भक्त, गीताकी भाषामें जो “मद्रूप" हुआ है सर्व श्रेष्ठ है। इसमें और परमतत्वमें कोई अंतर ही नहीं। इससे नीचे है शरण भक्त है। वह सर्वस्वी ईश्वर शरण है। उसने सब कुछ ईश्वरापंण करके अपना कुछ नहीं रखा है। ऐसा भक्त सदैव ईश्वराधार होता है। अगर कुछ उसका है तो ईश्वर है। भूख-प्यास लगी तो वह ईश्वरको पेट दिखा कर रोता है ! वह कहता है "तुझे पूजूंगा, तुझे गाऊंगा। तेरा स्मरण करूंगा। तेरा ही आधार चाहूंगा ! तेरे बिना मेरा और कुछ नहीं !! तू है तू है तू ही है !!!" ऐसे भक्तोंने आचार्योंसे प्रचलित "विधिविधान युक्त तांत्रिक पूजा अर्चाका" उपहास किया है। ऐसे भक्तोंने अपने स्वामीका परिचय देते समय “सर्वात्मक देव !" "जगदंतर्यामी !” "आदि पुरुष" आदि शब्दोंके प्रयोग किये हैं। तथा जैसे देव-भक्त हैं वैसे देश-भक्त भी हैं। देव तथा देश इसका विचार छोड़ दिया जाय तो भी पतिभक्ति, परिवारभक्ति, ध्येयभक्ति, भक्तिके ये अनेक प्रकार हैं। किंतु किसी भी प्रकारकी भक्तिकी आधारशिला निष्ठा है। और उसके लिये आवश्यक सातत्यको टिकानेके लिये मनुष्यको कुछ गुणोंकी आवश्यकता है। वे गुणही भक्तिका हृदय है। इसके लिये बाहरी आचरणकी कोई आवश्यकता नहीं दीखती। दैवी गुणोंकी उपासना करते ज्ञानेश्वरी १७८