ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकरते, अपनेमें दैवी गुण का कर उनका विकास करते करते, मनुष्यको महादेव बनना है। मनुष्यका ऐसे महान बननेकी साधना ही भक्ति है। मानव समाजके पूर्वज अपनी थाथीके रूपमें जो आनेवाले मानवी समाजको देते आये हैं, भले ही वह समाज शैव हो, वैष्णव हो, हिंदू हो, मुसलमान हो, या ईसाई; पाश्चात्य हो या पौर्वात्य। सबके सब जगदंतर्यामीके भक्त हैं! क्यों कि वह जगदंतर्यामीसे अविभक्त है। अनेक कारणोंसे मनुष्य इस अविभक्तत्वका, एकताका अनुभव नहीं कर सकता इतना ही। इसी एकताके अनुभवके लिये मानवकुलने जो जो साधना की है उसकी संस्कार संपत्ति, आनेवाले वारसको दी है। ऐसे देते आये हैं। इसलिये भक्तिका इतिहास मानव-कुलके इतिहासके साथ जुडा हुआ है। भले ही देश-कालके अनुसार उसका बाह्यरूप बदलता गया हो। इसका अंतरंग एक है। वह है अपने पूर्वदांतर्यामीसे ऐक्यताका अनुभव करना। इस अनुभवसे जीवनमें पूर्णता आती है। वह जीवन सदैव आनंद-विभोर रहता है। यही मानव-जीवनका अंतिम साध्य है। सदैव, सर्वत्र, निरालंब शाश्वत आनंदमें लीन रहे ! भ्रूमध्य—दो भौवोंके बीचका स्थान। योग-मार्गमें इस स्थानका अत्यंत महत्त्व है। षट्चक्रोंमें यह आज्ञाचक्रका स्थान है। ज्ञानतंतुओंकी, अथवा इडा, पिंगला, सुषुम्नाके अतिरिक्त गांधारी, हस्तिजिन्हा, पूषा, पयस्विनी, अलंबुसा, कौशिकी, कुहू, शंखिनी, वारुणी, विश्वोदरी, सरस्वती आदि सूक्ष्म नाडियोंके उलझनसे बने हुए कमलकी ६ चक्राकृतियोंको योग-शास्त्रमें चक्र कहा है। कहीं कहीं कमल भी कहा गया है। मूलाधार चक्रसे-जो कुंडलिनी शक्तिका स्थान है- जागृत कुंडलिनी शक्ति जब सहस्रारकी ओर बढ़ती है तब उसके स्पर्शसे ये चक्र कमलसे खिलते हैं। इसको कुंडलिनीद्वारा किया गया चक्रभेदन अथवा षट्चक्र शोधन कहते हैं। दो भौवों के मध्य जो आज्ञाचक्र होता है उससे मेरूदंडस्थित सुषुम्नाका सीधा संबंध है। दो भौंवोंका बीचका यह चक्र इसकी सीधमें, पीछे मेरुदंडके अंतिम छोर पर है। वह विद्युत् वर्णका है तथा इसकी दो पंखुडियां हैं। सद्गुरु इस चक्रकी देवता है। आज्ञाचक्रमें ध्यान करनेसे उपनिषदमें कहे गुरुहृदय निकटता, गुरुमें निःशेष होनेकी साधना सिद्ध होती है तथा गुरुकी इच्छाशक्ति शिष्यमें कार्य करने लगती है। इससे शिष्यका शिष्यत्व-पृथक्त्व-नष्ट हो कर गुरु-शिष्यके जीवनका समरसैक्य होते हुए साधक पूर्णत्वस्थाको पहुंचता है। मन—ऋग्वेदमें विराट्-पुरुषका वर्णन करते समय "चंद्रमा जिसका मन है!" कहते हुए मनके विषयमें अत्यंत सूचक ज्ञान दिया गया है ऐसे विद्वानोंको कहना है ! चंद्रमा पर-प्रका- शित है। स्वप्रकाशित नहीं। वैसे ही मन है। यह परोपजीवी है ! इसी मनके विषयमें कहा है "वह त्रिकालके विषयमें जानता है। मनके कारण इंद्रियोंसे सब काम होता है। जागृतिमें वह दूरातिदूर जाकर निद्रामें समीप आकर आत्म-दर्शनमें समर्थ होता है। वह इंद्रियोंका प्रेरक है। मनमें विश्वका सभी ज्ञान घर किया हुआ है। जैसे सारथी रथको सही रास्ते पर चलाता है वैसे यह मन इंद्रियोंको चलाता है। हृदयस्थ इसी मनके कारण सदैव युवावस्थामें रहता है। इसलिये मनको सदैव शुभ संकल्पसे युक्त रखना चाहिए!" उपनिषदोंमें मनके विषयमें बहुत कुछ कहा गया है। उपनिषदमें कहा है "मन अन्नमय है और वह अन्नसे बना है। उसका अस्तित्व अथवा शुभाशुभत्व पचन क्रिया पर निर्भर है। मनुष्य जो कुछ खाता है उसका ठोस भाग मल बनाता है, मध्यम ठोस तत्त्वका मांसादि बनता है और अत्यंत सूक्ष्म जीवन-तत्त्वसे मन बनता है ! दही मथनेसे जैसे उसमेंसे अत्यंत सूक्ष्म-भाग मक्खन ३७९ परिशिष्ट ५