भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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के रूपमें ऊपर आता है वैसे!" यह छांदोग्य उपनिषदका मंतव्य है। भारतकी कई भाषाओंमें "जैसे अन्न वैसे मन" वाला मुहावरा भी चलता है। भगवद् गीतामें भी "सात्त्विक, राजसिक, तामसिक आहारसे वैसे मन बनता है!" ऐसा कहा गया है। इसीलिये भारतीय विचारकोंने "नैतिक दृष्टिसे भी अन्नशुद्धिका विचार" किया है। उपनिषद् कहते हैं "पवित्र अन्नसे सत्त्व-शुद्धि होती है। सत्त्व शुद्धिसे स्मृति दृढ होती है। स्मृति दृढ होनेसे मनुष्य-मन-बंधन मुक्त होता है।" उपनिषदोंमें कहा गया है "मनसे ही मनुष्य सुनता देखता है। मनसे ही वह संकल्प करता है। काम, चिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लाज, भीति आदि सब मनके ही रूप हैं।" मनोव्यापारोंका विवेचन करते समय ऐतरेयोपनिषदमें कहा गया है "संज्ञान, अज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, स्मृति, संकल्प, क्रतु, प्राण, जीववशा, काम, आत्मसंयम, ये सब मनके अलग अलग नाम हैं!" इसी उपनिषदमें उपरोक्त शब्दोंसे वर्णित मनके अनुभवोंका विश्लेषण भी किया गया है। बृहदारण्यकोपनिषदमें "वृक्ष तोड़ने पर उसकी जड़ सजीव होनेसे जैसे वह पुनः जीवित हो उठती है वैसे मृत्युरूपी वृक्ष तोडनेवालेने बार बार तोड़ने पर भी बहर कर बढनेवाले इस जीवन-वृक्षकी जड़ कौनसी होगी भला?" ऐसे प्रश्न करके "मनमें पूँजीभूत किये हुए संस्कार जिससे जीव पुनः पुनः शरीर लेकर आता है" ऐसे कहा गया है। मीमांसा दर्शनके अनुसार मन अंतरिंद्रिय है। वह भौतिक है। मन स्वतंत्र रूपसे आत्म- गुणोंका ग्रहण कर सकता है। मनको आत्माके संयोगसे ज्ञानेंद्रियों द्वारा बाहरी विश्वका ज्ञान होता है। न्यायदर्शनमें मनको अंतरिंद्रिय मानकर कहा गया है। "मनके द्वारा ही सुख दुःख राग द्वेषादि अनुभव होता है। मन अणु-परिमाण है। मन एक समय एक ही स्थान पर रहता है। आत्मा तथा इंद्रियोंके साथ न हो तो मनको कोई ज्ञान नहीं होता। मन शरीरमें रहता है। मरनेके साथ यह शरीरसे निकल जाता है। यह उपसर्पण कर्म कहाता है। यही मन अपने संस्कारोंके साथ आगे दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। न्याय-दर्शनके अनुसार मोक्षावस्थामें भी मन आत्माके साथ रहता है।" इतना मनका महत्त्व है। दर्शनकारोंने मनको "संकल्प-विकल्पात्मक" माना है। आधुनिक मानस-शास्त्री भी शरीर और मनका संबंध मानकर पचन-क्रिया और मनका संबंध स्वीकार करते हैं। अंग्रेजी भाषाकी "सुदृढ शरीरमें ही सुदृढ मन" कहावत प्रसिद्ध है। इसीलिये हठ योगमें मनको स्थिर करनेके लिये-शरीर पर ध्यान दिया है। वहाँ शरीर शुद्धिका अत्यंत महत्त्व है। उनका कहना है "संपूर्ण स्वस्थ शरीरमें ही सदैव मन एकाग्र रहता है!" कुछ विद्वान मनको अग्नि-तत्त्वका अंश मानते हैं। तथा मन उसके विषय एक हैं। मनुष्यमें मन और आत्मतत्त्वका संयोग होनेसे ही मनुष्य अन्य प्राणियोंसे भिन्न है और अन्य कोई प्राणि नहीं कर सकते ऐसे महत्त्वके काम करता है। इसी कारणसे उसको ज्ञानेंद्रियोंकेद्वारा बाहरी विश्वका ज्ञान होता है। मानव और मानवेतर प्राणियोंमें इंद्रिय संवेदनकी सभी क्रियायें समान हैं। किंतु मनकी विचार करनेकी शक्ति मानवकी विशेषता है। शरीरस्थ मनका आत्मासे संबंध आता है, इसीसे वह ज्ञानेंद्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके सहारे उसको स्मरणमें रखकर-विचार कर सकता है। विचार करनेका अर्थ अपने उस अव्यवस्त ज्ञानसंग्रहको जो इंद्रियोंके द्वारा एकत्र किया गया है तरतीबसे रखकर रूप देता है! मनके दो प्रकार होते हैं। (१) क्रियाशील मन (२) निष्क्रिय मन। निष्क्रिय मन शरीरके साथ ही जन्म लेता है और शरीरके साथ समाप्त भी होता है किंतु क्रियाशील मन ज्ञानेश्वरी १६०