ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचिरंतन स्वरूपका है जो संस्कार रूपसे पुनर्जन्ममें भी साथ जाता है। जीवनके सारे संस्कारोंको वह संग्रह कर लेता है। स्मरणके रूपमें वही विचारका साधन बनता है। मनुष्यकी सभी इच्छाएं, भावनाएं, विचार, विकार आदिका संघर्ष मनमें होता है और बुद्धि इन सबका विवेचन, विश्लेषण, तुलना, आदि करके तर्कसे अनुमान लगा कर निर्णय करती है। और जीवनको निश्चयानुसार चलाती है ! महत्तत्त्व—यह सांख्यका शब्द है। प्रकृतिके सात्विक अंशसे महत् तत्त्वकी-जिसे बुद्धितत्त्व भी कहते है-अभिव्यक्ति होती है। महत्को प्रकृतिकी विकृति भी कहा गया है। महत्त्वमें भी सत्व रज तम हैं। किंतु सत्व इसका प्रधान गुण है। सत्वका धर्म तथा प्रकाश इसके सूक्ष्म रूपमें निहित है। सभी गुण महत् तत्त्वमें परिणत नहीं होते। अंतमें-प्रलयकालमें-महत् तत्व त्रिगुणोंमें ही विलय होता है। जब महत्तत्त्व गुणत्रयमें लीन होता है तब वह बारह हिस्सोंमें बंटा जाता है। उसमें दस हिस्से शुद्ध सत्वमें तथ एक एक रजस् और तमस्में लीन होते हैं। फिर सृष्टिके समय इन्हीं भागोंसे महत् तत्व बनता है। महाशून्य—बौद्ध योगाचारमें अथवा बुद्धागममें शून्य अनिर्वचनीय है। बौद्ध दर्शनमें कहा गया है "जो इस शून्यको समझ सकता है वह सब कुछ समझ सकता है। तथा जो शून्यको नहीं समझता वह कुछ भी नहीं समझता !” यही सत्य है। यही अंतिम तत्त्व है। सारी सत्ताएं आंतरिक और बाहरी सत्ताएं-इसी शून्यमें लीन हो जाती हैं। यह शून्य सत् और असत्-अस्ति नास्ति-दोनोंसे विलक्षण है और सत् असत् दोनों शून्यके गर्भमें लीन हैं। शून्य अभावात्मक नहीं हैं क्यों कि इसी शून्यमेंसे समस्त विश्वकी अभिव्यक्ति है। यही परमपद है। इस शून्यका विवेचन करते समय कहा गया है न है सत् या न है असत् जो दोनोंसे रहा भिन्न। चारोंसे यह है मुक्त विश्नोंका पद श्रेष्ठ है॥ कुछ विद्वानोंका कहना है कि इसी शून्यवादको लेकर आद्य शंकराचार्यने अपने अद्वैतवादका विकास किया है। किंतु ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें इसका दर्शन होता है जो कुछ भी नहीं था तब था और उसीमेंसे यह सब निकला है। वह भी अनिर्वचनीय है। कुछ नहीं था तब “वह” था ऐसे कहा गया है और नासदीय सूक्तका “वह” यहां शून्य हुआ है। दक्षिणके शैव संतोंने इस शून्यका उल्लेख किया है। शून्यको निःशून्य भी कहा है वह ज्ञानेश्वरीमें शून्य और महाशून्यके रूपमें आया है। सृष्टिकी रचनाका विचार करते समय “शून्यको शून्यमें बोकर शून्यकी फसल काटी !” ऐसा वर्णन है। यह सारा शून्य है और यह सारा ब्रह्म है। दोनों एक है, उपनिषदोंमें ब्रह्मका वर्णन करते समय भी “वह अनिर्वचनीय और सत् असत्से परे” होनेकी बात कही है। वहां ब्रह्मका वर्णन मौनसे है। मौनसे जिस प्रश्नका उत्तर दिया जाता वह ब्रह्म है !! माया—कुछ विद्वानोंकी मान्यता है कि माया अथवा मायावाद श्रीआद्यशंकराचार्यके प्रतिभा-संपन्न मस्तिष्ककी कल्पना है। अथवा वह उन्होंने बौद्धोंके शून्यवादसे ली है! किंतु “मायावाद” की कल्पना उपनिषदमें मिलती है। इतना ही नहीं ऋग्वेदमें स्वयं “माया” भी मिलती है। ऋग्वेदमें कहा गया है। १८१ परिशिष्ट ५