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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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बाहरी साधनोंकी आवश्यकता नहीं होती जो आंतरिक अपूर्णताके कारण बाह्य-विषय चिंतनसे अनुभव होती है। ब्रह्मचर्य एक धनात्मक भाव और पूर्णताजन्य आचरण है। ऋणात्मक भावसे प्रेरित नकारात्मक आचरण नहीं । सदा सर्वत्र ब्रह्म चिंतनजन्य प्रसन्न मनका प्रकटरूप ही ब्रह्मचर्य है । ब्रह्मभाव—आत्मा अथवा ब्रह्मकी कोई उपाधि नहीं । वह निरुपाधिक है । उस निरुपाधिक ब्रह्ममें अपनेको विलीन करके, स्वयं ब्रह्मरूप हो कर-निरुपाधिक हो कर-रहना ही ब्रह्म-भाव है । ब्रह्म-भावमें सब कुछ ब्रह्म ही ब्रह्म है बिना ब्रह्मका और कुछ नहीं इसका अनुभव करते हुए “सोऽहं” भावसे निर्विषय हो रहना ही ब्रह्मभाव है । “बिना ब्रह्मके और कुछ भी नहीं; मैं ही ब्रह्म हूं” इस भावसे मनुष्य द्वंद्वातीत और निर्विषय हो जाता है। सब कुछ मैं हूँ तब भला किससे राग करें किससे द्वेष करें ? अथवा किससे डरें ? ऐसी स्थितिमें साम्य-भाव जगता है जो ब्रह्म भावका प्रकटीकरण है ! निरुपाधिक हो कर इस स्थितिमें रहना ही ब्रह्मभाव है । ब्रह्मरंध्र—इसको दशमद्वार भी कहा गया है। यह मस्तक पर-तालूमें-रहनेवाला एक गुप्त छेद है। इसको सहस्रार भी कहा गया है। जब कुंडलिनी इस ब्रह्मरंध्र अथवा सहस्रारमें प्रवेश करती है तब आत्म-दर्शन होता है। वैसे आत्म-निष्ठ योगी शरीरत्यागके समय इसी ब्रह्मरंध्रसे प्राणोत्क्रमण करता है । ब्रह्मसूत्र—ब्रह्मसूत्रोंको वेदांत कहते हैं। बादरायण इसका रचयिता है। व्यासने इन ब्रह्मसूत्रोंमें उपनिषदोंका सारा ज्ञान भर दिया है। एक ही शब्दमें ब्रह्म-सूत्रोंको “उपनिषद्का सार सर्वस्व” कह सकते हैं। प्रत्येक सूत्रके मूलमें कई उपनिषदमंत्रोंका सार है। इन्हीं ब्रह्म- सूत्रोंके आधार पर अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैत, द्वैताद्वैत, शुद्धाद्वैत आदि संप्रदाय बने हैं। आद्य शंकरा- चार्य, श्रीरामानुजाचार्य श्रीमन्मध्वाचार्य श्रीवल्लभाचार्य आदि आचार्योंने इन सूत्रोंपर भाष्य लिखे हैं। श्रीमध्वाचार्यके चरित्रमें इस प्रकारके २१ भाष्य और भाष्यकारोंके नाम मिलते हैं । ब्रह्मसूत्र अत्यंत प्राचीन ग्रंथ है । भगवद्गीतामें इस ग्रंथका उल्लेख है। इस परसे कह सकते हैं यह कि गीतासे भी प्राचीन है ! इसके चार अध्याय हैं। इस पर आद्य शंकराचार्यका अद्वैतभाष्य आज प्राप्त भाष्योंमें सर्व प्राचीन है। इस ग्रंथ पर लिखे महत्वपूर्ण भाष्योंका विचार किया जाय तो शांकरभाष्य (ई. स. ७८८-८२०) भास्करभाष्य (नववी सदी) रामानुज भाष्य (बारहवी सदी) निंबार्कभाष्य (तेरहवी सदी) मध्वभाष्य (तेरहवी सदी) श्रीकंठभाष्य (तेरहवी सदी) श्रीकरभाष्य (चौदहवी सदी) वल्लभभाष्य (१४७९-१५४४) विज्ञानमुसुक्षुभाष्य (सोलहवी सदी) बलदेव भाष्य (अठारहवी सदी) शक्तिभाष्य (बीसवी सदी) इ. ब्रह्मसूत्रोंमें ब्रह्म या आत्माके स्वरूपका विचार किया है। ब्रह्मसूत्रका ब्रह्म, निर्विशेष तत्व है। यह सर्वव्यापी चेतन है। यह स्वयंसिद्ध और स्वप्रकाश है। अज्ञानके कारण यह अनुभवमें नहीं आता। ज्ञानसे देख सकते हैं । भक्ति—मोक्ष-प्राप्तिके अनेक मार्गोंमें एक मार्ग । इसके विषयमें इतना अधिक साहित्य है कि एक एक पुस्तकमैसे सार-भूत एक एक वाक्य चुन लिया तो भी वह एक छोटीसी पुस्तिका हो जायेगी । इसके साथ ही साथ इस विषयमें इतने अधिक भ्रम हैं कि भक्तिका वास्तविक रूप समझना उससे अधिक कठिन है ! ज्ञानेश्वरी १७४

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