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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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वह शक्ति प्राप्त होती है और फल निरपेक्ष निर्मल बुद्धि (नाऊस ?) उनको आत्मरत करती है। शायद अरस्तूका नाउस मेधा अथवा केनोपनिषदकी "उमा" हो जो इंद्रके शरीरस्थ ईश बुद्धि है-अंतरिक्षमें उठकर व्योमस्थ होने पर ब्रह्मका रहस्य कहती है। बुद्धियोग—निष्काम कर्म-योगको बुद्धि-योग कहा गया है। बुद्धिको कर्म फलासक्तिमें न लगाते हुए कर्म करनेकी कुशलताको बुद्धि-योग कहा गया है। ईश्वर-चिंतनपूर्वक, ईश्वरेच्छा मानकर, प्राप्त कर्तव्य करके। उसमें या उससे किसी प्रकारकी अपेक्षा नहीं करना। ऐसे कर्म करते समय बुद्धिको ईश्वर निष्ठा अथवा ईश्वर चिंतनमें लीन रखना। इंद्रियों द्वारा बुद्धिको विषयोके पीछे न पड़ने देना। यह बुद्धि योगकी साधना है। बुद्धिको विषय, कर्म कर्मकांडादिमें लीन न होने देते हुए केवल ईश्वरसे जोडकर ईश्वर-लीन या आत्मलीन रखना ही बुद्धियोग है। ब्रह्म—ब्रह्म यह शब्द बृहद् बड़ा बहुत बड़ा जिससे बड़ा कुछ भी न हो ऐसे अर्थमें आया है। ऋग्वेदमें यह शब्द मंत्रस्तुति अथवा गूढ़ शक्ति इस अर्थमें आया है ऐसे विद्वानोंकी मान्यता है। किंतु उपनिषदकालमें ही इस शब्दका अधिक प्रयोग पाया जाता है। ओंकारको-प्रणवको-ब्रह्म वाचक माना है। शतपथ ब्राह्मणमें "परम तत्व" इस अर्थमें यह शब्द सर्वप्रथम आया है। आगे आगे ब्रह्म शब्दका अर्थ इतना व्यापक हो गया कि "यह सारा ही ब्रह्म है!" ऐसे कहा जाने लगा। सारे विश्वके मूलमें जो तत्त्व है उसको ब्रह्म माना जाने लगा। इस तत्त्वके विषयमें उपनिषदोंमें अनेक सिद्धांत कहे गये हैं। ब्रह्मके विषयमें जहां चर्चा है उसको "ब्रह्म-विद्या" कहा गया है। उत्तर मीमांसाका जो ग्रंथ है उसका नाम ही "ब्रह्म-सूत्र" है। "अथातो ब्रह्म- जिज्ञासा" यह इसका सबसे पहला सूत्र है। इस सूत्र ग्रंथ पर करीब २८ लोगोंने भाष्य लिखा है। जगद्गुरु आद्य शंकराचार्यके अद्वैत सिद्धांत श्री श्री रामानुजाचार्यके विशिष्टाद्वैत सिद्धांत श्री श्री मध्वाचार्यके द्वैत सिद्धांत तथा श्री श्री वल्लभाचार्यके शुद्धाद्वैत सिद्धांतकी आधार शिला यही ब्रह्मसूत्र है। ब्रह्मके विषयमें श्री शंकराचार्यके अद्वैत सिद्धांतके अनुसार ब्रह्म एक मात्र पारमार्थिक सत्य है। श्री शंकराचार्यके मतसे इस ब्रह्मको छोड कर और सब असत् है। यह ब्रह्म निर्विशेष तत्त्व है। यह सर्वव्यापी और चैतन्यमय है। यह स्वयं सिद्ध है। अज्ञानग्रस्त जीव इसको नहीं जान सकता। अज्ञानमुक्त जीव ही इसको देख सकता है। ज्ञान इसका साधन है! ज्ञानसे "तत् त्वं असि" "वहे तू है!" का अनुभव आता है! वैसे ही श्री भास्कराचार्यके मतसे ब्रह्म ही इस विश्वका एकमात्र तत्त्व है। इसको जाननेका साधन आगम है। यह अद्वितीय है। जगतका उपादान कारण भी ब्रह्म ही है। कारण ब्रह्ममें ही कार्य ब्रह्म निहित रहता है। ब्रह्मके विषयमें अलग अलग दार्शनिकोंने इतना अधिक कहा है उन सबको देखनेसे "ब्रह्मका भ्रम" बड सकता है। इसलिये उपनिषदकी शिक्षापद्धति अच्छी है। ब्रह्म मौन है। मौन ही ब्रह्मका वास्तविक रूप है। एक कन्नड संतने कहा है "बिना ओर छोरके लहर मारनेवाले आनंद सागरको शब्दके चम्मचसे कितना भार जायेगा ? और इसकी आवश्यकता भी क्या है ? मौन ही वास्तविक ब्रह्म ज्ञान है।" ब्रह्मचर्य—सतत सर्वत्र ब्रह्मचिंतन जन्य श्रेष्ठ आचरण। विषय चिंतनसे अन्य आचरण होता है। जिसके जीवनमें ब्रह्म-चिंतन जितना अधिक उसके आचरणमें एक प्रकारकी प्रतिष्ठा उतनी अधिक आती है। उसको बाहरी भोगादिकी आवश्यकताका अनुभव नहीं होता। अपनेमें ही एक पूर्णताका अनुभव बढ़ता जाता है। वह अपन आपमें सुखसंतोषका अनुभव करने लगता है। उसका मन सदैव प्रसन्न रहता है। उचटा हुवा नहीं रहता। इसलिए उसको मनोरंजनके लिए १७३ परिशिष्ट ५

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