भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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कर्मेन्द्रियां इसका साधन है । इन्हीं साधनोंसे वह " बाह्य ज्ञान " प्राप्त करता है । इंद्रियां अंतःकरणका द्वार हैं । मन संकल्प-विकल्प करता है । बुद्धि निश्चय करती है और अहंकार मुझे ज्ञान हुवा ऐसा अनुभव करता है । अर्थात् बुद्धि निश्चय करनेवाली शक्ति है । जब बुद्धि शरीर भावसे उठकर आत्म-रत होती है तब इसीमें चैतन्यका प्रतिबिंब ग्रहण करनेकी शक्ति आती है । गीतामें भी स्थितप्रज्ञ तथा स्थिरमति इन शब्दोंसे बुद्धिके विषयमें कुछ कहा है । वैसे ही "मिश्र-वचनोंसे मेरी बुद्धिपर मोहावरण क्यों डालता है ?" ऐसा प्रश्न पूछनेवाले अर्जुनको द्विविध निष्ठा सांख्य-निष्ठा और योग-निष्ठाके रूपमें सांख्य-बुद्धि और योग-बुद्धि ऐसे बुद्धिके दो प्रकार कहे हैं । ऊपर सांख्य शास्त्रके अनुसार बुद्धि शक्ति अथवा बुद्धि तत्त्वका विवेचन किया ही हैं । उसके अनुसार चैतन्यका प्रति-बिंब ग्रहण करना अर्थात् आत्मज्ञान प्राप्त करना बुद्धिका कार्य है अथवा आत्म-ज्ञान ही बुद्धि है । तथा गीतामें कर्म-कुशलता योग " कहते हुए आत्मज्ञानानुसार कर्माचरण की कलाको योग-बुद्धि कहा है । कला और शास्त्र दोनोंको समन्वय बुद्धिकी स्थिरता है जो ब्रह्म-निर्वाणका साधन है । कहीं कहीं कहा गया है " शुद्ध बुद्धि एक चिनारीकी भांति है, वह कितनी ही कम क्यों न हो अविद्या-राशिको जला देती है । " फल-निरपेक्ष कुशाग्रता " शुद्ध-बुद्धिका लक्षण है । किसी भी प्रकारकी फलापेक्षासे बुद्धि मैली हो जाती है । फलापेक्षासे बुद्धिकी निर्मलता नष्ट होती है। वह कभी चैतन्यका प्रतिबिंब ग्रहण नहीं कर सकती । कर्तव्य निश्चय, फल-निरपेक्षता, कुशाग्रता, निर्मल बुद्धिका लक्षण है जिससे ब्रह्मज्ञान होता है । वैसे ही ग्रीक तत्त्वज्ञ पहले पहले मानते थे विश्वका मूल-भूत तत्त्व सत्य है । उस सत्यका निश्चय करने-जानने-के लिये किया जानेवाला तर्क ही बुद्धि है । बुद्धि सत्यानुसंधानका साधन है । प्लेटो कहता है मूल-भूत-तत्त्व ईश्वरविषयक विचार है ! किंतु अरस्तूका कहना है " बुद्धिके मूलभूत- तत्त्व विश्व-व्यवस्थामें गूंथे हुए हैं । इसलिये विश्वको छोड़कर सत्यका अनुसंधान करना असंभव है !" अरस्तूका यह भी विश्वास है " मनुष्यमें प्राण इस ईश्वरी तत्त्वसे बुद्धि-तत्त्वका प्रवेश होता है । अन्य भौतिक तत्त्वसे नहीं।" वैसे ही वह " इंद्रिय संवेदनामेंसे बुद्धि निर्माण होती है" ऐसा सिद्धांत प्रतिपादन करता है । वह अपने सिद्धांत कहनेके लिये तर्कका ऐसा जाला बुनता है कि उससे छूटना कठिन हो जाता है । उसके तर्कोंका अध्ययन करते करते कुछ सिद्धांत निकलते हैं । वह भी बुद्धिके दो प्रकार मानता है एक निर्मल बुद्धि दूसरी समझ बुद्धि ! मनुष्य अपनी निर्मल बुद्धिके बल- बूते पर विश्वके अंतिम सत्यको पा सकता है समझ बुद्धिसे वह असंभव है । प्लेटो भी इस बातको स्वीकार करता है अरस्तूके मतसे "बुद्धि भी आत्माकी भांति अमर है । वह भौतिक शरीरका भाग नहीं । आत्माकी भांति उसका शरीरसे साहचर्य रहता है । बुद्धि मनुष्यकी मृत्युके बाद आकाशतत्वमें लीन होती है । इस प्रकारकी निर्मल-बुद्धिको वह आकाश तत्त्वसे जोडता है । किंतु समझ बुद्धिको वह अन्य चार तत्त्वोंसे जोडता है । इस क्रियाशील बुद्धिको वह नाउस कहता है । उसके मतमें जैसे शरीरमें पृथ्वी आप तेज वायू आकाश ऐसे स्थूलसे सूक्ष्म सूक्ष्मतर ऐसे घटक है वैसे बुद्धिके भी हैं । नाउस बुद्धिका यह सूक्ष्म तत्त्व है । वही ईश्वरको अनुभव करता है । वह आत्मकी भांति अमर हैं । उपनिषदमें भी एक स्थान पर इंद्रियां ईश्वरी वैभव देखनेके लिये जो सर्वत्र फैला है बाहर दौड़ती हैं ईश्वरके वैभव-दर्शनमें उलझे हुए इंद्रियोंको इस वैभवके स्वामित्वका भान कराकर उन्हे अंतर्मुख करना और आत्म-रत करना ही योग है और " वह हैं " इस अचल श्रद्धासे बुद्धिको ज्ञानेश्वरी १०३

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