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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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करना चाहिए । गलत प्रकारसे प्राणायाम करनेसे अनेक प्रकारके रोग हो सकते हैं। यह अपनी मूल-भूत जीवन शक्तिसे खेलना है। इसलिये इसके विषयमें पूर्ण विचार करके, पूर्ण जानकारी लेकर, किसी-सच्चे अनुभवीके मार्ग-दर्शनमें ही यह करना चाहिए । क्यों कि सही तरीकेसे प्राणायाम करनेसे जैसे सब प्रकारके रोग दूर हो कर शरीर संपूर्ण स्वस्थ और तेजस्वी हो जाता है वैसे ही गलत ढंगसे प्राणायाम करनेसे शरीर सदैवके लिये रोगोंका घर भी हो सकता है । बंध—योग-साधनामें जैसे मुद्राएं हैं वैसे ही कुछ बंध भी हैं। प्राणायाम करते समय नवद्वारोंमें कुछ द्वार बंध करनेमें इन बंधोंकी आवश्यकता होती है। मूलबंध, उड्डियानबंध, जालंधर बंध इन्हे त्रिबंध कहते हैं और ये तीन प्रसिद्ध हैं। वैसे ही विपरीत करणी, वज्रोली, महाबंध, महावेधबंध, आदि बंध है जो शरीरशुद्धि, प्राणायामादिमें सहायक हो जाते हैं । बुद्धि—स्वीकृत-गृहीत-बातमेंसे अनुमान करनेवाली जो शक्ति है, अथवा तर्कसे अनुमान अटकल-लगानेकी एक शक्ति। मनुष्य बुद्धिमान है कहनेमें यही सार है। बिना मनुष्यके अन्य पशुओंमें यह अनुमान करनेकी शक्ति नहीं है। फिर भी अधिक विकसित मानवेतर प्राणी कुछ अटकल लगाते हैं किंतु वह निम्न श्रेणीके-अविकसित-श्रेणीके मानवोंके समान होते हैं। विद्वानोंका यह मत है कि मानवी अनुमानमें आत्मज्ञान होता है और पाशवी अनुमानमें वह नहीं होता । पशु, मानवके समान कल्पना-चित्र चितारता रहता है इसका कोई आधार नहीं मिला । बुद्धिका अर्थ करते हुए विद्वानोंने कहा है कि "जिस शक्तिसे मूलसत्यका बोध होता है वह अंतःस्फूर्त शक्ति ही बुद्धि है ।" कुछ विद्वान कहते हैं "सर्वव्यापी तत्त्वके सहारे सभी बौद्धिक विचार एक करनेवाली शक्ति बुद्धि है !" यह व्यवहारिक बुद्धि से जो छोटे मोटे काम करनेमें आवश्यक होती है, भिन्न है। उपनिषदोंमें बुद्धिको जीवनका सारथी माना है। उपनिषदोंके अनुसार इंद्रियां घोडे हैं, मन उनकी रास है, शरीर रथ है, बुद्धि सारथी और आत्मा रथी है । मनकी राससे इंद्रियरूपी घोडोंको वह अपने ध्येयकी ओर चलाती है। यदि सारथी अच्छा नहीं होता तो जैसे घोडे रथको मनमाने ले जाते हैं वैसे बुद्धि यदि आत्मस्थ न हो तो जीवन-रथ गढ़ेमें जायेगा ! सांख्यशास्त्रमें "महत्तत्त्व-संज्ञक बुद्धिको अंतःकरण" कहा है तो न्यायशास्त्रमें "आत्मा और अंतःकरणके संयोगजन्य समझ=ज्ञान" कहा है । किसी बातको जाननेके किये आवश्यक शक्तिको बुद्धि शक्ति कहा गया है। सांख्य-मतके अनुसार बुद्धि एक तत्त्व है। प्रकृतिके सात्त्विक अंशसे बुद्धितत्त्वकी अभिव्यक्ति होती है । इसलिये बुद्धिमें सत्त्वके प्रकाश और लघुत्व ये गुण हैं। निश्चय, बुद्धिका स्वरूप है। निश्चय करना बुद्धीका कार्य है । रजोप्रधान बुद्धि चंचल होती है। यह विकृत बुद्धि है। निश्चय टिक नहीं सकता। ऐसी बुद्धि अहंकारको उत्पन्न करती है। बुद्धि-जन्य इस अहंकारके भी दो प्रकार हैं। सात्त्विक अहंकार-धर्म, ज्ञान, वैराग्य ऐश्वर्य । तामसिक अहंकार-अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य, अनैश्वर्य । बुद्धि जीवके भोगका प्रधान साधन है। बुद्धि प्रकृति-पुरुषके सूक्ष्म-भेदको दर्शाती है। बुद्धिसे ही मुक्ति और मुक्तिके भाव जगते हैं। वे भाव लिंग शरीरमें रहते हैं। सांख्यमतके अनुसार अविद्याके कारण बुद्धि वृत्तिको अपौरुषेय चैतन्यसे एकाकार माना गया है। बुद्धितत्त्वके सूक्ष्म भागके कारण ही "मै हूं" इसका ज्ञान होता है। किंतु पुरुष इस बुद्धिसे परे है। अविद्याके कारण ही बुद्धिमें आत्माका भान होता है। सांख्यमतके अनुसार बुद्धि अहंकार तथा मन मिलकर अंतःकरण बनता है। ज्ञानेंद्रियां और १७१ परिशिष्ट ५