भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1116, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1116

इसके बाद शांत एकांत स्थान पर सुबह उठते ही, शामको, रातको सोते समय, अथवा अन्य किसी योग्य समय पर धीरेसे दायों नथुना दबा कर बाये नथुनेसे पूरक करना-श्वास अंदर लेना फिर दोनों नथुने दबाकर उसको कुंभक-अंदर रोकना-करना तथा धीरेसे दहिने नथुनेसे बाहर छोड़कर पुनः बाहर रोकना प्राणायामका एक अत्यंत सरल लाभप्रद प्रकार है । इसमें पूरक - १ कुंभक - अंदरका - ४ - रेचक २ - तथा बाह्य कुंभक ४ । यह कालमर्यादा है । इसको इसी प्रमाणमें अपनी शक्तिके अनुसार बढाते जाना । जैसे ४ - १६ - ८ - १६ । इस प्रकारको सूर्य भेदन कहते हैं । इसके विपरीत दाहिने नथुनेसे पूरक, कुंभक, बाये नथुनेसे रेचक कुंभकको चंद्रभेदन कहते हैं । सूर्य भेदन और तुरंत चंद्रभेदनसे एक प्राण चक्र पूर्ण होता है । इस प्राणायाम प्रकारके साथ, पूरकके साथ मूलबंध, कुंभकके साथ जालंधर बंध और रेचकके बाद उड्डियानबंध अत्यंत लाभप्रद है । वस्तुतः उड्डियानबंध ही बाह्यकुंभक है । इसी प्रकार दोनों नथुनोंसे धीरे धीरे कंठ भागको स्पर्श तथा घर्षण करें, इस प्रकारसे-आगे आगे हृदयको भी श्वास नलिकाके हृदय भागमें भी घर्षण हो सके, ऐसे पूरक करके फिर कुंभक करना, वैसे ही दोनों नथुनोंसे श्वासनलिकाको अंदरसे बाहरतक घर्षण हो सके ऐसे रेचक करना भी एक सरल प्रकारका प्राणायाम है । इसके बाद भी बाह्य कुंभक उड्डियान करें । इसका प्रमाण भी १-४-२-४ है । यह कभी कर सकते हैं । इससे कार्यमें उत्साह बढ़ता है । इसके साथ भी मूल बंधादि कर सकते हैं । आरोग्यकी दृष्टिसे यह उत्तम साधन है । विशेषतया जब सांस फूलता है तब अत्यंत लाभप्रद होता है । यदि इसका सही ढंगसे अभ्यास किया जाय तथा नियमित रूपसे इस पद्धतिसे प्राणायाम किया जाय तो यह कई रोगोंसे बचाता है । इस प्रकारके प्राणायामको उजायी कहते हैं । इसी प्रकार अन्य पांच छ प्रकार हैं । इनमें सूर्यभेदन और उजायी ठंडके दिनोंमें अनुकूल होते हैं तो शीतला, सीत्कारी गरमीके दिनोंमें अनुकूल होते हैं । भस्त्रिका अनेक प्रकारके रोगोंको नाश करता है । प्राणायामसे बुद्धि तीव्र और कुशाग्र होती है । शरीर आरोग्य-संपन्न रहता है । हठ योगके अनेक ग्रंथोंमें इसका वर्णन किया गया है । प्राणायाम प्रातःकाल, माध्यान्हकाल, सायंकाल तथा मध्यरात्रीके बाद करना चाहिए । किंतु प्राणायाम सदैव एकांतमें करना चाहिए । प्राणायाम करनेका स्थान अधिक तर खुला, तथा प्रकाशयुक्त हो । शुद्ध हो । चाहे जहाँ प्राणायाम नहीं करना चाहिए । प्राणायाम करते समय सरल बैठना चाहिए । अनामिका और मध्यमा अंगुलिसे बायां नथुना और अंगूठेसे दायां नथुना दबाना चाहिए । तर्जनी अंगुलीका कहीं भी स्पर्श नहीं होना चाहिए । प्राणायामका समय धीरे धीरे बढाते जाना । समय बढ़ानेमें उतावलापन नहीं करना चाहिये । सारी व्यवस्था सहज हो । प्राणायामके इन आठ प्रकारके अलावा और दो प्रकार हैं । (१) सगर्भ (२) अगर्भ । संमत्र प्राणायाम सगर्भ कहलाता है और मंत्र रहित प्राणायाम अगर्भ कहलाता है । संमत्र प्राणायाम विशेष परिणामकारी होता है । वैसे ही जब भूख लगी हो, प्यास लगी हो, नाक भरा हुवा हो, हर्ष शोक आदिसे मन उद्विग्न हुवा हो, नींद आ रही हो अथवा ठीक मल-विसर्जन न हुवा हो, ऐसे समय प्राणायाम नहीं ज्ञानेश्वरी १७०