ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविश्वके प्रत्येक वस्तुके पीछे जो सदैव त्रिकालाबाधित गतिमान् शक्ति है वह प्राण है। गुरुत्वाकर्षण, विद्युत्, ग्रहमंडल और नक्षत्रोंका भ्रमण तथा चराचर जीव सृष्टिमें यह प्राणतत्त्व ओतप्रोत है। विश्वके अम्याम्य आकार प्रकारका, विश्वकी विविध शक्तियोंका, तेजका आधार यही प्राणतत्त्व है। विश्वके जीवनका आधारभूत, विश्व-जीवनको नियमित करनेवाला महान तत्त्व हवामें है किंतु हवा प्राण नहीं है। अन्नमें प्राण है किंतु अन्नका पौष्टिक अंश प्राण नहीं। पानीमें प्राण है। किंतु पानी जिन द्रव्योंसे बनता है वह प्राण नहीं ! सूर्य प्रकाशमें प्राण है किंतु उसका प्रकाश या किरण प्राण नहीं है। विश्वके सभी चराचर सृष्टिकी चिच्छक्ति प्राण है और विश्वके सभी वस्तु इस प्राणशक्तिके वाहक हैं। प्राणका अर्थ श्वास प्रश्वास नहीं किंतु जिसके कारण यह श्वसनप्रणाली चलरही है वह प्राण है। आंखोंसे देखना, कानसे सुनना, जीभसे चखना, शरीरसे छूना आदि इसी प्राणतत्वका परिणाम है। जिस शक्तिसे विश्वमें गतिमानता है वह प्राण है किंतु विश्वकी गतिमानता प्राण नहीं। इस बातको अनेक उदाहरण देकर उपनिषदमें समझाया गया है। इस प्राण शक्तिको आधार मानकर उपनिषदोंने दो नीतितत्त्व कहे हैं (१) इंद्रियोंकी विषय प्रीति पाप अर्थात् मृत्युका कारण बनती है, इसलिये प्राणधारणापरूप जीवनव्यापारको महत्व देना (२) तत्वतः सबका प्राण एक होनेसे सबसे प्रेम करना। किसीसे द्वेष नहीं करना। यह औपनिषदीय नीतिशास्त्रका आधार है। प्राणायाम-अष्टांग-योगका चौथा अंग। इस शब्दका प्राण+आयाम ऐसा विभाजन है। श्वासप्रश्वासकी स्वाभाविक गतिपर नियंत्रण रखना प्राणायाम शब्दका अर्थ और उद्देश्य है। जो प्राण अथवा वायु हम बाहर छोड़ते हैं जिसे प्रश्वास कहते हैं उसको प्राणायामकी प्रक्रि- यामें "रेचक" कहा गया है। जो वायू अंदर लेते हैं जिसे श्वास लेना कहा जाता है उसको प्राणायाममें "पूरक" कहा गया है। तथा बाहरी श्वास अंदर लेकर उसको अंदर ही रोकनेकी क्रियाको "कुंभक" कहा जाता है। पूरक कुंभक रेचक मिलकर प्राणायामकी प्रक्रिया चलती है। यह कुंभक एक प्रकारसे श्वास प्रश्वासमें विराम है। यह विराम दो प्रकारका हो सकता है। एक पूरकके बाद अर्थात् बाहरका वायू अंदर लेनेके बाद दूसरा रेचकके बाद अर्थात् अंदरका वायू बाहर छोडनेके वाद। इस दो प्रकारके विरामको अंतर कुंभक और बाह्यकुंभक कह सकते हैं। विरामका यह काल घटाना बढ़ाना, प्राणायामका वास्तविक अभ्यास है। (१) बाहरका वायू अपने फेफड़ोंमें भरना (२) वहां उसको रोकना (३) अंदरका वायू बाहर फेंकना (४) उसको बाहर ही रोकना। इसमें जो प्रकार हैं इससे प्राणायामके अनेक प्रकार बने हैं। जैसे नाकके दोनों नथुनोंसे सांस लेकर तुरंत दोनों नथुनोंसे छोड़ना भस्त्रिका कहलाता है। ऐसे करते समय पेटको लुहारकी धोकनीकी भांति फुला कर छोड़ना पड़ता है। इस भस्त्रिकाके भी उपविभाग हैं। जैसे एक नथुनेसे ले कर तुरंत दूसरे नथुनेसे छोड़ना। ऐसे (१) सूर्यभेदन (२) उज्जार्ड (३) सीत्कारी (४) शीतली (५) भस्त्रिका (६) भामरी (७) मूर्छा (८) प्लाविनी ऐसे आठ प्रकारके मुख्य प्राणायाम हैं। किंतु सामान्यतः दीर्घ-श्वसन, अभ्यास करने जैसा प्राणायामका एक प्रकार है। इसमें हम जो श्वास प्रश्वास लेते छोड़ते हैं, उसका समय धीरे धीरे बढ़ायें। वह शरीर और मनको प्रसन्न रखनेका एक अच्छा और बिना किसी धोखेका साधन है। १६९ परिशिष्ट ५ (13)