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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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महत्तत्त्वादि अन्य तत्त्वोंमें अपनी अव्यक्त शक्तिसे प्रवेश करती है। और अन्यान्य भेदोंका समन्वय करती है। प्रकृति जड और नित्य है जो अनादि कालसे पुरुषसे जुड़ी हुई है। प्रकृति पर पुरुषका बिंब पड़नेसे वह अपनेको चेतनकी भांति समझती है। प्रकृतिके इसी स्वरूपके आभासके कारण निष्क्रिय निर्लिप्त पुरुष भी अपनेको कर्ता भोक्ताके रूपमें लगता है, यही पुरुष पर आरोपित प्रकृ- तिका बंधन है। इसीका पहचान कर दूर करना स्वरूप ज्ञान है। प्रकृति ही सृष्टि रचनाका कार्य करती है। इस कार्यमें प्रकृति किसीका सहाय नहीं लेती। प्रकृति पर पड़ा पुरुषका बिंब स्वाभाविक है। सृष्टिरचना प्रकृतिका स्वभाव है। गायके थानमेंसे निकल कर बछड़ेके मुखमें जानेवाले अचेतन दूधकी भांति प्रकृतिका कार्य चलता है। इस दूधसे जैसे बछडेको जीवन मिलता है वैसे प्रकृतिके सृष्टि-कार्यसे पुरुषको मुक्ति मिलती है। पुरुषकी मुक्तिके लिये वह अनेक प्रकारके उपाययोजना करती है। वह अपने प्रभुत्वसे, बुद्धिके भावोंकी सहायतासे, एक शरीर छोडकर दूसरा शरीर धारण करती है। इन सब बातोंका एक मात्र उद्देश्य पुरुषको बंधनमुक्त करना है। प्रकृतिको आत्मा समझनेवाला पुरुष, शरीर छूटनेके बाद प्रकृतीमें ही लीन हो जाता है। अथवा प्रकृतिलीन पुरुष मुक्त-सा हो कर भी पुनः हिरण्यगर्भ स्वरूपको धारण करता है। अर्थात् प्रकृतिलीन पुरुषको उत्तरकालमें बन्धन होनेकी संभावना बनी रहती है और ईश्वर जो सदा मुक्तावस्थामें रहता है कभी किसीभी प्रकारसे प्रकृतिके बंधनमें नहीं आता। महत्तत्त्वसे लेकर पृथ्वीतत्त्व तक सभी तत्त्वोंका मूल प्रकृति है। यह सत्य रज तमकी साम्यावस्था है। इस अवस्थामें गुणोंका कोई प्रधान या गौणभाव नहीं रहता। प्रकृति तत्त्वमें ये गुण विभक्त नहीं रहते। परस्पर समन्वित रहते हैं। इस प्रकृतिके दो भेद माने गये हैं। व्यामोहिका प्रकृति तथा मूल प्रकृति। इसी कारण संसारमें अवस्थाभेद हैं। व्यामोहिका प्रकृतिमें पुरुष बद्धावस्थामें जीव कहलाता है और मूल प्रकृतिमें स्वरूप लीन होकर जगत्कारण आत्मा कहलाता है। प्रकृतिका सिद्धांत कहनेवाला सांख्यदर्शन अत्यंत प्राचीन-दर्शन है। इसके विचार अत्यंत व्यापक हैं। सांख्यके बाद कई दर्शनकारोंने तथा भाष्यकारोंने इस पर इतना विचार किया है, इतने विवेचन किये हैं, जिससे अनेक प्रकारके मतभेद दीख पड़ते हैं। कई भाष्यकारोंने इसके अनेक पर्यायवाची शब्द देकर विषयको अधिक उलझा दिया है। यहां तक कि सांख्यकी प्रकृति तथा गीताकी प्रकृति एक नहीं हैं!! इस परसे लगता है कि सांख्यके तत्त्वोंका-प्रकृतिका विवेचन करनेवालोंने अपने अपने अनुभवसे विवेचन किया है। प्राण—पिंड तथा ब्रह्मांडका एक मूलतत्त्व। इस शब्दका अर्थ करते समय "शरीरमें संचार करनेवाला वायु" ऐसा अर्थ किया गया है। इसके साथ ही साथ "सदैव अर्थात् नींदमें भी नाक तथा मुखसे अंदर बाहर जानेवाला तत्त्व" भी कहा गया है। यही तत्त्व है जो "मनुष्य और विश्वको जोडता है!" अनेक उपनिषदोंमें इसका विचार आया है। एक स्थान पर "यह जीवनतत्त्व है" कह कर आगे "प्राण ही ब्रह्म" कहा गया है। यह केवल मनुष्यका ही नहीं "समग्र विश्वका जीवन तत्त्व है!" दूसरे एक उपनिषदमें "प्राण ही विश्वाधार वस्तु कहा है क्यों कि सभी वस्तु प्राणसे निर्माण हो कर प्राणमें ही लीन होते हैं।" चक्रके आरे जैसे नाभीमें गढे रहते हैं वैसे सारा विश्व प्राणमें मिला रहता है।" ज्ञानेश्वरी ७ १६८