ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनुष्यकी, नहीं प्राणिमात्रकी सहज प्रवृत्ति हैं। वह आत्माके अमरत्व प्रस्थापनाका भौतिक प्रयास है। वेदोंमें कहा गया है आत्मा पुत्र रूपसे प्रकट होता है। उपनिषदोंमें कहा गया है "प्रजातंतुका छेदन मत करो!" संतानेत्पादन पितृ ऋणसे मुक्ति है। कुलमर्यादाके साथ कुलवृद्धिका मूल काम है। इसीलिये गृहस्थाश्रम है। गृहस्थाश्रमके इस काम-पूर्तिके लिये, तथा संतानको योग्य संस्कार देनेके लिये अर्थकी- धनकी आवश्यकता है। धन प्रथम पुरुषार्थ काम तथा काम पूर्तिके दायित्व निभानेका साधन है। इसलिये अर्थ-साधना द्वितीय कर्तव्य है। साथ साथ अर्थ साधनमें जुट जानेसे काम-वृत्तिका संकोच भी होता है। वह सीमित होती है। वैसे ही धर्म अर्थलालसाका संकोच करता है। धनकी आवश्यकता है "किंतु सन्मार्गसे" यह धर्म कहता है। चाहे जैसे, जैसे चोरीसे, डाकेसे, जूएसे, अत्याचार अना- चारसे, आनेवाला धन नहीं चाहिए, कैसा धन स्वीकार करना कैसे नहीं करना यह कहनेका कार्य धर्म करता है। अर्थात धर्म, अर्थ लालसाका संकोच करता है और इन सबसे मुक्त करता है। काममें जो सुख है, धनमें जो सुख है, धर्म भावनाका जो सुख है वह क्षणिक है। वह पराश्रित है। बाह्य वस्तुओं पर आश्रित है। इसलिये वह सच्चा नहीं। सच्चा सुख स्वाश्रित होना चाहिए। अपनेमें आपसे भोगा जानेवाला सुख। शाश्वत चिरंतन सुख। ऐसे सुखको मोक्ष कहा गया है। वह मनुष्यको स्थायी सुख देता है इसलिये वह सर्वोच्च पुरुषार्थ है। चतुर्थ पुरुषार्थ है। काम मानवी कर्तव्य तथा सुखकी पहली सीढ़ी है और मोक्ष मानवी कर्तव्य और सुखकी अंतिम स्थिति है। जीवनका सारा प्रयत्न उसके लिये हैं। जीव उसी सुखके लिये बार बार जनमता और मरता है। इसी आशासे कि कभी न कभी वह मिलेगा। पुरोडाश—यज्ञकार्यमें आहुति देनेके लिये बनाया गया अन्न विशेष। यह बनानेका विधि-विधान समंत्र होता है। इसमें भूने गये चावल या जौका सत्तू होता है जो गरम पानीमें गूंद कर कच्छपके आकारके गोले बनाकर मिट्टीके तवे पर भूने जाते हैं। इसको घी लगानेके बाद यह पुरोडाश बनता है। ये पुरोडाश मिट्टीके कितने तवोंपर-खपरैलोंपर-भूने जाते हैं इस पर उसका सप्तकपाल, अष्टकपाल, दशकपाल, एकादशकपाल, द्वादशकपाल आदि नाम होते हैं। पुरोडाशका विशिष्ट भाग यज्ञमें आहुति दे कर जो बचा रहता है वह यज्ञ करनेवाले "यज्ञशेष" के रूपमें खाते हैं। प्रकृति—सांख्यमतानुसार सत्व-रज-तमकी साम्यावस्था ही प्रकृति है। यह सांख्योंके चौबीस तत्वोंमें दूसरा तत्त्व है। गीतामें यह क्षर तत्त्व है जो अपरा प्रकृति कही गयी है। यह अपरा प्रकृति अनादि कालसे पुरुषसे संबद्ध है। इसीसे सब बद्ध हैं। कल्पांतमें भूतमात्र इसमें लीन होते हैं और कल्पारंभमें इसीसे उत्पन्न होते हैं। पुरुष इसका अधिष्ठान मानकर अपनी मायासे सारा विश्व चलाता है। इस अपरा प्रकृतिके ऊपरके स्तरपर परा प्रकृति है। यही जगतको धारण करती है। यह ईश्वरांश है। जो शरीरत्यागके बाद एक शरीरसे दूसरे शरीरमें जाकर इंद्रियादिकेद्वारा विषयोंका भोग करती है। सांख्यमतानुसार मूलप्रकृति अव्यक्त है। उसीसे अन्य २३ तत्त्व उत्पन्न होते हैं। मूल अव्यक्त प्रकृतिसे उत्पन्न सभी तत्त्व व्यक्त हैं। इन प्रत्येक व्यक्त तत्त्वमें अव्यक्त प्रकृतिके (?) तीन गुण हैं। ये ही गुण संस्थानभेदसे अनेक रूपसे अभिव्यक्त होते हैं। यह मूलप्रकृति जो तीन गुणोंके साम्यावस्थासे बनी है, अव्यक्त है। यह १६७ परिशिष्ट ५