ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमहाभारतमें कर्मानुसार जन्मका सिद्धांत समझाते हुए "अव्यक्त आत्मा ही देहधारी प्राणिमात्रका बीज है। बीज भूत आत्मा गुणोंके कारण जीव बनता है। वही काल और कर्मके प्रभा- वसे संसारमें भ्रमण करता है। वृक्षमें यह चैतन्य बीज होता है। सुख दुःख भी होता है। इतना ही नहीं उनकी इंद्रियां भी होतीं हैं।" महाभारतके शांतिपर्वमें इसका विस्तृत दिवचन है। जीव चंद्रलोक तक जा कर वहांसे वनस्पतिमें आता है और अन्नरूपसे वह प्राणिमात्रमें जाकर मातृगर्भमें प्रवेश करता है इस तरह देह त्यक्त जीवका भ्रमण कक्षा बताया गया है। आधुनिक जीव-शास्त्र भी इस सिद्धांतका समर्थन करता है। भारतके बाहरके दार्शनिक इस सिद्धांतको नहीं मानते किंतु भारतीय दार्शनिकोंने हजारों वर्षोंसे, ४.५॥ हजार वर्षसे इस सिद्धांतको स्वीकार किया है और उपनिषदोंसे स्वीकृत पुनर्जन्मके विचारोंका आधुनिक विज्ञान समर्थन करता है। प्राचीन ऋषियोंने स्पष्ट रूपसे कहा है "पुत्र पौत्र प्रपौत्रके रूपमें वंश-सातत्यसे मेरी आत्मा अमर होगी।" "आत्मा पुत्र रूपसे जन्मता है !" यह वाक्य प्रसिद्ध है। पुनर्जन्मका सिद्धांत अमान्य करनेवाले विद्वानोंके "तो पूर्व-जन्मका स्मरण क्यों नहीं रहता ?" इस प्रश्नका उत्तर देते समय भारतीय दार्शनिक "आत्माके अज्ञानावरणके कारण !" कहते हुए इस अज्ञानावरणको दूर हटा कर पूर्व-जन्मका स्मरण प्राप्त करनेका विधान भी-योगमें-बताते हैं। गीतामें पुनर्जन्मका व्यवस्थित विवेचन और समर्थन मिलता है और ज्ञानेश्वरीमें इसका सुंदर स्पष्टीकरण दिया है जो अत्यंत बुद्धिगम्य हैं और आज जो आधुनिक विद्वान वैज्ञानिक ढंगसे अनुसंधान करते हैं वह भी पुनर्जन्मके भारतीय सिद्धांतका समर्थन करता जाता हैं। पुरुष—सांख्य शास्त्रमें प्रकृति और पुरुष यह दो अनादि तत्त्व होनेकी बात कही गयी है। गीताने भी यह कहा है। सांख्य, शुद्ध चैतन्यको जो गुणोंसे परे है पुरुष कहता है। अज्ञानके कारण प्रकृति पुरुषमें जो विपरीत बुद्धि होती है, विवेक द्वारा उसको दूर करके पुरुषको प्रकृतिसे मुक्त देखना ही सांख्यका परम उद्देश्य है। इसीको वे विवेक ख्याति कहते हैं। सांख्यका पुरुष अतींद्रिय है। वैसे सांख्यके तीन प्रकारके पुरुष हैं (१) रूप पुरुष, (२) बद्ध पुरुष (३) मुक्त पुरुष । अनाश्रितत्व, अलिंगत्व, निरवयत्व, स्वतंत्रत्व, अत्रिगुणत्व, विवेक्तित्व, अविषयत्व, असामान्यत्व, चेतनत्व, अप्रसवधर्मित्व, साक्षित्व, कैवल्य, माध्यस्थ्य, औदासिन्य, द्रष्टृत्व, अकर्तृत्त्व ये रूप पुरुषके लक्षण हैं। इसी निर्लिप्त पुरुषका बिंब, बुद्धि या महत्तत्त्व पर पडता है। ऐसे समय बुद्धि या महत् जड होते हुए भी उसमें चैतन्यका भास होता है जो बद्ध पुरुष जीव है। वह सांख्य विवेकसे मुक्त होता है। पुरुष और प्रकृतिका संबंध अनादि है। पुरुषका बिंब जब प्रकृति पर पडता है प्रकृति या बुद्धि अपनेको चैतन्य समझने लगती है। व्युत्क्रम रूपसे बुद्धिके स्वरूपका भास पुरुषसे होता है। जिससे निष्क्रिय, निर्लिप्त, त्रिगुणातीत पुरुषभी अपनेको कर्ता, भोक्ता, आसक्तादि-सा लगता है। यही पुरुषका कल्पित बद्धत्व है। पुरुषका अपने आपको पहचानना मुक्ति है। वही सांख्यका विवेक है। इस विवेकसे-ज्ञानसे-कैवल्य प्राप्त होता है। इस विवेकके द्वारा पुरुषका चैतन्यत्व और प्रकृतिका जडत्व स्पष्ट हो जाता है। गीतामें भी इन तीन पुरुषोंका विचार है तथा ज्ञानेश्वरीमें इसका विस्तृत विवेचन है। सांख्यमें पुरुषके विषयमें जो विवेचन है यहां उसकी झलक मात्र है। पुरुषार्थ—मनुष्यको अपना जीवन कृतार्थ करनेके लिये जो पराक्रम करना होता है उसको पुरुषार्थ कहा गया है। पुरुषार्थ मानवी जीवनका कर्तव्य है। वे चार हैं। (१) काम, काम ज्ञानेश्वरी* १६६