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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

ईश्वरसे अनुरक्त होनेसे मोक्ष मिलता है यह भक्ति-मार्गका मुख्य प्रतिपादन है। यह ज्ञान और कर्मसे भिन्न मार्ग है। सभी वैष्णवसंप्रदाय भक्तिको साध्य-तत्त्व मानते हैं। यह भागवत धर्मका सार है। किंतु शैवोंने भी इस पर विचार किया है। शैव संतोंने भी यह साधना की है। उनकी भक्ति-साधनामें गहराईका अधिक अनुभव आता है। भक्तिका अर्थ करते समय "परमात्मामें अनुरक्ति ही भक्ति है।" ऐसे शांडिल्यमुनिने कहा है तो "नारदने परमात्मासे परम प्रेमका रूप ही भक्ति" कहा है और पराशर "परमात्मासे पूजादि अनुराग ही भक्ति" कहते हैं। भक्तिके विषयमें ऐसे अनेक सूत्र कहे जा सकते हैं। किंतु सबका सार "परमात्मतत्त्वमें विलीनता" है। एक ही शब्दमें कहना हो तो "मेरा नाम मरे हरिका नाम रहे !" ही भक्ति है। इस भक्तिके विषयमें अनेक विद्वानोंने अनेक प्रकारके अनुसंधान किये हैं। अनेक प्रकारके "अनुसंधानात्मकभ्रम" फैलाये हैं। कुछ विद्वानोंके मतानुसार "भारतमें भक्तिकी कल्पना अर्वाचीन है। वह ईसाई धर्ममेंसे हिंदुओंने ली है।" किंतु "ईसासे पूर्व कई सदियोंसे भारतमें भक्तिका विकास हुवा था और बौद्धधर्मकेद्वारा वह ईसाई धर्ममें गया !" यह दूसरे विद्वानोंने सिद्ध कर दिया है। इतने पर भी "वेदमें भक्तिके लिये कोई स्थान नहीं है !" कहनेवाले विद्वान भी कम नहीं है "वेद कोरा कर्मकांड है !" "वैदिकधर्म कर्मप्रधान है।" "उपनिषद ज्ञान प्रधान है !" आदि कहा जाता है। किंतु यदि "ईश्वरसे अपना कोई नाता जोड कर उससे अविभक्त होना" (भगवान रामकृष्ण परमहंस) भक्ति है तो ऋग्वेदका पहला सूक्त 'अग्निमीळे पुरोहितं' भक्ति सूक्त है! इस सूक्तका अंतिम मंत्र है- देवा अग्नि सहज हो गम्य तू जैसे "पुत्रको पिता।" कल्याण कर पास रहके ॥ वैदिक ऋषि यहां अग्निको पिता मान कर अग्निसे अपने लिये "तू (मुझसे) सहज हो" ऐसे कहता है जैसे अबोध बालक अपने पितासे हाथ उठाकर "गोदीमें ले" कहता है। और यदि पिता गोदीमें नहीं लेता है तो धोती पकडकर ऊपर उछलता है ! मानो वह कहता है "यह मेरा अधिकार है ! आंख क्यों बताता है ? सहज हो कर देख ! प्रेमसे देख ! मेरा अधिकार मुझे दे !" यह वैदिक ऋषिकी तेजस्वी भक्ति है। ऋग्वेदके कई सूक्तोंमें इस प्रकारकी तेजस्वी भक्तिका पावन दर्शन हो सकता है ! भक्तिका अर्थ 'भगवानके सम्मुख दीन और भिखारी बन कर रोना ही नहीं है। "भक्त पुत्रभावसे, सखा भावसे, भगवानसे लडता भी है। जैसे संत तुकाराम कहता है " क्या तू समझता है तूने मुझे बनाया है ? ना मैंने तुझे बनाया है। भक्त भगवानका बाप है ! तू अपने चरण मुझसे छीन नहीं सकता ! "यहां पर भी पिता पुत्र नाता है। ऋग्वेदके ऋषिके "देवा ! तू मुझे सहज हो गम्य हो !" के आगेकी बात तुकाराम कहता है। इसी तेजस्वी भक्तिका और एक रूप है "तेरी मायाने सारे विश्वको लपेट लिया है किंतु तुझे मेरे हृदयने लपेट किया है !" जैसे सारे परिवारको अंगुलियों के इशारे पर चलानेवाली गृहस्वामिनी नन्हेसे दूध मुहे बच्चेकी मुट्ठीमें रहती है ! यह समर्पण- जन्य तेजस्विता है। भक्तिमार्ग अथवा भक्तियोग भावशक्तिसे परमात्म-प्राप्तिकी साधना है जैसे ज्ञानयोग बुद्धि शक्तिसे तथा कर्मयोग क्रियाशक्तिसे परमात्म तत्वको प्राप्त करनेके मार्ग हैं। वस्तुतः ज्ञानयोग, कर्मयोग, ध्यानयोग, भक्तियोग आदि जीवनके पृथक् पृथक् विभाग नहीं हैं। १७५ परिशिष्ट ५

जीवन एक अखंड प्रवाह है। बुद्धिमत्तित्वसे सत्यको जानना ज्ञान है तो जो जाना उसको आचरणमें लाना कर्म है। जैसे सच बोलना चाहिए यह जानना ज्ञान है और सच बोलना कर्म। और झूठ बोलना अज्ञान ! वैसे ही परमात्म तत्त्वसे प्रेम करना भक्ति है, जिससे प्रेम किया जाता उसीका चिंतन करना (जो सहज है) ध्यान है, और जिससे प्रेम किया जाता, सदैव जिसका चिंतन होता है उसको जानना (यह भी सहज है) ज्ञान है। इसलिये ज्ञान, भक्ति, ध्यान, कर्म आदिमें एकता है। इनका संबंध ३६ का नहीं ३३ का है। एकके बाद एक सहज है। भारतके धार्मिक अथवा आध्यात्मिक आंदोलनका इतिहास वेद-कालसे प्रारंभ होता है। इसका अर्थ इसके पहले कुछ नहीं था ऐसा नहीं किंतु इसके पूर्वकालकी विशेष कोई जानकारी नहीं ऐसे कहना ही समुचित होगा। प्राचीन वैदिक धर्मका आंदोलन यजन प्रधान-यज्ञ-प्रधान था। वहां यज्ञप्रधान कर्म था। इसका इतना अधिक सुव्यवस्थित “शास्त्र” बना कि इस “शास्त्र” से बाह्य ढांचेसे-परमात्माका ज्ञान होना असंभव है ऐसे मान कर जिसके लिये यज्ञादि किया जाता है उसका “ज्ञान” प्राप्त करनेके लिये “चिंतन” और अनुसंधान प्रारंभ हुआ। यह है उपनिषद- काल। उपनिषदकाल ज्ञानप्रधान कर्मका काल है। निःश्रेयस प्रधान साधनाका काल रहा। किंतु इसमेंसे ज्ञानोत्तर जीवनमें कर्म आवश्यक या अनावश्यक ? ज्ञानोत्तर संन्यास जैसे विचारोंने जन्म लिया। उसके बाद उपनिषद प्रणीत निर्गुण निराकार ब्रह्मतत्वका आकलन-सर्व सामान्य लोगोंके लिये-असंभव होनेसे यजनप्रधान कर्मके स्थानपर भजनप्रधान या पूजनप्रधान कर्मका प्रारंभ हुआ। इसे भक्तिमार्ग कहा गया। इसमें सगुण अथवा साकार प्रतीक-यज्ञकुंडके स्थान पर मूर्तिकी- स्थापना हुई। यज्ञमें आहुति डालकर यज्ञ-शिष्ट खानेके स्थान पर मूर्तिके सम्मुख रखकर-नैवेद्य- करके प्रसाद खाया जाने लगा। भक्तिका भी एक तंत्र बना। शास्त्र बना। उसके बाह्य उपचार बने। आवरण बना। निर्गुण ब्रह्मके सगुण प्रतीक बने। निराकार तत्त्वके अलग अलग आकार बने। उसके अलग अलग पूजा-प्रकार बने। यजन प्रधान यज्ञकर्म पूजन प्रधान भक्ति-कर्म बना। भक्तिका तंत्र विकसित हुआ। उसके प्रकार बने। इस प्रकारकी भक्ति परंपरा भगवद्- गीतोत्तरकालमें विकसित हुई। इसे भागवत धर्म कहा गया है। विद्वानोंने इस भागवत धर्मके इतिहासका भी अनुसंधान किया है। इसका पहला नाम नारायणीय धर्म था। इसके आचार्य नरनारायण ऋषि थे। इसी धर्ममें, धर्म-परंपरामें श्रीकृष्णका जन्म हुआ। भगवद्गीता इसी नारायणीय धर्मका तत्वज्ञान कहती है ! इसी भगवद्गीता तथा उसको कहनेवाले भगवान कृष्णसे भागवत धर्मका प्रसार हुआ। यह काल ई. पू. १४०० साल माना जाता है। इन ३०००-३५०० सालोंमें इस भागवत धर्ममें अनेक परिवर्तन हुए। अनेक शाखा उपशाखाओंसे वह फैला यद्यपि आजभी उसके मूल-तत्त्व उसमें स्पष्ट दृष्टिगोचर होते हैं। इस मूल एकेश्वरी भक्ति पंथमें उस समय प्रचलित योगादि साधन प्रणालियोंके अच्छे अंगोंको स्वीकार किया गया। उसके बाद भक्तिके तंत्र और व्यूहोंका विकास हुआ। वैष्णव आगम शास्त्रका विस्तार हुआ। फिर ई. स. ११ वीं सदीमें श्रीरामानुजाचार्यने, बारहवीं सदीमें श्रीमध्वाचार्यने, इसके बाद श्रीवल्लभाचार्यने अपने अपने ढंगसे भागवत धर्मका विस्तार किया। इस बीचमें श्रीभास्कराचार्य और श्रीनिंबार्काचार्यने भी इस दिशामें पर्याप्त कार्य किया है। किंतु इसी बीच, महाराष्ट्रमें ज्ञानेश्वर महाराजने अपने ही ढंगसे नवोदित भागवत धर्मकी नींव डालकर उसका विस्तार किया। उपरोक्त आचार्य और ज्ञानेश्वर महाराजमें जो विशेष अंतर रहा वह, भाषाका रहा, आचार्योंने विद्वन्मान्य संस्कृत-भाषाका ज्ञानेश्वरी १७५

सहारा किया और ज्ञानेश्वर महाराजने लोक-भाषा या ज्ञानेश्वरके शब्दोंमें कहना हो तो "देशी" का आसरा लिया। आचार्योंने भक्तिका शास्त्र रचा । नव-विधा भक्तिके प्रकार (१) श्रवण (२) कीर्तन (३) स्मरण (४) पादसेवन, (५) अर्चन (६) वंदन (७) दास्य (८) सख्य (९) आत्मनिवेदन बताकर उसमें एक एक प्रकारका रूप दिखाते हुए भक्तिका तंत्र रचा ! अर्चनके रूपमें अनेक प्रकारकी पूजा-पद्धतिका विकास किया । प्रातःकालमें कैसी पूजा करनी चाहिए, माध्याह्नमें क्या करना चाहिए, शामको कैसी पूजा करनी चाहिए, भगवानको अर्पण करनेवाला तुलसीदल किन अंगुलियोंसे पकडना चाहिए । अभिषेकके समय शंख कैसा पकडना चाहिए । एक या दो, सूक्ष्म सूक्ष्म नियमोंसे भक्तिको सजाया । वंदनमें भी ! कब कैसा वंदन करना चाहिए, कब कब साष्टांग नमस्कार करना चाहिए, नमस्कारमें कौन कौन अंग भूमिको लगने चाहिए, यहां तक विवेचन किया ! फिर उन्होंने पुराणादिमें खोज खोज कर किस प्रकारकी भक्तिसे किसका उद्धार हुवा ! यह बता कर कहा । परीक्षितकी भांति श्रवण भक्ति करनी चाहिए, नारदकी भांति कीर्तन और प्रल्हादकी भांति स्मरण भक्ति करनी चाहिए, लक्ष्मीकी भांति पाद- सेवन करना चाहिए, अक्रूरकी भांति वंदन भक्ति करनी चाहिए, हनुमानकी भांति दास्य-भक्ति करनी चाहिए, अर्जुनकी भांति सख्यभक्ति करनी चाहिए, बलिकी भांति सर्वस्व समर्पण करना चाहिए !!" इससे भक्तिका वातावरण तैयार हुआ । उत्सवादि होने लगे । वैभव-प्रदर्शन हुवा किंतु भक्ति भाव जकड गया ! भक्तिका धर्म बना किंतु उसकी आध्यात्मिकता गयी । भक्तिका तंत्र खिला किंतु मंत्र मुर्झा गया ! भक्तिका प्रदर्शन खूब हुवा किंतु आत्म-दर्शन खो गया । ज्ञानेश्वर महाराजने भक्तिका तंत्र, जो बहिरंग प्रदर्शन करता है उसको छोड कर, भक्तिके मंत्र, हृदयको ले लिया । गीताका नौवा और बारहवा अध्याय भक्तिका रहस्य खोलकर बताता है । नौवे अध्यायमें भक्तिका हृदय है और बारहवे अध्यायमें उसके लक्षण । नौवा अध्याय कहता है " सर्वत्र मैं हूं" बारहवा अध्याय कहता है " इसलिये भक्तको सबसे द्वेषरहित होना चाहिए, सबसे प्रेमपूर्वक रहना चाहिए, कहीं भी अहंकार नहीं करना चाहिए, सुख दुःख सम मानना चाहिए, क्षमामूर्ति बनना चाहिए, समदृष्टि बनना चाहिए " आदि चोबीस गुणोंकी सूची है ! भगवद्गीता पढ़ते समय वे "केवल शब्द" से लगते हैं किंतु ज्ञानेश्वर महाराजने सैकडो छंदोंमें उसका भाव-गांभीर्य और अर्थ-व्याप्तिका परिचय दिया है । ये चौबीस गुण सजीव हो गये हैं । वैसे ही तेरहवे अध्यायमें ज्ञानीके लक्षण कहे गये हैं। उसमें भी ज्ञानीके अमानित्व, अदंभ, अनहंकार, आदिका अर्थ कहनेमें पांच सात सौ छंद कहे हैं। "आचार्योपासना" इस एक शब्दका अर्थ कहनेमें तो "गुरु-भक्ति" वर्णन करते करते भक्तिके "आर्तभाव दास्य-भाव, सखा-भाव, वात्सल्य-भाव, मधुरा-भाव" इन पांच भावोंका रहस्य खोलकर रख दिया है। साथ साथ, उपनिषदमें कही गयी अपनेको "गुरुसेवामें निःशेष कर" देनेकी पराकाष्ठा बतायी गयी है ! वैसे ही शिष्यको किस तरह अपनी क्रिया-शक्ति प्राण-शक्ति, बुद्धि-शक्ति, चिंतन-शक्ति, तथा भाव- शक्तिसे गुरु-हृदयको प्रसन्न करके अपना लेना चाहिए इसका भी दर्शन है । इस प्रकार "गुरुको सम्मुख रख कर सगुणोपासना" का रहस्य समझाया है । ऐसे करते समय मंदिर, मठ, पूजाके तांत्रिक विधि-विधानकी कठोर आलोचना अथवा उपरोधिक व्यंगादि नहीं है फिर भी नौवे अध्यायमें भगवानके मुखसे ही अर्जुनको इस प्रकारकी पूजा अर्चा विधि विधानयुक्त भक्तिका अत्यंत सौम्य शब्दोंमें व्यर्थता दिखाई है । यदि परमात्मा सर्वत्र है तो वृक्षलताओंमें भी है न ? तब भला पेड भगवान पर खिले हुए फूल मोच कर पत्थर भगवान पर चढ़ानेमें क्या स्वारस्य है ? १७७ परिशिष्ट ५

वैसे ही, यद्यपि ज्ञानेश्वर महाराजने महाराष्ट्रमें नवोदित भागवत धर्मकी नींव डाली, फिर भी ज्ञानेश्वर महाराजकी गुरु-परंपरा शैव है। नाथसंप्रदाय शैवसंप्रदाय है। आज कल सर्वत्र भक्ति साहित्य अथवा भक्ति संप्रदायके रूपमें वैष्णव साहित्य और वैष्णव संप्रदाय ही प्रचलित है किंतु भारतीय संस्कृतिमें शैव संप्रदायका महत्व-पूर्ण स्थान रहा है। शैव संप्रदायमें भी भक्ति-साधना की गयी है। और उसमें अधिक गहराई है। शैव-भक्ति साधनामें उत्सवादिका बाहरी आडंबर उतना नहीं है जितना वैष्णव भक्ति साधनामें है किंतु आध्यात्मिक गहराई पर्याप्त है। शैव भक्ति “सभनोंके हृदयमें परमात्मा मान कर "भक्त देह ही मम देह कहता है शिवजी !" इस पर विश्वास रखती है। इस कारणसे वह "देह ही देवालय" मान कर "यह परमात्माके निवास योग्य हो !” इस प्रकारके प्रयासको भक्ति मानता है। शैवोंने दीक्षासे जीवनमुक्तावस्था तक भक्ति साधनाको “प्रवास क्षेत्र" मान कर भक्ति साधनामें आनेवाले अनुभवोंके आधार पर भक्तिके छ पड़ाव-स्थल-माने हैं। तथा भक्तिके छ प्रकार माने हैं। किस स्थल पर किस प्रकारके अनुभव आयेंगे तथा कौनसा अनुभव आनेपर क्या करना ? ऐसा साधनाक्रम कहा गया है जो अधिकतर आंतरिक चित्त-शुद्धिका है। वहां भक्तके लिये व्रत कहे हैं जो गुण-विकास प्रधान है जैसे गीतामें अद्वेष आदि हैं। शैव भक्तों ने पर्याप्त नाम महात्म्य गाकर भी “जैसे रोटी रोटी कहनेसे पेट नहीं भरता, दीप दीप कहनेसे प्रकाश नहीं मिलता" ऐसे उदाहरण देकर “केवल नाम जपसे कुछ नहीं बनता ! भगवानका नाम जीभ पर लेनेके पहले, असत्य वचन छोड़ कर, कटु वचन छोड़ कर, पर निंदा छोड़कर...... जीभ शुद्ध करनी चाहिए ! तभी वह जीभपर खेलेगा ! फलेगा !!" ऐसे जीवन शुद्धिका मार्ग बताते हुए "पर-द्वेष छोड़ कर, सबसे प्रेमसे रहकर, परवित्त परदारापहरणका विचार भूलकर......हृदय शुद्ध होने पर “जप दैवत" हृदयमें स्थिर होगा !" आदि सिद्धांत अथवा विधि-निषेध बताकर भक्ति मार्गके छ पड़ाव बताये हैं। इन्होंने भक्ति-साधनाके लिये जो व्रत कहे हैं वे भी विचारणीय हैं। "परायी संपत्तिको न छूना व्रत है ! तथ्योंको गलत न समझना और समझाना एक व्रत है ! जो जो जैसे अनुभव होता है उसको निर्वचनासे वैसे ही व्यक्त करना एक व्रत है ! अपने उपास्यसे एक निष्ठ रहना एक व्रत है !” इसी भांति उनका पूजा विधान है ! वे कहते हैं “बिना इसके कोटि कोटि जप भी व्यर्थ हैं !” इस प्रकार व्रतस्थ भक्तोंमें ऐक्य-भक्त, गीताकी भाषामें जो “मद्रूप" हुआ है सर्व श्रेष्ठ है। इसमें और परमतत्वमें कोई अंतर ही नहीं। इससे नीचे है शरण भक्त है। वह सर्वस्वी ईश्वर शरण है। उसने सब कुछ ईश्वरापंण करके अपना कुछ नहीं रखा है। ऐसा भक्त सदैव ईश्वराधार होता है। अगर कुछ उसका है तो ईश्वर है। भूख-प्यास लगी तो वह ईश्वरको पेट दिखा कर रोता है ! वह कहता है "तुझे पूजूंगा, तुझे गाऊंगा। तेरा स्मरण करूंगा। तेरा ही आधार चाहूंगा ! तेरे बिना मेरा और कुछ नहीं !! तू है तू है तू ही है !!!" ऐसे भक्तोंने आचार्योंसे प्रचलित "विधिविधान युक्त तांत्रिक पूजा अर्चाका" उपहास किया है। ऐसे भक्तोंने अपने स्वामीका परिचय देते समय “सर्वात्मक देव !" "जगदंतर्यामी !” "आदि पुरुष" आदि शब्दोंके प्रयोग किये हैं। तथा जैसे देव-भक्त हैं वैसे देश-भक्त भी हैं। देव तथा देश इसका विचार छोड़ दिया जाय तो भी पतिभक्ति, परिवारभक्ति, ध्येयभक्ति, भक्तिके ये अनेक प्रकार हैं। किंतु किसी भी प्रकारकी भक्तिकी आधारशिला निष्ठा है। और उसके लिये आवश्यक सातत्यको टिकानेके लिये मनुष्यको कुछ गुणोंकी आवश्यकता है। वे गुणही भक्तिका हृदय है। इसके लिये बाहरी आचरणकी कोई आवश्यकता नहीं दीखती। दैवी गुणोंकी उपासना करते ज्ञानेश्वरी १७८

करते, अपनेमें दैवी गुण का कर उनका विकास करते करते, मनुष्यको महादेव बनना है। मनुष्यका ऐसे महान बननेकी साधना ही भक्ति है। मानव समाजके पूर्वज अपनी थाथीके रूपमें जो आनेवाले मानवी समाजको देते आये हैं, भले ही वह समाज शैव हो, वैष्णव हो, हिंदू हो, मुसलमान हो, या ईसाई; पाश्चात्य हो या पौर्वात्य। सबके सब जगदंतर्यामीके भक्त हैं! क्यों कि वह जगदंतर्यामीसे अविभक्त है। अनेक कारणोंसे मनुष्य इस अविभक्तत्वका, एकताका अनुभव नहीं कर सकता इतना ही। इसी एकताके अनुभवके लिये मानवकुलने जो जो साधना की है उसकी संस्कार संपत्ति, आनेवाले वारसको दी है। ऐसे देते आये हैं। इसलिये भक्तिका इतिहास मानव-कुलके इतिहासके साथ जुडा हुआ है। भले ही देश-कालके अनुसार उसका बाह्यरूप बदलता गया हो। इसका अंतरंग एक है। वह है अपने पूर्वदांतर्यामीसे ऐक्यताका अनुभव करना। इस अनुभवसे जीवनमें पूर्णता आती है। वह जीवन सदैव आनंद-विभोर रहता है। यही मानव-जीवनका अंतिम साध्य है। सदैव, सर्वत्र, निरालंब शाश्वत आनंदमें लीन रहे ! भ्रूमध्य—दो भौवोंके बीचका स्थान। योग-मार्गमें इस स्थानका अत्यंत महत्त्व है। षट्चक्रोंमें यह आज्ञाचक्रका स्थान है। ज्ञानतंतुओंकी, अथवा इडा, पिंगला, सुषुम्नाके अतिरिक्त गांधारी, हस्तिजिन्हा, पूषा, पयस्विनी, अलंबुसा, कौशिकी, कुहू, शंखिनी, वारुणी, विश्वोदरी, सरस्वती आदि सूक्ष्म नाडियोंके उलझनसे बने हुए कमलकी ६ चक्राकृतियोंको योग-शास्त्रमें चक्र कहा है। कहीं कहीं कमल भी कहा गया है। मूलाधार चक्रसे-जो कुंडलिनी शक्तिका स्थान है- जागृत कुंडलिनी शक्ति जब सहस्रारकी ओर बढ़ती है तब उसके स्पर्शसे ये चक्र कमलसे खिलते हैं। इसको कुंडलिनीद्वारा किया गया चक्रभेदन अथवा षट्चक्र शोधन कहते हैं। दो भौवों के मध्य जो आज्ञाचक्र होता है उससे मेरूदंडस्थित सुषुम्नाका सीधा संबंध है। दो भौंवोंका बीचका यह चक्र इसकी सीधमें, पीछे मेरुदंडके अंतिम छोर पर है। वह विद्युत् वर्णका है तथा इसकी दो पंखुडियां हैं। सद्गुरु इस चक्रकी देवता है। आज्ञाचक्रमें ध्यान करनेसे उपनिषदमें कहे गुरुहृदय निकटता, गुरुमें निःशेष होनेकी साधना सिद्ध होती है तथा गुरुकी इच्छाशक्ति शिष्यमें कार्य करने लगती है। इससे शिष्यका शिष्यत्व-पृथक्त्व-नष्ट हो कर गुरु-शिष्यके जीवनका समरसैक्य होते हुए साधक पूर्णत्वस्थाको पहुंचता है। मन—ऋग्वेदमें विराट्-पुरुषका वर्णन करते समय "चंद्रमा जिसका मन है!" कहते हुए मनके विषयमें अत्यंत सूचक ज्ञान दिया गया है ऐसे विद्वानोंको कहना है ! चंद्रमा पर-प्रका- शित है। स्वप्रकाशित नहीं। वैसे ही मन है। यह परोपजीवी है ! इसी मनके विषयमें कहा है "वह त्रिकालके विषयमें जानता है। मनके कारण इंद्रियोंसे सब काम होता है। जागृतिमें वह दूरातिदूर जाकर निद्रामें समीप आकर आत्म-दर्शनमें समर्थ होता है। वह इंद्रियोंका प्रेरक है। मनमें विश्वका सभी ज्ञान घर किया हुआ है। जैसे सारथी रथको सही रास्ते पर चलाता है वैसे यह मन इंद्रियोंको चलाता है। हृदयस्थ इसी मनके कारण सदैव युवावस्थामें रहता है। इसलिये मनको सदैव शुभ संकल्पसे युक्त रखना चाहिए!" उपनिषदोंमें मनके विषयमें बहुत कुछ कहा गया है। उपनिषदमें कहा है "मन अन्नमय है और वह अन्नसे बना है। उसका अस्तित्व अथवा शुभाशुभत्व पचन क्रिया पर निर्भर है। मनुष्य जो कुछ खाता है उसका ठोस भाग मल बनाता है, मध्यम ठोस तत्त्वका मांसादि बनता है और अत्यंत सूक्ष्म जीवन-तत्त्वसे मन बनता है ! दही मथनेसे जैसे उसमेंसे अत्यंत सूक्ष्म-भाग मक्खन ३७९ परिशिष्ट ५

के रूपमें ऊपर आता है वैसे!" यह छांदोग्य उपनिषदका मंतव्य है। भारतकी कई भाषाओंमें "जैसे अन्न वैसे मन" वाला मुहावरा भी चलता है। भगवद् गीतामें भी "सात्त्विक, राजसिक, तामसिक आहारसे वैसे मन बनता है!" ऐसा कहा गया है। इसीलिये भारतीय विचारकोंने "नैतिक दृष्टिसे भी अन्नशुद्धिका विचार" किया है। उपनिषद् कहते हैं "पवित्र अन्नसे सत्त्व-शुद्धि होती है। सत्त्व शुद्धिसे स्मृति दृढ होती है। स्मृति दृढ होनेसे मनुष्य-मन-बंधन मुक्त होता है।" उपनिषदोंमें कहा गया है "मनसे ही मनुष्य सुनता देखता है। मनसे ही वह संकल्प करता है। काम, चिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृति, अधृति, लाज, भीति आदि सब मनके ही रूप हैं।" मनोव्यापारोंका विवेचन करते समय ऐतरेयोपनिषदमें कहा गया है "संज्ञान, अज्ञान, विज्ञान, प्रज्ञान, मेधा, दृष्टि, धृति, मति, मनीषा, स्मृति, संकल्प, क्रतु, प्राण, जीववशा, काम, आत्मसंयम, ये सब मनके अलग अलग नाम हैं!" इसी उपनिषदमें उपरोक्त शब्दोंसे वर्णित मनके अनुभवोंका विश्लेषण भी किया गया है। बृहदारण्यकोपनिषदमें "वृक्ष तोड़ने पर उसकी जड़ सजीव होनेसे जैसे वह पुनः जीवित हो उठती है वैसे मृत्युरूपी वृक्ष तोडनेवालेने बार बार तोड़ने पर भी बहर कर बढनेवाले इस जीवन-वृक्षकी जड़ कौनसी होगी भला?" ऐसे प्रश्न करके "मनमें पूँजीभूत किये हुए संस्कार जिससे जीव पुनः पुनः शरीर लेकर आता है" ऐसे कहा गया है। मीमांसा दर्शनके अनुसार मन अंतरिंद्रिय है। वह भौतिक है। मन स्वतंत्र रूपसे आत्म- गुणोंका ग्रहण कर सकता है। मनको आत्माके संयोगसे ज्ञानेंद्रियों द्वारा बाहरी विश्वका ज्ञान होता है। न्यायदर्शनमें मनको अंतरिंद्रिय मानकर कहा गया है। "मनके द्वारा ही सुख दुःख राग द्वेषादि अनुभव होता है। मन अणु-परिमाण है। मन एक समय एक ही स्थान पर रहता है। आत्मा तथा इंद्रियोंके साथ न हो तो मनको कोई ज्ञान नहीं होता। मन शरीरमें रहता है। मरनेके साथ यह शरीरसे निकल जाता है। यह उपसर्पण कर्म कहाता है। यही मन अपने संस्कारोंके साथ आगे दूसरे शरीरमें प्रवेश करता है। न्याय-दर्शनके अनुसार मोक्षावस्थामें भी मन आत्माके साथ रहता है।" इतना मनका महत्त्व है। दर्शनकारोंने मनको "संकल्प-विकल्पात्मक" माना है। आधुनिक मानस-शास्त्री भी शरीर और मनका संबंध मानकर पचन-क्रिया और मनका संबंध स्वीकार करते हैं। अंग्रेजी भाषाकी "सुदृढ शरीरमें ही सुदृढ मन" कहावत प्रसिद्ध है। इसीलिये हठ योगमें मनको स्थिर करनेके लिये-शरीर पर ध्यान दिया है। वहाँ शरीर शुद्धिका अत्यंत महत्त्व है। उनका कहना है "संपूर्ण स्वस्थ शरीरमें ही सदैव मन एकाग्र रहता है!" कुछ विद्वान मनको अग्नि-तत्त्वका अंश मानते हैं। तथा मन उसके विषय एक हैं। मनुष्यमें मन और आत्मतत्त्वका संयोग होनेसे ही मनुष्य अन्य प्राणियोंसे भिन्न है और अन्य कोई प्राणि नहीं कर सकते ऐसे महत्त्वके काम करता है। इसी कारणसे उसको ज्ञानेंद्रियोंकेद्वारा बाहरी विश्वका ज्ञान होता है। मानव और मानवेतर प्राणियोंमें इंद्रिय संवेदनकी सभी क्रियायें समान हैं। किंतु मनकी विचार करनेकी शक्ति मानवकी विशेषता है। शरीरस्थ मनका आत्मासे संबंध आता है, इसीसे वह ज्ञानेंद्रियोंसे प्राप्त ज्ञानके सहारे उसको स्मरणमें रखकर-विचार कर सकता है। विचार करनेका अर्थ अपने उस अव्यवस्त ज्ञानसंग्रहको जो इंद्रियोंके द्वारा एकत्र किया गया है तरतीबसे रखकर रूप देता है! मनके दो प्रकार होते हैं। (१) क्रियाशील मन (२) निष्क्रिय मन। निष्क्रिय मन शरीरके साथ ही जन्म लेता है और शरीरके साथ समाप्त भी होता है किंतु क्रियाशील मन ज्ञानेश्वरी १६०

चिरंतन स्वरूपका है जो संस्कार रूपसे पुनर्जन्ममें भी साथ जाता है। जीवनके सारे संस्कारोंको वह संग्रह कर लेता है। स्मरणके रूपमें वही विचारका साधन बनता है। मनुष्यकी सभी इच्छाएं, भावनाएं, विचार, विकार आदिका संघर्ष मनमें होता है और बुद्धि इन सबका विवेचन, विश्लेषण, तुलना, आदि करके तर्कसे अनुमान लगा कर निर्णय करती है। और जीवनको निश्चयानुसार चलाती है ! महत्तत्त्व—यह सांख्यका शब्द है। प्रकृतिके सात्विक अंशसे महत् तत्त्वकी-जिसे बुद्धितत्त्व भी कहते है-अभिव्यक्ति होती है। महत्को प्रकृतिकी विकृति भी कहा गया है। महत्त्वमें भी सत्व रज तम हैं। किंतु सत्व इसका प्रधान गुण है। सत्वका धर्म तथा प्रकाश इसके सूक्ष्म रूपमें निहित है। सभी गुण महत् तत्त्वमें परिणत नहीं होते। अंतमें-प्रलयकालमें-महत् तत्व त्रिगुणोंमें ही विलय होता है। जब महत्तत्त्व गुणत्रयमें लीन होता है तब वह बारह हिस्सोंमें बंटा जाता है। उसमें दस हिस्से शुद्ध सत्वमें तथ एक एक रजस् और तमस्‌में लीन होते हैं। फिर सृष्टिके समय इन्हीं भागोंसे महत् तत्व बनता है। महाशून्य—बौद्ध योगाचारमें अथवा बुद्धागममें शून्य अनिर्वचनीय है। बौद्ध दर्शनमें कहा गया है "जो इस शून्यको समझ सकता है वह सब कुछ समझ सकता है। तथा जो शून्यको नहीं समझता वह कुछ भी नहीं समझता !” यही सत्य है। यही अंतिम तत्त्व है। सारी सत्ताएं आंतरिक और बाहरी सत्ताएं-इसी शून्यमें लीन हो जाती हैं। यह शून्य सत् और असत्-अस्ति नास्ति-दोनोंसे विलक्षण है और सत् असत् दोनों शून्यके गर्भमें लीन हैं। शून्य अभावात्मक नहीं हैं क्यों कि इसी शून्यमेंसे समस्त विश्वकी अभिव्यक्ति है। यही परमपद है। इस शून्यका विवेचन करते समय कहा गया है न है सत् या न है असत् जो दोनोंसे रहा भिन्न। चारोंसे यह है मुक्त विश्नोंका पद श्रेष्ठ है॥ कुछ विद्वानोंका कहना है कि इसी शून्यवादको लेकर आद्य शंकराचार्यने अपने अद्वैतवादका विकास किया है। किंतु ऋग्वेदके नासदीय सूक्तमें इसका दर्शन होता है जो कुछ भी नहीं था तब था और उसीमेंसे यह सब निकला है। वह भी अनिर्वचनीय है। कुछ नहीं था तब “वह” था ऐसे कहा गया है और नासदीय सूक्तका “वह” यहां शून्य हुआ है। दक्षिणके शैव संतोंने इस शून्यका उल्लेख किया है। शून्यको निःशून्य भी कहा है वह ज्ञानेश्वरीमें शून्य और महाशून्यके रूपमें आया है। सृष्टिकी रचनाका विचार करते समय “शून्यको शून्यमें बोकर शून्यकी फसल काटी !” ऐसा वर्णन है। यह सारा शून्य है और यह सारा ब्रह्म है। दोनों एक है, उपनिषदोंमें ब्रह्मका वर्णन करते समय भी “वह अनिर्वचनीय और सत् असत्से परे” होनेकी बात कही है। वहां ब्रह्मका वर्णन मौनसे है। मौनसे जिस प्रश्नका उत्तर दिया जाता वह ब्रह्म है !! माया—कुछ विद्वानोंकी मान्यता है कि माया अथवा मायावाद श्रीआद्यशंकराचार्यके प्रतिभा-संपन्न मस्तिष्ककी कल्पना है। अथवा वह उन्होंने बौद्धोंके शून्यवादसे ली है! किंतु “मायावाद” की कल्पना उपनिषदमें मिलती है। इतना ही नहीं ऋग्वेदमें स्वयं “माया” भी मिलती है। ऋग्वेदमें कहा गया है। १८१ परिशिष्ट ५

मायासे-दीखता इंद्र आप विविध रूपसे !" यहां माया एक आवरण है जिससे इंद्र विविध रूपसे दीखता है। आवरण की यही कल्पना ईशावास्योपनिषदमें— आवृत्त है सत्यका मुख जो हिरण्मय पात्रसे । पूषा कर तू निरावृत्त सत्य-धर्म रतके हित ॥ १५ ॥ ऐसे ही १७ वे मंत्रमें ऋषि प्रार्थना करता है— पूषा तू एकाकी ऋषि यम सूर्य प्रजापति निरावृत्त कर तेरे रश्मि-व्यूह-समूहको ॥ परम-कल्याणमय रूप देख करता मैं “वह पुरुषही मै हूं" ऐसी ही बोधानुभूति ॥ इसमें संदेह नहीं कि उपनिषदमें बार बार यह शब्द नहीं आया है किंतु माया के मूलमें जो कल्पना है उसको पर्याप्त मात्रामें देखनेको मिलती है । इतनाही नहीं आद्य-शंकराचार्यजीके मायावादके लिये आवश्यक सारी विचार सामग्री वहां विद्यमान है। इसके बाद गीतामें भी— रहा है सब भूतोंके हृदयमें परमेश्वर । मायासे ही चलाता जो यंत्रों पर चढा कर ॥ यहां भगवान अपनी मायासे सभी भूतोंको चलाता है तो गीताके सातवे अध्यायमें— हीन मूढ दुराचारी मेरा आश्रय छोडके । भ्रांत होकर मायासे पाते हैं भाव आसुरी ॥ मायामें भ्रांत हो कर भगवानको भूल जाते है । माया शब्दका यहां एक अर्थ नहीं है। यहां मायाके भिन्न भिन्न अर्थ दीखते हैं। वेदमें जो इंद्रकी माया है वह इंद्रकी शक्ति है। ईशावास्यका हिरण्मय आवरण ईश्वरकी शक्ति है, और मुंडकोपनिषदकी गांठ है वह जीवकी माया है, जो अविद्या रूप है। प्रश्नोपनिषदमें भी इस प्रकारके आवरणका उल्लेख है जिससे जीव छल कपटादिमें लिपट जाता है। प्रश्नोपनिषदका यह आवरण तथा ईशावास्यका रश्मिव्यूहसमूह एक है जिसके निरावृत्त करनेसे "वह पुरुषही मैं हूँ ऐसा बोधानुभव" होता है। यही श्री आद्य शंकराचार्यके मायावादका प्रेरणास्रोत है। यह “उसे” ढकनेवाला स्वर्ण पात्र-चमकीला है जिसके विषयमें, देखने वालेको मोह हो ! जो देखने वालेकी आंखोंको चौंधिया देता है ! फिर रश्मि व्यूह समूह है जो विविध नाम रूपसे बुना गया है ! इसी प्रकार कठोपनिषदमें, मुंडकोपनि षद्में, भिन्न उपमाएँ देकर "सत्य पर आवरण” होनेकी बात कही गयी है और इस "आवरणको" अविद्या अथवा “अज्ञान” नाम दिया गया है। आगे मुंडकोपनिषदमें इसे गांठकी उपमा देते हुए कहा है। रहता हृदय गुहामें तू जान उस पुरुषको । वहां है जो अविद्या ग्रंथी खोले बिन नहीं दीखता ॥ इसीलिये उपनिषद विद्याको सामर्थ्य मानकर अविद्याको दौर्बल्य मानते हैं। अपने ही सामर्थ्यसे यह हृदय-ग्रंथी खोलनी पडती है। इसका भी वर्णन है। ज्ञानेश्वरी १८२

" छूटती हृदय-ग्रंथी मिटते सब संशय " कठोपनिषदमें एक स्थान पर इस " आवरण " अथवा " गांठको " अध्रुव अर्थात् अनिश्चित, असत्य, बदलने वाली, आदि कहा गया है । इस आवरणको " असत्य " कहा है । यह कहते समय अनेक उपनिषदोंमें अनेक उपमायें दी हैं । किंतु श्वेताश्वतरमें स्पष्ट रूपसे " माया " शब्द आया है । यहां पर " सतत ईश्वर चिंतनसे ईश्वरसे एकरूप होनेके बाद यह " माया " नहीं रहती ऐसा कहा गया है । वैसे ही ऋग्वेदकी " मायासे दीखता ईश आप विविध रूपसे " इस बातको पुन: बृहदारण्यक उपनिषदने भी कहा है । इतना विवेचन करने पर यह कहना आवश्यक नहीं रहता कि माया अथवा मायावाद आद्य शंकराचार्यके प्रतिभा संपन्न मस्तिष्ककी उपज नहीं है । गीतामें भी ईश्वर सबके हृदयमें बैठकर-यांत्रिककी भांति-सभी प्राणिमात्रको संसार चक्र पर घुमाता है । " ईश्वरी मायासे लोगोंका तत्त्वभाव नष्ट होकर वे आसुरी योनिमें जाते हैं !" उपनिषदका तथा गीताकी इन सब बातोंको लेकर गौड-पादाचार्यने " जगत एक दृश्य और आभास है" ऐसा कहा । इतना ही नहीं अपितु " जगत निर्माण ही नहीं हुवा !" ऐसा भी कह दिया । भारतीय तत्त्व- ज्ञानमें इसको अजात वाद कहते हैं। "विश्व है" ऐसा न मान कर विश्वका अस्तित्व ही अस्वी- कार करनेसे इसके आवरणमें वह न दीखनेका प्रश्न ही नहीं रहता । इससे "द्वैत केवलं माया है अद्वैत ही सत्य है !" यह बात भी मिट जाती है। जगतके विषयमें कहते समय गौडपादाचार्य कहते हैं "कुछ लोग कहते हैं विश्व ईश्वरकी महिमा है तो और कुछ लोग कहते हैं यह ईश्वरी कृति है; कुछ लोगोंके मतसे यह एक स्वप्न है तो कुछ लोगोंके मतसे यह भास है। कुछ लोग इसे ईश्वरकी इच्छा मानते हैं तो कुछ लोग ईश्वरकी भोग्य-वस्तु मानते हैं । कुछ लोग उसे ईश्वरकी लीला कहते हैं तो कुछ ईश्वरका स्वभाव मानते हैं । इन सब मतोंके विरुद्ध, जगत निर्माण ही नहीं हुवा ऐसे माननेवालोंकी बात ही सही है !!" गौडपादाचार्य और एक स्थान पर कहते हैं " जहां बोलना समाप्त होता है, सभी चिंताएं समाप्त होती हैं, तथा शांति और चिरंतन सत्य प्राप्त होता है वही परमश्रेष्ठ समाधि है । जगत सत्य है, यही जिनको सच्चा लगता है, तथा जिनको नीतिमार्गसे जाना अपरिहार्य लगता है, चाहे तो उन लोगोंके लिये प्राचीन ऋषियोंने जगत निर्माण हुवा है ऐसे माननेका सुझाव दिया है !" इस प्रकार गौडपादाचार्यने "तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे " जगत निर्माण हुवा ही नहीं यह मानकर भी "नैतिक दृष्टिसे अथवा ईश्वर प्राप्तिके प्रयत्न सफल हो इस लिये " जगतका सत्यत्व स्वीकार किया है। और आद्यशंकराचार्यने उपनिषद और गौडपादाचार्यसे ली गयी सभी कल्पना- ओंके आधारसे अपने मायावादका ताना बाना बुना है। वे कहते हैं "सदसद् निर्वाचा स्वरूप-माया अनिर्वचनीय है क्यों कि वह न तो सत् हैं न असत् । वह तो एकका दूसरे पर आरोप है जैसे रस्सी पर सांपका आरोप है । सीप पर चांदीका भास है ।" " अपने मनस्थितिके अनुसार आकाशमें भी मलिनत्वके भावकी कल्पना होती है !" इसलिये शंकराचार्यके मतसे मायाका अर्थ "यह जगत केवल इंद्रियजन्य भास है जैसे मृगमरीचिका !" अर्थात् शंकराचार्यके मतसे " मायाका अर्थ ब्रह्मके अधिष्ठान पर प्रतीत होनेवाला जगतका भास है !" शंकराचार्यने "जगत एक कल्पना है।" "जगत एक शून्य है !" कहनेवालों पर अत्यंत कठोर प्रहार किये हैं। शंकराचार्यके मतसे " केवल इंद्रियोंकी दृष्टिसे-सिद्धांततः अथवा तत्त्वतः या परमश्रेष्ठ सत्यकी दृष्टिसे नहीं-जगतकी सत्यता स्वीकार है !!" जगतकी ओर देखनेकी शंकराचार्यकी पारमार्थिक तथा व्यावहारिक दृष्टि भिन्न है । १८४ परिशिष्ट ५

काश्मीर शैवेति-शैवागमोंमें-मूलतत्त्व पर जो आवरण है उसको माया कहते हुए उसको पंचकंचुक पंचावरणयुक्त-माना है । वे कंचुक अथवा आवरण हैं कला, विद्या, राग, काल और नियति । इनके कारण मूलतत्त्व आवृत्त रहता है । द्वैतसिद्धांतानुसार अविद्या अथवा माया अनादि है । ब्रह्मासे यह प्रकट हुई । पंचमहाभूतोंका तमोगुण इसका उपादान है । इस अविद्याकी पांच श्रेणियां हैं। मोह, महामोह, तामिस्र, अंधतामिस्र तथा तम । जीवाच्छादिका, परमाच्छादिका, शैवला, माया ऐसे इस-अविद्याके चार भेद हैं । वल्लभाचार्यके शुद्धाद्वैतके अनुसार ब्रह्मकी शक्ति-सद्ंशकी क्रियारूपा और चित् अंशकी व्यामोहरूपा माया है । यह त्रिगुणात्मिका है । यह जगतकी कर्तृत्वरूपा मायाका अंश है । यह जगदुत्पत्तिरूपमें आनंदरूपका कारण भी है । मायामें भी जगत् का कर्तृत्व भगवानकी इच्छासे ही है । ज्ञान और क्रिया दोनों भगवानकी शक्तियां हैं । चिदंशकी शक्ति व्यामोहिकाको-अविद्या अथवा माया कहा गया है । मुक्ति अथवा मोक्ष--मुक्ति अथवा मोक्ष कोई स्थान नहीं किंतु एक स्थिति है । वह जीवनकी पूर्णावस्थाका अनुभव है । अपूर्णताका बोध ही दुःख है । "मैं पूर्ण हूँ" यह बोध होनेसे दुःख नाश और शाश्वत सुखका अनुभव होता है । सुख अथवा आनंद बाहरी साधन अथवा परिस्थिति पर निर्भर नहीं है । वह निरालंब है । वह अपनेमें अपनेसे ही प्राप्त होनेवाला सुख है । तभी वह शाश्वत रूपसे मिल सकता है । यह शाश्वत सुखावस्था दो प्रकारकी है । एक जीवन्मु- कावस्था, दूसरी विदेहमुक्तावस्था, बिना जीवन्मुक्तावस्थाके विदेहमुक्ति मिलना असंभव है । यह जीवन्मुक्तावस्था दो प्रकारकी है । पहिली क्षणिक, चित्तैकाग्रतासे ध्यान धारणाद्वारा समाधि लगा कर प्राप्त की जाती है । जब तक चित्त समाधिलीन है तब तक आनंदानुभूति । दूसरा सहजावस्थाका आनंद । यह सहज समाधि है ! यह विश्वकी मूल-शक्तिमें समरसजन्य आनंद है । मन ब्रह्मलीन और इंद्रियां कर्मलीन ! कहीं द्वैत भाव नहीं । यह दूसरी प्रकारकी जीवन्मुक्तावस्था है । मनुष्यकी सभी संकुचित मनोवृत्तियोंके विलयके बाद "मैं और मेरा" भी नष्ट हो जाता है तब वह "परमात्म्य समरसैक्य" अनुभव करने लगाता है । यही वास्तविक जीवन्मुक्ता- वस्था है । उस समय वह "अपनेको पानीमें गलाकर नमकीनपनके रूपमें रहनेवाले नमककी भांति" रहता है ! न रहनेका सा रहता है । एक बार ऐसी जीवन्मुक्तावस्था प्राप्त होने के बाद जब शरीर छूटता है तब विदेहमुक्ति अपने आप मिलती है [मीमांसादर्शनमें मुक्तिका विचार करते समय "प्रपंच संबंध विलयको मुक्ति" कहा गया है] शैव दर्शनके अनुसार स-शरीर मनुष्यको जब शिव-शक्ति सामरसका बोध होता है वह जीवन्मुक्तावस्था कहलाती है । इसे चिदानंद प्राप्ति कहा गया है । ऐसा मनुष्य शरीर छूटनेके बाद परम-शिवमें विलीन हो जाता है ।] भेदाभेद दर्शनके अनुसार सभी उपाधियोंसे छूट कर जीवका अपने स्वाभाविक स्वरूपमें रहना ही मुक्ति है । इसके दो भेद हैं । सद्योमुक्ति तथा क्रममुक्ति । ब्रह्मोपासना करनेपर जो मुक्ति मिलती है वह सद्योमुक्ति है और जो कार्यस्वरूप ब्रह्मके द्वारा मुक्ति मिलती है वह क्रममुक्ति है । ये लोग जीवन्मुक्ति नहीं मानते । ज्ञानेश्वरी १८४

माध्वमतके अनुसार भक्ति ही मुक्तिका साधन है। केवल परमात्मकृपासे ही मुक्ति मिलती है। यह मुक्ति चार प्रकारकी है। सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य, सायुज्य। माध्वोंमें मुक्तिको भी जीवका भोग माना है। मुक्तजीव संसारमें नहीं आते। ब्रह्मादि भी मुक्त हो जाते हैं और तब उनको सृष्टि आदिका व्यापार नहीं रहता। वेदांतियोंकी मोक्षावस्थामें सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य, ऐसी चार अवस्थायें हैं। जिस समय मनुष्य अपना मानवी रूप भूलकर उपास्य देवता रूप हो जाता है तब सारूप्यावस्था कहलाती है। वैसे ही वह अपने आपको मैं ईश्वरीय लोकमें हूँ ऐसे अनुभव करने लगता है तब सालोक्यावस्था कहलाती है। और वह अपनेको ईश्वरके समीप मानने लगता है तब सामीप्यावस्था कहलाती है तथा जब वह अपनेको ईश्वरमें लीन मानता है तब सायुज्यावस्था कहलाती है। मुद्रा—योगविद्यामें कमरके ऊपरके भागको विशिष्ट स्थितिमें रखनेकी क्रियाको मुद्रा कहा गया है। प्राणायाममें उत्तम सिद्धि प्राप्त करनेमें इन मुद्राओंकी आवश्यकता कही गयी है। साथ साथ धार्मिक विधि विधानोंके समय अवयवोंका विशिष्ट आकारमें रखना भी मुद्रा कहलाता है। मुद्रा शब्द मुद् आनंदित करना इस धातुसे बना है। ऐसा माना जाता है कि ये मुद्रायें १०८ हैं किंतु ये सब प्रचलित नहीं है। योग-संहिताओंमें सिंहमुद्रा, ब्रह्ममुद्रा, शांभवी मुद्रा, योगमुद्रा, काकीमुद्रा, महामुद्रा, षण्मुखीमुद्रा, अश्विनीमुद्रा, शक्तिचालन, खेचरी, भूचरी, चाचरी, अगोचरी आदि मुद्रायें प्रचलित हैं। योग-साधनामें इनका बड़ा महत्व कहा गया है। मूलबंध—अपानवायुको ऊर्ध्वमुख करके प्राण वायुके साथ मिलाना इसका उद्देश्य है। सिद्धासनमें बैठ करके बाईं पैरकी एड़ीसे सीवन दबाते हुए गुदद्वारका संकोच करके जहां तक हो सके गुदद्वारको ऊपर खींचना चाहिए जैसे घोडा मलोत्सर्गके बाद ऊपर खींचता है। इससे प्राण अपानका संयोग होकरके सुषुम्नामें प्राणकी गति तीव्र होनेमें बडी सहायता मिलती है। प्राणापानके संयोगसे नाभीके नीचे जो त्रिकोणाकृति-वैश्वानर अग्निमण्डल-अग्निस्थान है वहां अपानका प्रवेश होता है। तथा जठराग्नि प्रदीप्त होता है। साथ ही साथ इस अग्निके प्रदीप्त होनेसे, प्राणापानके साथ वैश्वानरके सुषुम्नामें प्रवेश होता है जिससे सुप्त कुंडलिनी जागृत होती है। प्राणापानका संयोग, अग्निस्थानका उदीपन, मलमूत्रका क्षय, सुप्तकुंडलिनीकी जागृति, अपानसिद्धि ये इस बंधके उद्देश्य हैं। मेरु पर्वत—पुराणोंमें स्थान स्थान पर मेरु पर्वतका उल्लेख आता है। यह स्वर्ग मृत्यु पाताल इन तीनों लोगोंका आधार है। यह विश्वके मध्यभागमें होनेका भी उल्लेख है। इसको स्वर्ण-पर्वत भी कहा गया है। इस पर्वतके अंतिम शिखरको स्वस्तिक कहा गया है। योग—अलग अलग लोगोंने अथवा व्यक्तियोंने इस शब्दका अलग अलग अर्थ किया है। जैसे गीतामें-योगको "कर्म कुशलता" कहा है। "आत्म-बुद्धिसे साम्य-दर्शनको योग" कहा है। पतंजलने "चित्तवृत्तिके निरोधको ही योग" कहा है तो योग शब्दका धात्वर्थ "जुडना" है। किंतु साधनाकी दृष्टिसे साधक अपनी अभ्याम्यशक्तियोंके सहारे आत्मदर्शन कर सकता है और इन भिन्न भिन्न पद्धतियोंके कारण अनेक प्रकारके अलग अलग योग कहलाते हैं। जैसे (१) प्राण- शक्तिके निरोध द्वारा शरीर और प्राण शुद्ध करके तद्द्वारा आत्मसाक्षात्कार करना हठयोग अथवा प्राणयोग कहलाता है। (२) क्रिया शक्ति-द्वारा निष्काम कर्मकरके आत्मानुभूति करना कर्मयोग १८५ परिशिष्ट ५ (13)

कहलाता है । (३) चित्त शुद्धि करके चिंतन शक्तिद्वारा निर्वृत्त चित्तमें समाधिमें लीन होकर आत्मसाक्षात्कार करना ध्यानयोग अथवा राजयोग कहलाता है । (४) बुद्धि शक्तिद्वारा अपने आपको जानकर उसीमें लीन होना ज्ञानयोग कहलाता है । (५) और भाव शक्तिद्वारा आत्मासे निष्काम और निःसीम प्रेम करके तद्रूप हो जाना भक्तियोग । ये पांच महान योग हैं । इसके अलावा जप-सातत्यसे अपनेमें उठनेवाली शब्दतरंगोंद्वारा जीवन शुद्ध करते करते शब्द ब्रह्ममें लीन हो जाना जपयोग कहलाता है । तथा अनेक प्रकारसे कुंडलिनी शक्तिको जगा कर तद्द्वारा आत्मदर्शन करना कुंडलिनी योग कहलाता है । इन सभी योग साधनामें यम-नियम हित-मित आहार विहार, सतत ध्येय निष्ठा साधना, चिंतन और प्रयोग, स्वाध्याय आदिकी समान आवश्यकता है । बिना इसके कोई योग संभव नहीं है । योगशब्दका धात्वर्थ जुडना है । कर्म करते करते स्वरूप लीन होना हो, अथवा चित्तवृत्ति निरोधसे स्वरूपमें लीन होना हो या भगवद्चिंतन करते करते स्वरूपमें लीन होना हो सब एक है । याज्ञवल्क्य ऋषिने “ जीवात्मपरमात्मसंयोग ही योग” कहा है । किंतु जहां दो तत्व नहीं है एक ही तत्व है वहां कौन किससे जुडेगा ? यह प्रश्न उठता है । इस प्रश्नका उत्तर देते समय अद्वैतानुभवी कहते हैं “योगका अर्थ चित्तकी निरुद्धावस्थामें स्फुरणरूप बिंबका अनुभव करना योग है !” किसी किसीने योगको मनोलय कहा है । योगमें प्राप्त समाधिका वर्णन करते समय अद्वैतावस्थाका सुंदर विवेचन किया हुवा मिलता है । पातंजल योगसूत्रोंमें कहे गये समाधिप्रकारोंके अलावा भी अन्य योग-ग्रंथोंमें अन्य अनेक समाधि प्रकार कहे गये हैं । अन्यान्य योग प्रकारोंके विवेचन इसी ग्रंथमें पाठक देख सकेंगे । रस—रस दो प्रकारके हैं । एक षड्रस दूसरा नवरस । षड्रस विषय पंचकका एक विषय है । वह रसनेंद्रिय-ग्राह्य है । रसनेंद्रिय ग्राह्य षड्रस हैं मधुर=मीठा, आम्ल=खट्टा, लवण= नमकीन, कटु=तीखा, कषाय=कसैला, तिक्त=कडुवा । ये षड्रस रसनेन्द्रियके विषय हैं। ऐसे ही साहित्यमें नवरस कहे गये हैं । ये अंतःकरणकी वृत्तियोंके कारण अंतःकरणसे अनुभव किये जाते हैं । रसका अर्थ अंतःकरणकी टीस । अंतर्मनका खिंचाव अथवा चाह भी कह सकते हैं जो उसके अनुकूल परिस्थितिमें जैसे साहित्यवाचन, दृश्यदर्शन, कथा श्रवणादिसे-उद्दीपन होते हैं । ये रस नौ हैं । शृंगार, वीर, करुणा, अद्भुत, हास्य, भयानक, बीभत्स, रोद्र और शांत । इन रसोंके स्थायीभाव भी और होते हैं । राग-द्वेष—योगशास्त्रमें इन दो शब्दोंकी परिभाषा करते समय कहा गया है “सुख दायक बातोंका चिंतन, उस विषयक लोभ तथा आसक्ति राग है तो दुःख दायक बातोंके चिंतनसेद्वेष ” उत्पन्न होता है । राजयोग—अष्टांगयोग इस शब्दके विवेचनमें इसका बाह्यविवेचन आया ही है । यहां कुछ अंतरंगका दर्शन करना है । शरीरमें स्थित अणुमय पिच्छक्ति पर अपना स्वामित्व रख कर अनंत पिच्छक्तिसे समरसैक्य अनुभव करना इस योगका उद्देश है । जिस ब्रह्मको आदि मध्य अंतमें कहीं द्वैतका स्पर्श भी नहीं होता वही विजन है । विजनका अर्थ “एकांत स्थान ।” जो साधनाका धरातल है । इस धरातल पर सभी भूतमात्रोंका जो जो अधिष्ठान है तथा सभी सिद्ध पुरुष जहां लीन होते हैं वह “सिद्धासन” डालकर योगारंभ होता है । सारे विश्वके मूलमें जो ज्ञानेश्वरी १८६

· ब्रह्म है, उसमें चित्तको लीन करना "मूल बंध" है। सर्व बाह्य ब्रह्ममें सतत क्षोभ करना "शरीरकी अचलावस्था" है। ज्ञान दृष्टिसे सब ही ब्रह्ममय देखना "दृष्टि स्थिरता" नासिकाग्र दृष्टि है। सभी वृत्तियों पर स्वामित्व रखना "प्राणायाम" है। संसारका निषेध "रेचक" है और "निरंतर अहं ब्रह्मास्मि भाव कुंभक" अन्य विषयोंको त्याज्य मानकर "चैतन्यमें लीन रहना प्रत्याहार" है। जहाँ जहाँ मन दौड़ता है वहां वहां सब ब्रह्मदर्शन करना "धारणा" तो मैं ब्रह्म है इस वृत्तिका भी लोप "ध्यान" है। तथा सारी वृत्तियोंको लय करके ब्रह्म बनकर "मैं ब्रह्म हूँ" इसको भी भूलकर "केवल ब्रह्म ही रहना समाधि" है। आद्य शंकराचार्यने अपनी अपरोक्षा- नुभूतिमें राजयोगका यह अंतरंग दर्शन कराया है।

वर्णव्यवस्था — वर्णव्यवस्था भारतकी प्राचीनतम समाज-व्यवस्था अथवा समाज संघटन- पद्धति है। बृहदारण्यक उपनिषदमें "भूमि पर जो वर्ण-व्यवस्था है वह स्वर्गीय वर्णव्यवस्थाका प्रति- बिंब" कहा गया है तो ग्रीक तत्ववेत्ता प्लेटो कहता है "इस विश्वकी जो जो वस्तु है, व्यवस्था है, वह अत्यंत सूक्ष्मतम उच्च सृष्टिकी प्रतिकृति है !" गीतामें "स्वाभाविक गुण-कर्मके कारण मैंने वर्णव्यवस्था की है" ऐसा कहा है तो इससे प्राचीन पुरुषसूक्त वर्णव्यवस्थाका रहस्य कहता है। बृहदारण्यकमें यह भी स्पष्ट कहा है राजसूयज्ञ-यज्ञमें "ब्राह्मणोंको क्षत्रियोंसे नीचे बैठना चाहिए !" केवल भारतीय तत्त्वज्ञोंने ही समाज-व्यवस्थाके रूपमें वर्ण व्यवस्था मान्य की है ऐसे नहीं हैं किंतु यूनानके प्राचीन तत्त्वज्ञोंने भी इसका स्वीकार किया है। पाथेयगोरास यूनानका एक श्रेष्ठ और उच्चकोटीका तत्वज्ञ है। विद्वानोंने इसका काल ई. पूर्व ५८६-५०६ माना है। इसके संप्रदायका काल यूनानमें धर्मके पुनरुत्थानका काल। इनकी असामान्य बुद्धिमत्ताके कारण जनतापर भी इसका असामान्य प्रभुत्व था। पाथेयगोरास पंथके "डेलिअन" भारतके ब्राह्मणकी भांति त्यागप्रधान फकीर दीखते हैं। इनके विचारसे जीवन तीन प्रकारका होता है। पहला शास्त्रीय पंडितोंका-थिओरा विकल- लायक दूसरा व्यवहार-निपुणोंका-प्रैक्टिकल लायक-तीसरा विलासियोंका-अपॉलस्टिक लायक। इनका डेलिअन लोग इससे भिन्न हैं। यहाँ गीताके "चार वर्ण सृजे मैंने गुण-कर्म विभागसे" का उद्धरण • दे सकते हैं। इसके अलावा दूसरा प्रसिद्ध ग्रीकतत्त्वज्ञ प्लेटो भी-ई. पू. ४२७. ३ ७-अपने रिपब्लिकनमें समाजके सद्गुणोंके विषयमें लिखते समय समाजके लोगोंके तीन वर्ण विभाग करता है। १ शासकवर्ग, ज्ञान, चातुर्य, यह इस वर्गविशेषका गुण, ज्ञानके कारण ये राज्य शासन भली भांति चला सकते हैं। तर्कशुद्ध विचारके कारण समाजपर इनकी सत्ता चलती है। दूसरा शूर षडाउ लोगोंका। धैर्य और उत्साह इस वर्गविशेषका गुण है। तीसरा वर्ग अन्यनागरिकोंका। इनका गुण संयम और अनुशासन। इसके अलावा भी अथेन्स नगरमें और एक वर्ग था जो गुलामोंका था। यहां फिर एक बार गीताके "चार वर्ण सृजे मैंने गुण कर्म विभागसे !" का उल्लेख करना आवश्यक लगता है। साथ साथ अठारहवे अध्यायमें जो इन वर्गोंके कार्योंका विवेचन किया है वह भी उपरोक्त गुणोंसे मिलते जुलते किंतु उससे भी अधिक विवेचक है। न गीता या उपनिषदों की वर्णव्यवस्थाओं या पाथेयगोरास पंथमें या प्लेटोके रिपब्लिकमें, कहीं भी जन्मतः वर्ण अथवा जाति प्रथाकी गंध भी नहीं है जो बादकी विकृति है। यदि पूर्व-ग्रहसे दूषित न हो कर स्वतंत्र रूपसे विचार किया जाय तो वर्ण-व्यवस्था उच्चमत्तम समाज व्यवस्था है जो किसी भी राष्ट्रका राष्ट्र-धर्म बन सके !

(18a) ३८७ परिशिष्ट ५

वाणी—वाणी चार प्रकारकी है । वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा । इस वाणीके अलग अलग स्थान हैं। पश्यंतीका स्थान है जिव्हा । यह वाणी बोलनेवालेके अलावा दूसरे भी सुन सकते हैं । दूसरा स्थान है कंठ । यहांकी वाणी केवल बोलनेवाला ही सुन सकता है । यह सभी जानते हैं कि मनुष्य अकेला रह कर भी मन ही मन अपनेसे आप बोलता रहता है । यही वाणी मध्यमा कहलाती है । पश्यंतीका स्थान हृदय है । यहां अमूर्त विषय चुपचाप शब्दोंमें गुंथ जाते हैं । विचार यहां रूप लेते हैं । अथवा विचार आकार लेते हैं । वाणीकी यह निराकारत्वसे आकार पानेकी स्थिति है । मनुष्यके भाव, विचार, विकार आदि यहां रूप लेते हैं तभी मनुष्य स्वयं उसको जान पाता है । यह स्थिति पश्यंती वाणी कहलाती है । उसके पहले परावाणी है । संस्काररूपसे जो निराकार भाव पडे रहते हैं और इसका स्थान नाभी है ।

विकल्प—कभी कभी यह शब्द संकल्पके साथ आता है । संकल्पका अर्थ कुछ करनेका निश्चय और विकल्प निश्चय करते समय होनेवाला तर्क वितर्क । संदेह । करनेसे वह काम होगा या न होगाका संदेह और तज्जन्य तर्क विकल्प है । परिणामस्वरूप भ्रम होता है । किंतु अलग अलग दर्शनकारोंने इसके अलग अलग अर्थ किये हैं। योगदर्शनमें विकल्पका अर्थ करते समय “शब्द- मात्रसे जिसका बोध होता है किंतु वह वस्तु कहीं नहीं रहती” जैसे “खरगोशके सींग या बंध्या- पुत्र !” पूर्व.मीमांसा-जैमिनीदर्शनमें, विकल्पका विचार करते समय “दोषमुक्त होने पर अगतिक स्थितिमें जिसका स्वीकार किया जाता है वह !” ऐसे किया गया है । अर्थात् एकके स्थान पर वह नहीं मिलनेसे दूसरेका स्वीकार करना विकल्प है ।

विज्ञान—गीतामें ज्ञान विज्ञान शब्द आया है । गीतामें “विज्ञान सहज्ञान” ऐसा शब्द प्रयोग आया है। ज्ञानका अर्थ केवल बुद्धि नहीं। आत्मानुभवमें बुद्धि पंगु है। आत्मा सर्व ज्ञाता है। इसलिए वह “अज्ञेय” माना गया । सर्व-ज्ञाताको भला कौन जानेगा ? किंतु वह स्वयं अपनेको जानता है न ? ज्ञानेश्वर महाराज उसको “स्व संवेद्य” कहते हैं ! आत्मानुभूति अथवा आत्म- दर्शनसे-मैं ही आत्मा हूँ इसका बोध होनेसे, अपने आपको जाननेसे-उस सर्वज्ञाताका ज्ञान होता है । आत्म प्रकाशमें आत्मदर्शन करना ज्ञान है और आत्मप्रकाशमें विश्वदर्शन करना विज्ञान । इसीको (!) उन्मनी स्थिति कही गयी है। वस्तुतः आत्मा अज्ञेय होकर भी वह अपनी अद्वितीय शक्तिद्वारा अपने आपको जानता है ! अपने आपको जानकर-उस ज्ञान दृष्टिसे-विश्वको जानना “विज्ञान सह ज्ञान” है। प्रांपंचिक ज्ञानके साथ आत्मज्ञान, विश्वके ज्ञानके साथ विश्वात्माका ज्ञान, अथवा ब्रह्मांडके साथ ब्रह्मका ज्ञान विज्ञान सह ज्ञान है। अर्थात् विज्ञानका अर्थ प्रांपंचिक ज्ञान और ज्ञानका चिरंतन आत्मज्ञान है।

विधि-निषेध—सभी धर्मोंमें “यह करना चाहिए” तथा “यह नहीं करना चाहिए” ऐसे कुछ नियम हैं। इसका उद्देश्य “चित्तशुद्धि” है। अर्थात् चित्तशुद्धिकी दृष्टिसे जो करना आवश्यक है वह विधि है तथा चित्तशुद्धिकी दृष्टिसे जो नहीं करना चाहिए वह निषेध है। विधि “क्या कैसा करना चाहिए” यह सिखाती है तो निषेध “क्या क्यों नहीं करना चाहिए” यह सिखाता है। क्या करना क्या न करना, तथा कैसे करना और क्यों करना यह जाननेसे मनुष्य विवेकी बनता है तथा “कार्य अकार्यका व्यवस्थित बोध” होता है। इससे चित्तशुद्धि हो कर वह

ज्ञानेश्वरी १८४

एकाग्र होने लगता है जो किसी भी योगकी पूर्व-पीठिका अथवा साधनाका धरातल है। इसलिए प्रत्येक धर्ममें इस प्रकार विधि निषेध कहे गये हैं। इसीको "धर्मानुशासन" कह सकते हैं। विरक्ति-वैराग्य—योगशास्त्रमें चित्तवृत्ति विरोधके साधन कहते समय "अभ्यास वैराग्यसे उसका निरोध होता है" कह कर "वृत्तियोंका निरोध वैसे ही चित्त शांत रखनेका प्रयास करना ही अभ्यास" कहते हुए "दीर्घकाल तक यह अभ्यास करनेसे वही स्वभाव बनता है!" कह कर "सामने दीखनेवाले ऐहिक तथा शास्त्रोंमें कहे गये पारलौकिक भोगोंके विषयमें मनमें कोई भावना न जगना ही वैराग्य है" ऐसी वैराग्य शब्दकी परिभाषा की है। साथ साथ इस वैराग्यसे भी "पुरुषका-ब्रह्मका-ज्ञान होनेसे गुणात्मक भोगोंकी ओर उदासीन रहना ही श्रेष्ठ प्रकारका वैराग्य है!" ऐसा कहा है। वैराग्यको मोक्षका साधन माना गया है। मोक्षके अन्य साधन भी वैराग्यसे प्राप्त होते हैं ऐसा शास्त्रोंका कहना है। संन्यास-धर्मकी दीक्षाका विचार करते समय "परम वैराग्य ही संन्यासकी परम स्थिति है!" ऐसे कहा गया है। किंतु वैराग्यकी स्थिति जाननेके लिये शास्त्रोंमें वैराग्यके प्रकार भी बताये हैं। मुख्यतया वैराग्यके अपर वैराग्य और पर वैराग्य ऐसे दो प्रकार हैं। उसमेंसे अपर वैराग्यके यतमान, व्यतिरेक, एकेंद्रिय, वशीकर ऐसे उपभेद भी हैं। इस वशीकर वैराग्यके मंद, तीव्र, तीव्रतर ऐसे तीन प्रकार हैं। मनु स्मृतिमें कहा गया है :— वैराग्य मनमें आता विश्वके सब वस्तुसे । तभी संन्यासकी सिद्धि न तो पतन निश्चित ॥ इसलिये विश्वके सभी वस्तुओंसे उनके भोगोंसे मन उदासीन होना चाहिए यही वैराग्य है। सब प्रकारके वैराग्यमें जो उत्कृष्ट तथा उत्कट प्रकारका वैराग्य है उसको परा-वैराग्य कहा है। ऐसे परा वैराग्ययुक्त मनुष्यको "परमहंस" दीक्षाका अधिकारी माना गया है। "परमहंस सदैव आत्मलोक या ब्रह्मलोकमें रहता है" ऐसा शास्त्र कहते हैं अर्थात् वह सदैव सर्वत्र ब्रह्म-चिंतनरत रहता है। उनके चिंतनमें ब्रह्मके अलावा और कुछ नहीं आ सकता। यही वैराग्यका अंतिम उद्देश्य है! विषय—पांच ज्ञानेंद्रियोंसे मनको जो अनुभव आता है उसको विषय कहा गया है। पांच ज्ञानेंद्रियोंके पांच विषय हैं। कानोंके शब्द, आंखोंके रूप, जिव्हाके रस, त्वचाके स्पर्श तथा नाकके गंध। वस्तुके ज्ञानके लिये इन इंद्रियोंकी आवश्यकता है। इसलिये इन्हें ज्ञानेंद्रिय कहते हैं। किसी वस्तुका ज्ञान करा देना मात्र इनका काम है। किंतु इंद्रियां इतना ही न करके "अपेक्षा करती हैं!" कान शब्दके लिये, आंख रूपके लिये, जिव्हा रसके लिये, त्वचा स्पर्शके लिये, नाक गंधके लिये "तरसने" लगते हैं। इस "तरसनेकी क्रियाको वासना मानकर "विषयवासना" अनुचित" कहा गया है। इंद्रियोंको कुछ प्रिय तथा कुछ अप्रिय लगता है। किंतु "प्रियाप्रियसे तटस्थ" रहकर विषयका ज्ञान मनको सौंपना इंद्रियोंका कार्य है। यह विरक्तिसे संभव है। इंद्रियोंका अपने अपने विषयोंके लिये तरसना, उनमें लिप्त हो कर प्रियाप्रियको अनुभवना आदिसे विषयोंका सही ज्ञान न होकर आत्मविस्मृति होती है। इंद्रिय-सुख ही महत्त्व-सा हो जाता है और उससे ऊंचे प्रकारके सुखका बोध नहीं होता। इसलिये इंद्रियनिग्रह कहा गया है। यह विषयोंका निषेध नहीं, किंतु विषयोंका सही ज्ञान होनेका साधन है। शब्द-ब्रह्म—शब्द आकाशमें रहता है और कानोंसे ग्रहण होता है। वह ध्वनिरूप और वर्णरूप रहता है। मिटे हुए ओंठ खुलते ही ध्वनिरूप शब्द "प्" बन कर वर्णरूप हो जाता १८९ परिशिष्ट ५

है । ध्वनि निकलते ही दश दिशाओंमें उसके दलों शब्द बन जाते हैं, नाकासमेंसे निकला हुआ ध्वनि आकाशमें विलीन होनेतक उसके कई शब्द बन जाते हैं । आकाशमें निकला हुआ ध्वनि तरंगोंके परस्पर संघातसे स्थूल अर्थ प्रेरक तथा सूक्ष्म भावोत्पादक शब्द बनते हैं । भाषा शास्त्र कहता है "सभी भाषाएं ऊपरी हैं । स्थूल हैं। किंतु जिसका वाच्य वाचक भाव स्वयंभू है ऐसी एक सहज भाषा है जिससे पशुपक्षियोंका हद्गत भी जान सकते हैं !" शब्दोंकी इस सूक्ष्म शक्तिके कारण उन्हे स्वतः प्रमाण माना है । आकाश तत्वसे पृथ्वी तक सूक्ष्म रूपसे शब्द समाया हुवा है ! वह सूक्ष्म शब्द-नाद-उत्तरोत्तर स्थूल होते होते भाषाका रूप धारण करता है । यदि मनुष्य अपने श्रवणेद्रियोंको सूक्ष्म बना लेता है तो विश्वाकाशके इन सूक्ष्म तरंगोंको भी सुन सकता है । ऋग्वेदमें इसको कहा गया है । "पहले इस ओरकी-नामरूपसे संबंध जुडी हुई-भाषा सिखाई जाती है । किंतु इसके-इस भाषाके-उस ओरकी भाषा अत्यंत गूढ और श्रेष्ठ होती है वह दिव्य वाणी, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पतिको निरावृत्त हो कर अंगांग दिखाती है वैसे विश्वका रहस्य खोलकर दिखाती है !" भाषा इन्ही सूक्ष्म शब्द तरंगोंका स्थूल रूप है, मानो निराकार शब्दब्रह्मका साकार उपास्य देवता है । इसीलिये प्राचीन ऋषियोंने कहा है "मनुष्यको बोलते समय विचार पूर्वक बोलना चाहिये । उसके शब्दतरंग आकाशमें सदैव रहते हैं जो हजारो सालके बाद भी कोई सुन ले !!" "शब्द एक महान शक्ति है। ब्रह्म शक्ति है। विचार पूर्वक उसका उपयोग करना चाहिए !" आकाश स्थित नाद लहरियोंके कारण ध्वनि लहरियोंका उलझकर एक रूप लेकर बनी हुई प्रतिमा ही शब्द है ! किसी भी मनुष्यके शब्द मानो उस मनुष्य द्वारा बनाई गयी प्रतिमा है ! मनुष्यको विवेकपूर्वक ऐसी प्रतिमा बनानी चाहिए । हो सकता है "शब्दमें सुप्त शक्तिके कारण उस प्रतिमाका अंतर्देह जागृत हो, जिसका सामर्थ्य वह रूप देनेवाले व्यक्तिसे अनंत गुणा अधिक है।" इससे वह शब्दप्रतिमा बनानेवालेको ही निगल जाय ! शिव-शक्ति—ज्ञानेश्वर नाथपंथी हैं । शिव-शक्ति सामरस्य नाथपंथकी अंतिम स्थिति है । शिवशक्ति दो तत्व नहीं हैं किंतु एक ही तत्वके दो पहलू हैं। जैसे दक्षिण और उत्तर ध्रुव एक ही पृथ्वीके दो छोर हैं । शिव-शक्ति विवेचनमें ज्ञानेश्वर महाराजने स्वर्ण और उसके गहने, कर्पूर और उसकी सुगंध, गुड और उसकी मिठास आदि उपमाओंसे इन दोनोंका संबंध बताये हैं । शिवशक्ति सामरस्यको ज्ञानेश्वर महाराज महायोग मानते हैं । सहज समाधि-द्वारा मनोन्लय करके इस सामरस्यका अनुभव लेना ही मुक्तावस्था है । शिवमें शक्ति और शक्तिमें शिव निहित है । इसका समरसैक्यानुभव ही अमृनानुभव है जो जीवनका एक मात्र उद्देश्य है । षट्चक्र—योग-शास्त्रके अनुसार मनुष्यकी रीडमें सुषुम्ना नाडीकी राहमें मूलाधार चक्रसे आज्ञा-चक्र तक ज्ञानतंतुके छ चक्र अथवा कमल हैं जिनकी पंखुडियां हैं । योग-शास्त्रमें इन चक्रोंका अत्यंत महत्व है । ये चक्र अथवा कमल कुंडलिनीके स्पर्शसे खिलते हैं । नहीं तो बिना खिले ही रहते हैं । इन छ चक्रोंमेंसे पहला चक्र मूलाधार कहलाता है, इसको आधारचक्र भी कहा गया है । शिश्न और गुदाकी सीवनमें पिछली ओर रीडके निचले छोर पर इस चक्रका स्थान है । इसका रंग लाल और पंखुडियां चार हैं । वैसे ही प्रत्येक चक्रका देवता होता है । उसके बीज भी ज्ञानेश्वरी १९०

होते हैं। मंत्र भी होते हैं। कुंडलिनी इसी चक्रमें सुप्तावस्थामें रहती है। इस चक्रकी देवता गणपति है और यं, शं, सं, षे बीज हैं। दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान कहलाता है। इसको लिंग चक्र भी कहा गया है। यह लिंगके पीछे रीढमें सुषुम्ना नाडीके रास्ते पर है। इसका रंग पीला है। इसकी छ पंखुडियां हैं। ब्रह्मा इसका देवता और बं, भं, मं, यं, रं, लं, इसके बीज हैं। तीसरा चक्र मणिपुर कहलाता है। इसको नाभिचक्र भी कहते हैं। यह नाभि स्थान पर किंतु पीठकी रीढमें सुषुम्नाके रास्ते पर आता है। इसका रंग नीला है। इसकी दस पंखुडियां हैं और इस चक्रका देवता विष्णु है। इसके बीज डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं ये हैं। हृदयके स्थान पर पीछे सुषुम्नाके मार्ग पर अनाहत चक्र है । इसका रंग शुभ्र है। इसकी बारह पंखुडियां हैं। तथा शंकर इसका देवता है। इस चक्रके बीज हैं कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं। इसीमें से अतींद्रिय अनाहत ध्वनि निकलती है। पांचवा चक्र कंठमणिके स्थान पर पीछे रीढमें है जो विशुद्धचक्र कहलाता है। यह धूम्रवर्ण, सोलह पंखुडियोंका है। जीवात्मा इसका देवता है और अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं, ऋं, ॠं, लृं, लूँ, एं, ऐं, ओं, औं, अं, अः इसके बीज हैं। छठा चक्र आज्ञाचक्र कहलाता है। इसको अभ्रिचक्र भी कहा गया है। यह दो भौंके मध्य रीढमें पीछे सुषुम्नाकी राहमें है। इसकी दो पंखुडियां हैं। हं, क्षं इसके बीज हैं। गुरु इसकी देवता है। यहींसे गुरु आज्ञा साधक पर प्रभाव डालती है। अथवा उपनिषदके अनुसार शिष्यकोशिष्यत्वको- निःशेष कर उसको अपने जैसे बना लेती है। कुंडलिनी इन सभी चक्रोंका भेदन करके मूलाधारसे ब्रह्मरंध्र तक जाती है। योग साधनामें “बीज” का अत्यंत महत्त्व है। अलग अलग प्रकारके बीज जपके समय अलग अलग प्रकारके स्पंदनजन्य तरंग उठते हैं जो शरीरके भिन्न भिन्न स्थानको प्रभावित करते हैं। वैसे ही भिन्न भिन्न प्रकारके तरंगप्रवाह भिन्न भिन्न नाडियोंको प्रभावित करते हैं या भिन्न भिन्न नाडियोंको शुद्ध करते हैं। इससे अनायास और अज्ञात रूपसे मानसिक विकास और चित्तशुद्धिमें सहायता मिल सकती है। इनके अलावा भी अन्य अनेक बीज हैं और उन बीजोंमें विचार शक्ति निहित। बीज- मंत्र जपके साथ उस प्रकारकी मंत्र शक्ति अथवा विचार शक्तिका विकास होता है। उपरोक्त बीजोंका उन उन चक्रोंकी देवताओंका अधिष्ठान और उत्थापनमें उपयोग होता है। योगमार्गमें ध्यान तो इन्हीं चक्रस्थित देवता पर “चित्त केंद्रित” कर करना होता है। षड्गुणैश्वर्य—यश, श्री, ज्ञान, औदार्य, वैराग्य, और ऐश्वर्य ये छ ईश्वरी गुण माने गये हैं। भगवान कहलानेके लिये इन छ गुणोंकी आवश्यकता है। साथ ही साथ हरिवंशमें कर्तृत्व, नियंत्रण शक्ति, भोक्तृत्व, विभुत्व, साक्षित्व, सर्वज्ञत्व, तथा तृप्ति, अनादिज्ञान, स्वातंत्र्य, शक्ति, प्रकाशन, अनंतशक्ति, और सर्वज्ञातृत्व, ये छ गुण-श्रीकृष्णमें थे ऐसे कहा गया है। षड्दर्शन—भारतमें अनेक दर्शन हैं किंतु षड्दर्शन यह शब्द प्रसिद्ध है। इसमें “वैदिक और अवैदिक दर्शन” ऐसे भेद भी किये जाते हैं। ज्ञानेश्वरीमें जिन छ दर्शनोंका उल्लेख है वे हैं न्याय, वैशेषिक, वेदांत, बौद्ध, सांख्य, और मीमांसा। किंतु वैदिक दर्शनमें बौद्धदर्शनका उल्लेख नहीं होकर योगदर्शनका उल्लेख होता है। ज्ञानेश्वरीमें बौद्ध मत संकेत। वार्तिकोंका ॥ ज्ञा. १-१२५ ऐसे उल्लेख होनेसे बौद्धदर्शन गिना है। इसके अलावा चार्वाक, जैन, सौर, शाक्त, गाणपत्य, शैव, वैष्णव, स्कांद दर्शन भी हैं। सुश्रुतमें कहा गया है कि— १९३ परिशिष्ट ५

कपिल सांख्यका कर्ता गौतम न्याय सूत्रका । योगका पातंजली है योगीश्वर महामुनि । मीमांसा जैमिनीका है वैशेषिक कणादका । व्यास वेदांत कर्ता है स्वयं जो मधुसूदन ॥ (१) न्याय दर्शनके ५ अध्याय हैं। उनमें १० आह्निक और ८४ प्रकरण हैं। इन ८४ प्रकरणोंमें ५२८ सूत्र हैं। न्यायसूत्रोंके रचयिता गौतम हैं। उसे अक्षपाद कहा है। उनका काल विद्वानोंने ई. पू. ६०० वर्ष माना है। इस पर अनेक विद्वानोंने भाष्य लिखे हैं। न्याय दर्शन तर्कशास्त्र है। ये ईश्वरको मानते हैं। यह वैदिक दर्शन है। मोक्ष इनका अंतिम साध्य है। (२) कणाद वैशेषिक दर्शनका आद्य आचार्य है। इस दर्शनके दस अध्याय हैं। कणाद अणुवादी हैं। इसने अत्यंत योग्यतापूर्वक परमाणुका विवेचन विश्लेषण किया है। वे अणुओंके “पाकज क्रिया”-Chemical Action” के कारण विश्वोत्पत्ति हुई ऐसा मानते हैं। किंतु आगे वैशेषिकोंने ईश्वर माना है। (३) वेदांतका अर्थ ब्रह्मसूत्र है जो उपनिषदोंका निचोड़ है। ब्रह्मसूत्रोंका वर्णन अन्यत्र किया है। ब्रह्मसूत्रोंमें ४ अध्याय हैं। १६ पाद हैं। कुल मिला कर १५ अधिकरण हैं और ५४५ सूत्र हैं। ब्रह्म इसका अंतिम तत्त्व है। और मोक्ष अंतिम स्थिति। (४) कपिलको सांख्यमतका मूल आचार्य माना जाता है। महाभारत और गीतामें सांख्य दर्शनका उल्लेख है। इस परसे यह दर्शन भी अत्यंत प्राचीन होनेका बोध होता है। इस दर्शनके छ अध्याय और ५२७ सूत्र हैं। सांख्योंने २५ तत्त्व माने हैं जो अन्यत्र दिये गये हैं। पुरुष इनका अंतिम तत्त्व है और कैवल्य अथवा मुक्ति अंतिम ध्येय है। सांख्यमें ईश्वरवादी सांख्य और निरीश्वरवादी सांख्य ऐसे दो भेद हैं। ईश्वरवादी सांख्योंमें ईश्वर २६ वा अंतिम तत्त्व है। (५) बौद्धदर्शन-बुद्ध इसका आदि पुरुष है। ई. पू. ५०० वर्ष इसका काल है। यह निरीश्वरवादी दर्शन है। बौद्धदर्शन आचारशास्त्र है। बुद्धके बादवाले उनके अनुयायियोंने उसको शून्यवाद और विज्ञानवादका गूढ़-आध्यात्मिक-रूप देकर उसका दर्शन बनाया है। वैदिक पूर्व मीमांसाकी भांति मूल बौद्ध दर्शन कर्मकांड है। बुद्धके विश्वास- १ सारा संसार दुःखमय है। २ दुःखोंका कारण है। दुःखानुभवसे उसके नाशका उपाय ढूंढ सकते हैं। ३ दुःखका नाश हो सकता है। ४ दुःख नाशके भी उपाय हैं। दुःखके कारणोंको गिनाते समय बुद्धने निम्न कारणपरंपरा दी है। (१) अविद्यासे संस्कार (७) वेदनासे तृष्णा (२) संस्कारसे विज्ञान, (८) तृष्णासे उपादान=राग (३) विज्ञानसे नाम रूप (९) उपादानसे भव=सांसारिक प्रवृत्तियां (४) नाम रूपसे षडायतन- (१०) भवसे जाति (मन सहित पांच ज्ञानेंद्रियाँ) (५) षडायतनसे स्पर्श (११) जातिसे जरा (६) स्पर्शसे वेदना (१२) जरासे मृत्यु इस दुःख मुक्तिके लिये इस दर्शनमें अष्टांगमार्ग कहा है। वह है- (१) सम्यक् दृष्टि = आर्य सत्योंका ज्ञान ज्ञानेश्वरी १९२

An exact transcription of the Hindi/Devanagari text with line numbers:

(२) सम्यक् संकल्प = रागद्वेष हिंसादि सांसारिक विषयोंका त्याग-संग (३) सम्यक् वाचा = सत्यवचनकी रक्षा, झूठ, दुर्वचन, निंदादि अनुचित वचन त्याग । (४) सम्यक् कर्म = हिंसा, परद्रव्यापहरणादि दुष्कर्मोंका त्याग, सत्कर्मोंका आचरण । (५) सम्यक् आजीव = न्यायपूर्ण जीविका कमाना । अन्याय जीविकाका त्याग । (६) सम्यक् व्यायाम = बुरे कर्मोंका त्याग सत्कर्ममें उद्यत रहना । (७) सम्यक् स्मृति=चित्तशुद्धि जीविकाका त्याग । (८) सम्यक् समाधि=चित्तैकाग्रता । इस बौद्ध मतमें हीनयान और महायान ऐसे दो बडे संप्रदाय हैं । बुद्धत्व प्राप्तिसे निर्वाण (जन्म मरणसे मुक्ति) इसका उद्देश्य है । इस दर्शनका विपुल साहित्य है पालीमें और संस्कृतमें । इसमें बडे बडे दार्शनिक हो गये हैं । कुछ बुद्धसे पूर्ववर्ती हैं तो कुछ बुद्धके बादके । (६) मीमांसा, इसको पूर्वमीमांसा कहते हुए वेदांतसूत्रोंको उत्तरमीमांसा कहनेकी परिपाटी भी है । इसका आचार्य जैमिनी है । इसलिये इसको जैमिनि दर्शन भी कहा जाता है । यह जैमिनीदर्शनभी बौद्धदर्शनकी भांति ही आचार संहिता है । पूर्व मीमांसा धर्म-दर्शन है । मीमांसामें बारह अध्याय और २५०० सूत्र हैं । मीमांसाके विषय भी बारह हैं । ये हैं (१) धर्मजिज्ञासा (२) कर्मभेद (३) शेषत्व (४) प्रायोज्य-प्रयोजकभाव (५) कर्म- क्रम (६) अधिकार (७) सामान्य (८) अतिदेश (९) ऊह (१०) बाध (११) तंत्र (१२) अवाप । वेद ही इसका स्वतःप्रमाण है । इसके अन्य प्रमाणोंकी सूची बडी लंबी है । इसमें ब्राह्मण ग्रंथोंके विधिविधानों तथा निषेधोंको दार्शनिक रूप देनेका प्रयास है । मीमांसाको ईश्वर या परमात्माका कोई प्रयोजन नहीं है । इसने ईश्वर या परमात्माका खंडन नहीं किया इसलिए यह नास्तिक या निरीश्वरदर्शन नहीं कहलाता । यह संसारको जैसे है वैसे सत्य मानता है । यह मुक्तिको स्वीकार करता है । इसके भाष्यकारोंके कई मत हैं जैसे ब्रह्मसूत्रके भाष्यकारोंके. अनेक भिन्न भिन्न मत हैं । ज्ञानेश्वरीमें उल्लिखित षड्दर्शनके विचार करनेके बाद अब सुश्रुतमें कहे षड्दर्शनमें बचे योगदर्शनका विचार करें । पातंजल मुनि इसका मूल आचार्य है । इसके भी (१) समाधिपाद (५१) सूत्र, (२) साधनापाद ५५ सूत्र, (३) विभूतिपाद ५४ सूत्र (४) कैवल्यपाद ३४ सूत्र हैं । इनका रचनाकौशल्य अप्रतिम है । मानो एकमेंसे दूसरा सूत्र अपने आप निकलता है । इसका विवेचन करते समय— समाधिपाद योग उद्देश्य निर्देश उसके वृत्ति लक्षण । योग उपाय प्रभेद भेद समाधिके कहे । साधना पाद योगका ज्ञान विज्ञान रोक और निवारण । क्रम सह चित्त-मुक्ति उसके बाह्य साधन ॥ विभूतिपाद अंतस्साधनके साथ दिखाया है प्रभाव भी । तथा संयमसे ज्ञान मिलता है विवेक भी ॥ १९३ परिशिष्ट ५

कैवल्यपाद कैवल्य पादमें तीनों पादोंका सार भी कहा । कहा समाधिका पूर्ण रहस्य ध्येयके सह ॥ इन चार श्लोकोंमें योग-दर्शनका सार कह सकते हैं । संन्यासी—भारतीय आश्रम-धर्मानुसार चतुर्थाश्रम । यह आश्रम कब ग्रहण करना चाहिए ? इसकी चर्चा करते समय शास्त्रकारोंने गृहस्थाश्रममें संतानोंत्पादनद्वारा पितॄऋणसे, अध्ययन अध्यापनद्वारा ऋषिऋणसे, यथाशक्ति यज्ञयागादि करके देवऋणसे मुक्त होनेके बाद, मोक्ष प्राप्तिके लिये संन्यास लेनेकी आज्ञा दी है । अर्थात् पारिवारिक तथा सामाजिक कर्तव्य पूर्ण करनेके बादही मनुष्य संन्यास ले सकता है उसके पहले नहीं । अपने तीनों ऋणसे मुक्त होनेके बाद जब तीव्र वैराग्य प्राप्त होता है, स्वामी रामतीर्थके शब्दोंमें भूख लगी तो अन्न, प्यास लगी तो पानी, देनेवाली ईश्वरी शक्ति पर पूर्ण विश्वास होता है तथा इन दो वस्तुओंके अलावा और किसीकी आवश्यकताका अनुभव ही नहीं होता तब—संन्यास- ग्रहण करना चाहिए-उसके प्रथम कदापि नहीं । ऐसे दो प्रकारके संन्यास होते हैं । यदि स्वास्थ्य दुर्बल हो तो क्षेत्र संन्यास नहीं तो परिव्राजक । संन्यासमें “परमहंस” श्रेष्ठतम स्थिति है । ‘मैं” और ‘मेरा” इसको जो अंतःकरणमेंसे भूल गया है वही संन्यासी है । परमहंस जीवन्मुक्तावस्था है । वह जीवनकी सहजस्थिति है । वह ब्रह्मलीन हो कर ब्रह्मरूप बना हुवा सोऽहं भावमें लीन रहता है । उसके विषयमें सर्वत्र अपना ही रूप दीखता है इसलिये वह इंद्रातीत सहज स्थितिमें रहता है । सत्रहवींका स्तन्य—प्रश्नोपनिषद्में सोलह कला और उनके देवता बता कर इन कलाओं- द्वारा पुरुषमें पुरुषत्व आता है ऐसा कहा गया है । पुरुषकी ये सोलह कलायें और उनका देवता निम्न हैं—१, प्राण=वायु, २, श्रद्धा=भारती, ३, आकाश=गणेश, ४, वायु=प्रवाह ५ तेज अग्नि, ६ आप=वरुण, ७ पृथ्वी=शनैश्चर, ८, इंद्रियां=सूर्य, ९ मन=रुद्र, अथवा अनिरुद्ध १० अन्न=सोम, ११ वीर्य=वरुण, १२, तप=पावक १३, मंत्र=स्वाहा, १४ कर्म=पुष्कर, १५ लोक पर्जन्य, १६ नाम= उषा । पुरुषकी इन सोलह कलाओंके बाद सत्रहवी कला आत्म-तत्व है । सत्रहवींका स्तन्यः जो गुरुमाता देती है वह है आत्मतत्वबोध । अथवाव्योमचक्रकी आज्ञाचक्र (?) चंद्रामृतरूपी जीवनकला । सप्तधातु—शरीरके घटक, देहस्थित रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, रेत ये सात धातु । इसके उपधातु भी हैं । रसका कफ, रक्तका पित्त, मांसका नाक, कान आंखमेंसे स्त्रवनेवाला मल, मेदका पसीना, अस्थिके बाल और नख, मज्जाकी स्निग्धता चिकनाई तथा रेतका ओज ! सांख्य-योग—गीताका दूसरा अध्याय सांख्य-योग कहलाता है । इस अध्यायमें तीन महत्त्वके सिद्धांत कहे गये हैं । आत्माकी अमरताके साथ अखंड सर्वव्यापकता । देहकी नश्वरताके साथ क्षुद्रता । स्वधर्मकी अबाध्यता । स्वधर्मका अर्थ निसर्गसे प्राप्त स्वकर्तव्य है । आत्माकी अखंडता स्वधर्मकी सहजता सिखाती है । जैसे जन्मके साथ मांकी निर्मिति होती है वैसे जन्मके साथ ही स्वधर्म जुडा रहता है तथा शरीरकी नश्वरता स्वधर्माचरणमें आनेवाले कष्टोंको शांत सहन करनेकी प्रेरणा देती है । शरीरका सुख दुःख अथवा शरीर नाशकी कोई कीमत नहीं जैसे मनुष्य कपडे बदलता है वैसे आत्मा शरीर बदलता है । तेरे कपडोंकी जो कीमत वही तेरे शरीरकी है यह सिखाती है शरीरकी नश्वरता । ज्ञानेश्वरी १९४