भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1134, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1134

वाणी—वाणी चार प्रकारकी है । वैखरी, मध्यमा, पश्यंती, परा । इस वाणीके अलग अलग स्थान हैं। पश्यंतीका स्थान है जिव्हा । यह वाणी बोलनेवालेके अलावा दूसरे भी सुन सकते हैं । दूसरा स्थान है कंठ । यहांकी वाणी केवल बोलनेवाला ही सुन सकता है । यह सभी जानते हैं कि मनुष्य अकेला रह कर भी मन ही मन अपनेसे आप बोलता रहता है । यही वाणी मध्यमा कहलाती है । पश्यंतीका स्थान हृदय है । यहां अमूर्त विषय चुपचाप शब्दोंमें गुंथ जाते हैं । विचार यहां रूप लेते हैं । अथवा विचार आकार लेते हैं । वाणीकी यह निराकारत्वसे आकार पानेकी स्थिति है । मनुष्यके भाव, विचार, विकार आदि यहां रूप लेते हैं तभी मनुष्य स्वयं उसको जान पाता है । यह स्थिति पश्यंती वाणी कहलाती है । उसके पहले परावाणी है । संस्काररूपसे जो निराकार भाव पडे रहते हैं और इसका स्थान नाभी है ।

विकल्प—कभी कभी यह शब्द संकल्पके साथ आता है । संकल्पका अर्थ कुछ करनेका निश्चय और विकल्प निश्चय करते समय होनेवाला तर्क वितर्क । संदेह । करनेसे वह काम होगा या न होगाका संदेह और तज्जन्य तर्क विकल्प है । परिणामस्वरूप भ्रम होता है । किंतु अलग अलग दर्शनकारोंने इसके अलग अलग अर्थ किये हैं। योगदर्शनमें विकल्पका अर्थ करते समय “शब्द- मात्रसे जिसका बोध होता है किंतु वह वस्तु कहीं नहीं रहती” जैसे “खरगोशके सींग या बंध्या- पुत्र !” पूर्व.मीमांसा-जैमिनीदर्शनमें, विकल्पका विचार करते समय “दोषमुक्त होने पर अगतिक स्थितिमें जिसका स्वीकार किया जाता है वह !” ऐसे किया गया है । अर्थात् एकके स्थान पर वह नहीं मिलनेसे दूसरेका स्वीकार करना विकल्प है ।

विज्ञान—गीतामें ज्ञान विज्ञान शब्द आया है । गीतामें “विज्ञान सहज्ञान” ऐसा शब्द प्रयोग आया है। ज्ञानका अर्थ केवल बुद्धि नहीं। आत्मानुभवमें बुद्धि पंगु है। आत्मा सर्व ज्ञाता है। इसलिए वह “अज्ञेय” माना गया । सर्व-ज्ञाताको भला कौन जानेगा ? किंतु वह स्वयं अपनेको जानता है न ? ज्ञानेश्वर महाराज उसको “स्व संवेद्य” कहते हैं ! आत्मानुभूति अथवा आत्म- दर्शनसे-मैं ही आत्मा हूँ इसका बोध होनेसे, अपने आपको जाननेसे-उस सर्वज्ञाताका ज्ञान होता है । आत्म प्रकाशमें आत्मदर्शन करना ज्ञान है और आत्मप्रकाशमें विश्वदर्शन करना विज्ञान । इसीको (!) उन्मनी स्थिति कही गयी है। वस्तुतः आत्मा अज्ञेय होकर भी वह अपनी अद्वितीय शक्तिद्वारा अपने आपको जानता है ! अपने आपको जानकर-उस ज्ञान दृष्टिसे-विश्वको जानना “विज्ञान सह ज्ञान” है। प्रांपंचिक ज्ञानके साथ आत्मज्ञान, विश्वके ज्ञानके साथ विश्वात्माका ज्ञान, अथवा ब्रह्मांडके साथ ब्रह्मका ज्ञान विज्ञान सह ज्ञान है। अर्थात् विज्ञानका अर्थ प्रांपंचिक ज्ञान और ज्ञानका चिरंतन आत्मज्ञान है।

विधि-निषेध—सभी धर्मोंमें “यह करना चाहिए” तथा “यह नहीं करना चाहिए” ऐसे कुछ नियम हैं। इसका उद्देश्य “चित्तशुद्धि” है। अर्थात् चित्तशुद्धिकी दृष्टिसे जो करना आवश्यक है वह विधि है तथा चित्तशुद्धिकी दृष्टिसे जो नहीं करना चाहिए वह निषेध है। विधि “क्या कैसा करना चाहिए” यह सिखाती है तो निषेध “क्या क्यों नहीं करना चाहिए” यह सिखाता है। क्या करना क्या न करना, तथा कैसे करना और क्यों करना यह जाननेसे मनुष्य विवेकी बनता है तथा “कार्य अकार्यका व्यवस्थित बोध” होता है। इससे चित्तशुद्धि हो कर वह

ज्ञानेश्वरी १८४