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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1133

· ब्रह्म है, उसमें चित्तको लीन करना "मूल बंध" है। सर्व बाह्य ब्रह्ममें सतत क्षोभ करना "शरीरकी अचलावस्था" है। ज्ञान दृष्टिसे सब ही ब्रह्ममय देखना "दृष्टि स्थिरता" नासिकाग्र दृष्टि है। सभी वृत्तियों पर स्वामित्व रखना "प्राणायाम" है। संसारका निषेध "रेचक" है और "निरंतर अहं ब्रह्मास्मि भाव कुंभक" अन्य विषयोंको त्याज्य मानकर "चैतन्यमें लीन रहना प्रत्याहार" है। जहाँ जहाँ मन दौड़ता है वहां वहां सब ब्रह्मदर्शन करना "धारणा" तो मैं ब्रह्म है इस वृत्तिका भी लोप "ध्यान" है। तथा सारी वृत्तियोंको लय करके ब्रह्म बनकर "मैं ब्रह्म हूँ" इसको भी भूलकर "केवल ब्रह्म ही रहना समाधि" है। आद्य शंकराचार्यने अपनी अपरोक्षा- नुभूतिमें राजयोगका यह अंतरंग दर्शन कराया है।

वर्णव्यवस्था — वर्णव्यवस्था भारतकी प्राचीनतम समाज-व्यवस्था अथवा समाज संघटन- पद्धति है। बृहदारण्यक उपनिषदमें "भूमि पर जो वर्ण-व्यवस्था है वह स्वर्गीय वर्णव्यवस्थाका प्रति- बिंब" कहा गया है तो ग्रीक तत्ववेत्ता प्लेटो कहता है "इस विश्वकी जो जो वस्तु है, व्यवस्था है, वह अत्यंत सूक्ष्मतम उच्च सृष्टिकी प्रतिकृति है !" गीतामें "स्वाभाविक गुण-कर्मके कारण मैंने वर्णव्यवस्था की है" ऐसा कहा है तो इससे प्राचीन पुरुषसूक्त वर्णव्यवस्थाका रहस्य कहता है। बृहदारण्यकमें यह भी स्पष्ट कहा है राजसूयज्ञ-यज्ञमें "ब्राह्मणोंको क्षत्रियोंसे नीचे बैठना चाहिए !" केवल भारतीय तत्त्वज्ञोंने ही समाज-व्यवस्थाके रूपमें वर्ण व्यवस्था मान्य की है ऐसे नहीं हैं किंतु यूनानके प्राचीन तत्त्वज्ञोंने भी इसका स्वीकार किया है। पाथेयगोरास यूनानका एक श्रेष्ठ और उच्चकोटीका तत्वज्ञ है। विद्वानोंने इसका काल ई. पूर्व ५८६-५०६ माना है। इसके संप्रदायका काल यूनानमें धर्मके पुनरुत्थानका काल। इनकी असामान्य बुद्धिमत्ताके कारण जनतापर भी इसका असामान्य प्रभुत्व था। पाथेयगोरास पंथके "डेलिअन" भारतके ब्राह्मणकी भांति त्यागप्रधान फकीर दीखते हैं। इनके विचारसे जीवन तीन प्रकारका होता है। पहला शास्त्रीय पंडितोंका-थिओरा विकल- लायक दूसरा व्यवहार-निपुणोंका-प्रैक्टिकल लायक-तीसरा विलासियोंका-अपॉलस्टिक लायक। इनका डेलिअन लोग इससे भिन्न हैं। यहाँ गीताके "चार वर्ण सृजे मैंने गुण-कर्म विभागसे" का उद्धरण • दे सकते हैं। इसके अलावा दूसरा प्रसिद्ध ग्रीकतत्त्वज्ञ प्लेटो भी-ई. पू. ४२७. ३ ७-अपने रिपब्लिकनमें समाजके सद्गुणोंके विषयमें लिखते समय समाजके लोगोंके तीन वर्ण विभाग करता है। १ शासकवर्ग, ज्ञान, चातुर्य, यह इस वर्गविशेषका गुण, ज्ञानके कारण ये राज्य शासन भली भांति चला सकते हैं। तर्कशुद्ध विचारके कारण समाजपर इनकी सत्ता चलती है। दूसरा शूर षडाउ लोगोंका। धैर्य और उत्साह इस वर्गविशेषका गुण है। तीसरा वर्ग अन्यनागरिकोंका। इनका गुण संयम और अनुशासन। इसके अलावा भी अथेन्स नगरमें और एक वर्ग था जो गुलामोंका था। यहां फिर एक बार गीताके "चार वर्ण सृजे मैंने गुण कर्म विभागसे !" का उल्लेख करना आवश्यक लगता है। साथ साथ अठारहवे अध्यायमें जो इन वर्गोंके कार्योंका विवेचन किया है वह भी उपरोक्त गुणोंसे मिलते जुलते किंतु उससे भी अधिक विवेचक है। न गीता या उपनिषदों की वर्णव्यवस्थाओं या पाथेयगोरास पंथमें या प्लेटोके रिपब्लिकमें, कहीं भी जन्मतः वर्ण अथवा जाति प्रथाकी गंध भी नहीं है जो बादकी विकृति है। यदि पूर्व-ग्रहसे दूषित न हो कर स्वतंत्र रूपसे विचार किया जाय तो वर्ण-व्यवस्था उच्चमत्तम समाज व्यवस्था है जो किसी भी राष्ट्रका राष्ट्र-धर्म बन सके !

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