भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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एकाग्र होने लगता है जो किसी भी योगकी पूर्व-पीठिका अथवा साधनाका धरातल है। इसलिए प्रत्येक धर्ममें इस प्रकार विधि निषेध कहे गये हैं। इसीको "धर्मानुशासन" कह सकते हैं। विरक्ति-वैराग्य—योगशास्त्रमें चित्तवृत्ति विरोधके साधन कहते समय "अभ्यास वैराग्यसे उसका निरोध होता है" कह कर "वृत्तियोंका निरोध वैसे ही चित्त शांत रखनेका प्रयास करना ही अभ्यास" कहते हुए "दीर्घकाल तक यह अभ्यास करनेसे वही स्वभाव बनता है!" कह कर "सामने दीखनेवाले ऐहिक तथा शास्त्रोंमें कहे गये पारलौकिक भोगोंके विषयमें मनमें कोई भावना न जगना ही वैराग्य है" ऐसी वैराग्य शब्दकी परिभाषा की है। साथ साथ इस वैराग्यसे भी "पुरुषका-ब्रह्मका-ज्ञान होनेसे गुणात्मक भोगोंकी ओर उदासीन रहना ही श्रेष्ठ प्रकारका वैराग्य है!" ऐसा कहा है। वैराग्यको मोक्षका साधन माना गया है। मोक्षके अन्य साधन भी वैराग्यसे प्राप्त होते हैं ऐसा शास्त्रोंका कहना है। संन्यास-धर्मकी दीक्षाका विचार करते समय "परम वैराग्य ही संन्यासकी परम स्थिति है!" ऐसे कहा गया है। किंतु वैराग्यकी स्थिति जाननेके लिये शास्त्रोंमें वैराग्यके प्रकार भी बताये हैं। मुख्यतया वैराग्यके अपर वैराग्य और पर वैराग्य ऐसे दो प्रकार हैं। उसमेंसे अपर वैराग्यके यतमान, व्यतिरेक, एकेंद्रिय, वशीकर ऐसे उपभेद भी हैं। इस वशीकर वैराग्यके मंद, तीव्र, तीव्रतर ऐसे तीन प्रकार हैं। मनु स्मृतिमें कहा गया है :— वैराग्य मनमें आता विश्वके सब वस्तुसे । तभी संन्यासकी सिद्धि न तो पतन निश्चित ॥ इसलिये विश्वके सभी वस्तुओंसे उनके भोगोंसे मन उदासीन होना चाहिए यही वैराग्य है। सब प्रकारके वैराग्यमें जो उत्कृष्ट तथा उत्कट प्रकारका वैराग्य है उसको परा-वैराग्य कहा है। ऐसे परा वैराग्ययुक्त मनुष्यको "परमहंस" दीक्षाका अधिकारी माना गया है। "परमहंस सदैव आत्मलोक या ब्रह्मलोकमें रहता है" ऐसा शास्त्र कहते हैं अर्थात् वह सदैव सर्वत्र ब्रह्म-चिंतनरत रहता है। उनके चिंतनमें ब्रह्मके अलावा और कुछ नहीं आ सकता। यही वैराग्यका अंतिम उद्देश्य है! विषय—पांच ज्ञानेंद्रियोंसे मनको जो अनुभव आता है उसको विषय कहा गया है। पांच ज्ञानेंद्रियोंके पांच विषय हैं। कानोंके शब्द, आंखोंके रूप, जिव्हाके रस, त्वचाके स्पर्श तथा नाकके गंध। वस्तुके ज्ञानके लिये इन इंद्रियोंकी आवश्यकता है। इसलिये इन्हें ज्ञानेंद्रिय कहते हैं। किसी वस्तुका ज्ञान करा देना मात्र इनका काम है। किंतु इंद्रियां इतना ही न करके "अपेक्षा करती हैं!" कान शब्दके लिये, आंख रूपके लिये, जिव्हा रसके लिये, त्वचा स्पर्शके लिये, नाक गंधके लिये "तरसने" लगते हैं। इस "तरसनेकी क्रियाको वासना मानकर "विषयवासना" अनुचित" कहा गया है। इंद्रियोंको कुछ प्रिय तथा कुछ अप्रिय लगता है। किंतु "प्रियाप्रियसे तटस्थ" रहकर विषयका ज्ञान मनको सौंपना इंद्रियोंका कार्य है। यह विरक्तिसे संभव है। इंद्रियोंका अपने अपने विषयोंके लिये तरसना, उनमें लिप्त हो कर प्रियाप्रियको अनुभवना आदिसे विषयोंका सही ज्ञान न होकर आत्मविस्मृति होती है। इंद्रिय-सुख ही महत्त्व-सा हो जाता है और उससे ऊंचे प्रकारके सुखका बोध नहीं होता। इसलिये इंद्रियनिग्रह कहा गया है। यह विषयोंका निषेध नहीं, किंतु विषयोंका सही ज्ञान होनेका साधन है। शब्द-ब्रह्म—शब्द आकाशमें रहता है और कानोंसे ग्रहण होता है। वह ध्वनिरूप और वर्णरूप रहता है। मिटे हुए ओंठ खुलते ही ध्वनिरूप शब्द "प्" बन कर वर्णरूप हो जाता १८९ परिशिष्ट ५