भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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है । ध्वनि निकलते ही दश दिशाओंमें उसके दलों शब्द बन जाते हैं, नाकासमेंसे निकला हुआ ध्वनि आकाशमें विलीन होनेतक उसके कई शब्द बन जाते हैं । आकाशमें निकला हुआ ध्वनि तरंगोंके परस्पर संघातसे स्थूल अर्थ प्रेरक तथा सूक्ष्म भावोत्पादक शब्द बनते हैं । भाषा शास्त्र कहता है "सभी भाषाएं ऊपरी हैं । स्थूल हैं। किंतु जिसका वाच्य वाचक भाव स्वयंभू है ऐसी एक सहज भाषा है जिससे पशुपक्षियोंका हद्गत भी जान सकते हैं !" शब्दोंकी इस सूक्ष्म शक्तिके कारण उन्हे स्वतः प्रमाण माना है । आकाश तत्वसे पृथ्वी तक सूक्ष्म रूपसे शब्द समाया हुवा है ! वह सूक्ष्म शब्द-नाद-उत्तरोत्तर स्थूल होते होते भाषाका रूप धारण करता है । यदि मनुष्य अपने श्रवणेद्रियोंको सूक्ष्म बना लेता है तो विश्वाकाशके इन सूक्ष्म तरंगोंको भी सुन सकता है । ऋग्वेदमें इसको कहा गया है । "पहले इस ओरकी-नामरूपसे संबंध जुडी हुई-भाषा सिखाई जाती है । किंतु इसके-इस भाषाके-उस ओरकी भाषा अत्यंत गूढ और श्रेष्ठ होती है वह दिव्य वाणी, जैसे पतिव्रता स्त्री अपने पतिको निरावृत्त हो कर अंगांग दिखाती है वैसे विश्वका रहस्य खोलकर दिखाती है !" भाषा इन्ही सूक्ष्म शब्द तरंगोंका स्थूल रूप है, मानो निराकार शब्दब्रह्मका साकार उपास्य देवता है । इसीलिये प्राचीन ऋषियोंने कहा है "मनुष्यको बोलते समय विचार पूर्वक बोलना चाहिये । उसके शब्दतरंग आकाशमें सदैव रहते हैं जो हजारो सालके बाद भी कोई सुन ले !!" "शब्द एक महान शक्ति है। ब्रह्म शक्ति है। विचार पूर्वक उसका उपयोग करना चाहिए !" आकाश स्थित नाद लहरियोंके कारण ध्वनि लहरियोंका उलझकर एक रूप लेकर बनी हुई प्रतिमा ही शब्द है ! किसी भी मनुष्यके शब्द मानो उस मनुष्य द्वारा बनाई गयी प्रतिमा है ! मनुष्यको विवेकपूर्वक ऐसी प्रतिमा बनानी चाहिए । हो सकता है "शब्दमें सुप्त शक्तिके कारण उस प्रतिमाका अंतर्देह जागृत हो, जिसका सामर्थ्य वह रूप देनेवाले व्यक्तिसे अनंत गुणा अधिक है।" इससे वह शब्दप्रतिमा बनानेवालेको ही निगल जाय ! शिव-शक्ति—ज्ञानेश्वर नाथपंथी हैं । शिव-शक्ति सामरस्य नाथपंथकी अंतिम स्थिति है । शिवशक्ति दो तत्व नहीं हैं किंतु एक ही तत्वके दो पहलू हैं। जैसे दक्षिण और उत्तर ध्रुव एक ही पृथ्वीके दो छोर हैं । शिव-शक्ति विवेचनमें ज्ञानेश्वर महाराजने स्वर्ण और उसके गहने, कर्पूर और उसकी सुगंध, गुड और उसकी मिठास आदि उपमाओंसे इन दोनोंका संबंध बताये हैं । शिवशक्ति सामरस्यको ज्ञानेश्वर महाराज महायोग मानते हैं । सहज समाधि-द्वारा मनोन्लय करके इस सामरस्यका अनुभव लेना ही मुक्तावस्था है । शिवमें शक्ति और शक्तिमें शिव निहित है । इसका समरसैक्यानुभव ही अमृनानुभव है जो जीवनका एक मात्र उद्देश्य है । षट्चक्र—योग-शास्त्रके अनुसार मनुष्यकी रीडमें सुषुम्ना नाडीकी राहमें मूलाधार चक्रसे आज्ञा-चक्र तक ज्ञानतंतुके छ चक्र अथवा कमल हैं जिनकी पंखुडियां हैं । योग-शास्त्रमें इन चक्रोंका अत्यंत महत्व है । ये चक्र अथवा कमल कुंडलिनीके स्पर्शसे खिलते हैं । नहीं तो बिना खिले ही रहते हैं । इन छ चक्रोंमेंसे पहला चक्र मूलाधार कहलाता है, इसको आधारचक्र भी कहा गया है । शिश्न और गुदाकी सीवनमें पिछली ओर रीडके निचले छोर पर इस चक्रका स्थान है । इसका रंग लाल और पंखुडियां चार हैं । वैसे ही प्रत्येक चक्रका देवता होता है । उसके बीज भी ज्ञानेश्वरी १९०