भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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होते हैं। मंत्र भी होते हैं। कुंडलिनी इसी चक्रमें सुप्तावस्थामें रहती है। इस चक्रकी देवता गणपति है और यं, शं, सं, षे बीज हैं। दूसरा चक्र स्वाधिष्ठान कहलाता है। इसको लिंग चक्र भी कहा गया है। यह लिंगके पीछे रीढमें सुषुम्ना नाडीके रास्ते पर है। इसका रंग पीला है। इसकी छ पंखुडियां हैं। ब्रह्मा इसका देवता और बं, भं, मं, यं, रं, लं, इसके बीज हैं। तीसरा चक्र मणिपुर कहलाता है। इसको नाभिचक्र भी कहते हैं। यह नाभि स्थान पर किंतु पीठकी रीढमें सुषुम्नाके रास्ते पर आता है। इसका रंग नीला है। इसकी दस पंखुडियां हैं और इस चक्रका देवता विष्णु है। इसके बीज डं, ढं, णं, तं, थं, दं, धं, नं, पं, फं ये हैं। हृदयके स्थान पर पीछे सुषुम्नाके मार्ग पर अनाहत चक्र है । इसका रंग शुभ्र है। इसकी बारह पंखुडियां हैं। तथा शंकर इसका देवता है। इस चक्रके बीज हैं कं, खं, गं, घं, ङं, चं, छं, जं, झं, ञं, टं, ठं। इसीमें से अतींद्रिय अनाहत ध्वनि निकलती है। पांचवा चक्र कंठमणिके स्थान पर पीछे रीढमें है जो विशुद्धचक्र कहलाता है। यह धूम्रवर्ण, सोलह पंखुडियोंका है। जीवात्मा इसका देवता है और अं, आं, इं, ईं, उं, ऊं, ऋं, ॠं, लृं, लूँ, एं, ऐं, ओं, औं, अं, अः इसके बीज हैं। छठा चक्र आज्ञाचक्र कहलाता है। इसको अभ्रिचक्र भी कहा गया है। यह दो भौंके मध्य रीढमें पीछे सुषुम्नाकी राहमें है। इसकी दो पंखुडियां हैं। हं, क्षं इसके बीज हैं। गुरु इसकी देवता है। यहींसे गुरु आज्ञा साधक पर प्रभाव डालती है। अथवा उपनिषदके अनुसार शिष्यकोशिष्यत्वको- निःशेष कर उसको अपने जैसे बना लेती है। कुंडलिनी इन सभी चक्रोंका भेदन करके मूलाधारसे ब्रह्मरंध्र तक जाती है। योग साधनामें “बीज” का अत्यंत महत्त्व है। अलग अलग प्रकारके बीज जपके समय अलग अलग प्रकारके स्पंदनजन्य तरंग उठते हैं जो शरीरके भिन्न भिन्न स्थानको प्रभावित करते हैं। वैसे ही भिन्न भिन्न प्रकारके तरंगप्रवाह भिन्न भिन्न नाडियोंको प्रभावित करते हैं या भिन्न भिन्न नाडियोंको शुद्ध करते हैं। इससे अनायास और अज्ञात रूपसे मानसिक विकास और चित्तशुद्धिमें सहायता मिल सकती है। इनके अलावा भी अन्य अनेक बीज हैं और उन बीजोंमें विचार शक्ति निहित। बीज- मंत्र जपके साथ उस प्रकारकी मंत्र शक्ति अथवा विचार शक्तिका विकास होता है। उपरोक्त बीजोंका उन उन चक्रोंकी देवताओंका अधिष्ठान और उत्थापनमें उपयोग होता है। योगमार्गमें ध्यान तो इन्हीं चक्रस्थित देवता पर “चित्त केंद्रित” कर करना होता है। षड्गुणैश्वर्य—यश, श्री, ज्ञान, औदार्य, वैराग्य, और ऐश्वर्य ये छ ईश्वरी गुण माने गये हैं। भगवान कहलानेके लिये इन छ गुणोंकी आवश्यकता है। साथ ही साथ हरिवंशमें कर्तृत्व, नियंत्रण शक्ति, भोक्तृत्व, विभुत्व, साक्षित्व, सर्वज्ञत्व, तथा तृप्ति, अनादिज्ञान, स्वातंत्र्य, शक्ति, प्रकाशन, अनंतशक्ति, और सर्वज्ञातृत्व, ये छ गुण-श्रीकृष्णमें थे ऐसे कहा गया है। षड्दर्शन—भारतमें अनेक दर्शन हैं किंतु षड्दर्शन यह शब्द प्रसिद्ध है। इसमें “वैदिक और अवैदिक दर्शन” ऐसे भेद भी किये जाते हैं। ज्ञानेश्वरीमें जिन छ दर्शनोंका उल्लेख है वे हैं न्याय, वैशेषिक, वेदांत, बौद्ध, सांख्य, और मीमांसा। किंतु वैदिक दर्शनमें बौद्धदर्शनका उल्लेख नहीं होकर योगदर्शनका उल्लेख होता है। ज्ञानेश्वरीमें बौद्ध मत संकेत। वार्तिकोंका ॥ ज्ञा. १-१२५ ऐसे उल्लेख होनेसे बौद्धदर्शन गिना है। इसके अलावा चार्वाक, जैन, सौर, शाक्त, गाणपत्य, शैव, वैष्णव, स्कांद दर्शन भी हैं। सुश्रुतमें कहा गया है कि— १९३ परिशिष्ट ५