ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकपिल सांख्यका कर्ता गौतम न्याय सूत्रका । योगका पातंजली है योगीश्वर महामुनि । मीमांसा जैमिनीका है वैशेषिक कणादका । व्यास वेदांत कर्ता है स्वयं जो मधुसूदन ॥ (१) न्याय दर्शनके ५ अध्याय हैं। उनमें १० आह्निक और ८४ प्रकरण हैं। इन ८४ प्रकरणोंमें ५२८ सूत्र हैं। न्यायसूत्रोंके रचयिता गौतम हैं। उसे अक्षपाद कहा है। उनका काल विद्वानोंने ई. पू. ६०० वर्ष माना है। इस पर अनेक विद्वानोंने भाष्य लिखे हैं। न्याय दर्शन तर्कशास्त्र है। ये ईश्वरको मानते हैं। यह वैदिक दर्शन है। मोक्ष इनका अंतिम साध्य है। (२) कणाद वैशेषिक दर्शनका आद्य आचार्य है। इस दर्शनके दस अध्याय हैं। कणाद अणुवादी हैं। इसने अत्यंत योग्यतापूर्वक परमाणुका विवेचन विश्लेषण किया है। वे अणुओंके “पाकज क्रिया”-Chemical Action” के कारण विश्वोत्पत्ति हुई ऐसा मानते हैं। किंतु आगे वैशेषिकोंने ईश्वर माना है। (३) वेदांतका अर्थ ब्रह्मसूत्र है जो उपनिषदोंका निचोड़ है। ब्रह्मसूत्रोंका वर्णन अन्यत्र किया है। ब्रह्मसूत्रोंमें ४ अध्याय हैं। १६ पाद हैं। कुल मिला कर १५ अधिकरण हैं और ५४५ सूत्र हैं। ब्रह्म इसका अंतिम तत्त्व है। और मोक्ष अंतिम स्थिति। (४) कपिलको सांख्यमतका मूल आचार्य माना जाता है। महाभारत और गीतामें सांख्य दर्शनका उल्लेख है। इस परसे यह दर्शन भी अत्यंत प्राचीन होनेका बोध होता है। इस दर्शनके छ अध्याय और ५२७ सूत्र हैं। सांख्योंने २५ तत्त्व माने हैं जो अन्यत्र दिये गये हैं। पुरुष इनका अंतिम तत्त्व है और कैवल्य अथवा मुक्ति अंतिम ध्येय है। सांख्यमें ईश्वरवादी सांख्य और निरीश्वरवादी सांख्य ऐसे दो भेद हैं। ईश्वरवादी सांख्योंमें ईश्वर २६ वा अंतिम तत्त्व है। (५) बौद्धदर्शन-बुद्ध इसका आदि पुरुष है। ई. पू. ५०० वर्ष इसका काल है। यह निरीश्वरवादी दर्शन है। बौद्धदर्शन आचारशास्त्र है। बुद्धके बादवाले उनके अनुयायियोंने उसको शून्यवाद और विज्ञानवादका गूढ़-आध्यात्मिक-रूप देकर उसका दर्शन बनाया है। वैदिक पूर्व मीमांसाकी भांति मूल बौद्ध दर्शन कर्मकांड है। बुद्धके विश्वास- १ सारा संसार दुःखमय है। २ दुःखोंका कारण है। दुःखानुभवसे उसके नाशका उपाय ढूंढ सकते हैं। ३ दुःखका नाश हो सकता है। ४ दुःख नाशके भी उपाय हैं। दुःखके कारणोंको गिनाते समय बुद्धने निम्न कारणपरंपरा दी है। (१) अविद्यासे संस्कार (७) वेदनासे तृष्णा (२) संस्कारसे विज्ञान, (८) तृष्णासे उपादान=राग (३) विज्ञानसे नाम रूप (९) उपादानसे भव=सांसारिक प्रवृत्तियां (४) नाम रूपसे षडायतन- (१०) भवसे जाति (मन सहित पांच ज्ञानेंद्रियाँ) (५) षडायतनसे स्पर्श (११) जातिसे जरा (६) स्पर्शसे वेदना (१२) जरासे मृत्यु इस दुःख मुक्तिके लिये इस दर्शनमें अष्टांगमार्ग कहा है। वह है- (१) सम्यक् दृष्टि = आर्य सत्योंका ज्ञान ज्ञानेश्वरी १९२