ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1139, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंAn exact transcription of the Hindi/Devanagari text with line numbers:
(२) सम्यक् संकल्प = रागद्वेष हिंसादि सांसारिक विषयोंका त्याग-संग (३) सम्यक् वाचा = सत्यवचनकी रक्षा, झूठ, दुर्वचन, निंदादि अनुचित वचन त्याग । (४) सम्यक् कर्म = हिंसा, परद्रव्यापहरणादि दुष्कर्मोंका त्याग, सत्कर्मोंका आचरण । (५) सम्यक् आजीव = न्यायपूर्ण जीविका कमाना । अन्याय जीविकाका त्याग । (६) सम्यक् व्यायाम = बुरे कर्मोंका त्याग सत्कर्ममें उद्यत रहना । (७) सम्यक् स्मृति=चित्तशुद्धि जीविकाका त्याग । (८) सम्यक् समाधि=चित्तैकाग्रता । इस बौद्ध मतमें हीनयान और महायान ऐसे दो बडे संप्रदाय हैं । बुद्धत्व प्राप्तिसे निर्वाण (जन्म मरणसे मुक्ति) इसका उद्देश्य है । इस दर्शनका विपुल साहित्य है पालीमें और संस्कृतमें । इसमें बडे बडे दार्शनिक हो गये हैं । कुछ बुद्धसे पूर्ववर्ती हैं तो कुछ बुद्धके बादके । (६) मीमांसा, इसको पूर्वमीमांसा कहते हुए वेदांतसूत्रोंको उत्तरमीमांसा कहनेकी परिपाटी भी है । इसका आचार्य जैमिनी है । इसलिये इसको जैमिनि दर्शन भी कहा जाता है । यह जैमिनीदर्शनभी बौद्धदर्शनकी भांति ही आचार संहिता है । पूर्व मीमांसा धर्म-दर्शन है । मीमांसामें बारह अध्याय और २५०० सूत्र हैं । मीमांसाके विषय भी बारह हैं । ये हैं (१) धर्मजिज्ञासा (२) कर्मभेद (३) शेषत्व (४) प्रायोज्य-प्रयोजकभाव (५) कर्म- क्रम (६) अधिकार (७) सामान्य (८) अतिदेश (९) ऊह (१०) बाध (११) तंत्र (१२) अवाप । वेद ही इसका स्वतःप्रमाण है । इसके अन्य प्रमाणोंकी सूची बडी लंबी है । इसमें ब्राह्मण ग्रंथोंके विधिविधानों तथा निषेधोंको दार्शनिक रूप देनेका प्रयास है । मीमांसाको ईश्वर या परमात्माका कोई प्रयोजन नहीं है । इसने ईश्वर या परमात्माका खंडन नहीं किया इसलिए यह नास्तिक या निरीश्वरदर्शन नहीं कहलाता । यह संसारको जैसे है वैसे सत्य मानता है । यह मुक्तिको स्वीकार करता है । इसके भाष्यकारोंके कई मत हैं जैसे ब्रह्मसूत्रके भाष्यकारोंके. अनेक भिन्न भिन्न मत हैं । ज्ञानेश्वरीमें उल्लिखित षड्दर्शनके विचार करनेके बाद अब सुश्रुतमें कहे षड्दर्शनमें बचे योगदर्शनका विचार करें । पातंजल मुनि इसका मूल आचार्य है । इसके भी (१) समाधिपाद (५१) सूत्र, (२) साधनापाद ५५ सूत्र, (३) विभूतिपाद ५४ सूत्र (४) कैवल्यपाद ३४ सूत्र हैं । इनका रचनाकौशल्य अप्रतिम है । मानो एकमेंसे दूसरा सूत्र अपने आप निकलता है । इसका विवेचन करते समय— समाधिपाद योग उद्देश्य निर्देश उसके वृत्ति लक्षण । योग उपाय प्रभेद भेद समाधिके कहे । साधना पाद योगका ज्ञान विज्ञान रोक और निवारण । क्रम सह चित्त-मुक्ति उसके बाह्य साधन ॥ विभूतिपाद अंतस्साधनके साथ दिखाया है प्रभाव भी । तथा संयमसे ज्ञान मिलता है विवेक भी ॥ १९३ परिशिष्ट ५