भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1140, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1140

कैवल्यपाद कैवल्य पादमें तीनों पादोंका सार भी कहा । कहा समाधिका पूर्ण रहस्य ध्येयके सह ॥ इन चार श्लोकोंमें योग-दर्शनका सार कह सकते हैं । संन्यासी—भारतीय आश्रम-धर्मानुसार चतुर्थाश्रम । यह आश्रम कब ग्रहण करना चाहिए ? इसकी चर्चा करते समय शास्त्रकारोंने गृहस्थाश्रममें संतानोंत्पादनद्वारा पितॄऋणसे, अध्ययन अध्यापनद्वारा ऋषिऋणसे, यथाशक्ति यज्ञयागादि करके देवऋणसे मुक्त होनेके बाद, मोक्ष प्राप्तिके लिये संन्यास लेनेकी आज्ञा दी है । अर्थात् पारिवारिक तथा सामाजिक कर्तव्य पूर्ण करनेके बादही मनुष्य संन्यास ले सकता है उसके पहले नहीं । अपने तीनों ऋणसे मुक्त होनेके बाद जब तीव्र वैराग्य प्राप्त होता है, स्वामी रामतीर्थके शब्दोंमें भूख लगी तो अन्न, प्यास लगी तो पानी, देनेवाली ईश्वरी शक्ति पर पूर्ण विश्वास होता है तथा इन दो वस्तुओंके अलावा और किसीकी आवश्यकताका अनुभव ही नहीं होता तब—संन्यास- ग्रहण करना चाहिए-उसके प्रथम कदापि नहीं । ऐसे दो प्रकारके संन्यास होते हैं । यदि स्वास्थ्य दुर्बल हो तो क्षेत्र संन्यास नहीं तो परिव्राजक । संन्यासमें “परमहंस” श्रेष्ठतम स्थिति है । ‘मैं” और ‘मेरा” इसको जो अंतःकरणमेंसे भूल गया है वही संन्यासी है । परमहंस जीवन्मुक्तावस्था है । वह जीवनकी सहजस्थिति है । वह ब्रह्मलीन हो कर ब्रह्मरूप बना हुवा सोऽहं भावमें लीन रहता है । उसके विषयमें सर्वत्र अपना ही रूप दीखता है इसलिये वह इंद्रातीत सहज स्थितिमें रहता है । सत्रहवींका स्तन्य—प्रश्नोपनिषद्में सोलह कला और उनके देवता बता कर इन कलाओं- द्वारा पुरुषमें पुरुषत्व आता है ऐसा कहा गया है । पुरुषकी ये सोलह कलायें और उनका देवता निम्न हैं—१, प्राण=वायु, २, श्रद्धा=भारती, ३, आकाश=गणेश, ४, वायु=प्रवाह ५ तेज अग्नि, ६ आप=वरुण, ७ पृथ्वी=शनैश्चर, ८, इंद्रियां=सूर्य, ९ मन=रुद्र, अथवा अनिरुद्ध १० अन्न=सोम, ११ वीर्य=वरुण, १२, तप=पावक १३, मंत्र=स्वाहा, १४ कर्म=पुष्कर, १५ लोक पर्जन्य, १६ नाम= उषा । पुरुषकी इन सोलह कलाओंके बाद सत्रहवी कला आत्म-तत्व है । सत्रहवींका स्तन्यः जो गुरुमाता देती है वह है आत्मतत्वबोध । अथवाव्योमचक्रकी आज्ञाचक्र (?) चंद्रामृतरूपी जीवनकला । सप्तधातु—शरीरके घटक, देहस्थित रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा, रेत ये सात धातु । इसके उपधातु भी हैं । रसका कफ, रक्तका पित्त, मांसका नाक, कान आंखमेंसे स्त्रवनेवाला मल, मेदका पसीना, अस्थिके बाल और नख, मज्जाकी स्निग्धता चिकनाई तथा रेतका ओज ! सांख्य-योग—गीताका दूसरा अध्याय सांख्य-योग कहलाता है । इस अध्यायमें तीन महत्त्वके सिद्धांत कहे गये हैं । आत्माकी अमरताके साथ अखंड सर्वव्यापकता । देहकी नश्वरताके साथ क्षुद्रता । स्वधर्मकी अबाध्यता । स्वधर्मका अर्थ निसर्गसे प्राप्त स्वकर्तव्य है । आत्माकी अखंडता स्वधर्मकी सहजता सिखाती है । जैसे जन्मके साथ मांकी निर्मिति होती है वैसे जन्मके साथ ही स्वधर्म जुडा रहता है तथा शरीरकी नश्वरता स्वधर्माचरणमें आनेवाले कष्टोंको शांत सहन करनेकी प्रेरणा देती है । शरीरका सुख दुःख अथवा शरीर नाशकी कोई कीमत नहीं जैसे मनुष्य कपडे बदलता है वैसे आत्मा शरीर बदलता है । तेरे कपडोंकी जो कीमत वही तेरे शरीरकी है यह सिखाती है शरीरकी नश्वरता । ज्ञानेश्वरी १९४