ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंशरीर केवल स्वधर्मका साधन है। इसी रूपमें उसका संभाल करना है। अधर्म और पर-धर्मका विचार न करते हुए केवल स्वधर्मका आचरण करना चाहिए। शरीरको क्षणिक मान कर उसको सतत स्वधर्माचरणमें लगाना, आवश्यकता हो तो उसीमें उसका त्याग भी करना और मनमें आत्माके व्यापक अखंड तत्त्वका भान रखते हुए स्व-पर भेद मिटा कर साम्य बुद्धिसे सब वर्तन करना, यह सांख्य ज्ञान है। इसको आचरणमें लानेकी कुशलता योग है। स्वधर्माचरण करते समय भी जो कुछ करना है वह फलकी इच्छासे नहीं करना। फल निरपेक्ष भावसे करना। पहले सांख्य-ज्ञान कह कर फिर उस ज्ञानका आचार-धर्म सिखाया है। आगे इसका परिणाम ? वह है स्थितप्रज्ञ सिद्धि । “सांख्य” ज्ञानके साथ “योग” की कर्म कुशलता बताकर गीतामें सांख्य- योग कहा गया है। इस योगसे स्थित प्रज्ञ स्थिति प्राप्त होकर “ब्रह्म निर्वाण” मिलता है यह कहा है। ज्ञान, कर्म और उसका फल इन तीनोंका विवेचन इस सांख्ययोगमें है। साक्षित्व-साक्षीभूत—जीवनमें होनेवाली घटनाओंसे और घटनाओंमें अपनेको अलिप्त करके उनकी ओर देखनेकी वृत्ति तथा स्थिति। सुख दुःख निरपेक्ष भावसे तटस्थ अथवा मध्यस्थ रहनेसे यह संभव हो सकता है। वस्तुतः जीव द्रष्टा है। उसके अस्तित्वके कारण प्राप्त चैतन्यसे उसकी बुद्धि, उसका मन इंद्रियादि कार्यक्षम हैं। यह वस्तुस्थिति शरीरमें अथवा शरीरकी ओरसे चलनेवाली क्रियाओंसे पहचान कर उनकी ओरसे मध्यस्थ रहना उदासीन रहना साक्षित्व कहा जाता है। अपनेको अलग रख कर देखना अपनेको घटनाओंमें या घटनाओंसे उलझाकर परेशान होते हुए तमाशा देखनेवालेकी भांति तटस्थ रहनेकी वृत्तिको साक्षित्व कहा जाता है। सुषुम्ना—सुषुम्नाको महानाडी कहा गया है। मानवी शरीर मानो नाडियोंका जाल है। उनमें सुषुम्ना सबसे महत्त्वकी नाडी है। यह मध्यनाडी है। यह रीढ़के बीचमेंसे जाती है। इसके साथ वज्रा और चित्रिणी ये दो अत्यंत सूक्ष्म नाडियां चलती हैं। ये दो नाडियां विद्युतमा- लाके समान विलसती है। अर्थात् सुषुम्ना त्रिवेणीकी भांति है। यह पूरी पोली है। इसलिये सुषुम्ना कहलाती है यह सहस्रारसे मूलाधार तक फैली है। सहस्रारसे छोटा मस्तिष्क शिरोब्रह्म कहलाता है। शिरोब्रह्मके पासवाला भाग अमरी अथवा गुंफात्रेणू कहलाता है। उसके बीचवाला भाग सुषुम्नाकंद है। सुषुम्नाकंद सुषुम्नाके ऊपरका सिरा है। वहांसे रीढमेंसे पतली पतली हो कर यह मूलाधार तक गयी है। सुषुम्नाका नीचेका सिरा बडा पतला होता है। सुषुम्नाकंद और सुषुम्नाका नीचेका सिरा देखा जाय तो ऊपरका हिस्सा सापका फना और नीचेका सांपकी दुम-सा है। वहां इससे अन्य अनेक नाडियां मिली होती हैं। नाभिकक्रके पास अनेक नाडियां सुषुम्नासे मिली हैं। सुषुम्नाकी एक ओर सहस्रार तथा शिरोब्रह्मसे जुडा हुआ सुषुम्नाकंद है तो दूसरी ओर स्वाधिष्ठानसे संलग्न इसका सुषुम्ना-मुख है। सुषुम्नाकंदसे सुषुम्नामुख तक यह रीढकी गुहामेंसे रीढके पोलेमेंसे- चलती है। उसके साथ वज्रिणी और चित्रिकणी गूंथी गयी हैं जो अत्यंत सूक्ष्म हैं। ये नाडियां भी पोली हैं। इसलिये इसे त्रिगुणार्मिका कहते हैं। सुषुम्ना गर्दनके पास विशुद्धि चक्रके पास जाकर अंतर्मुख हो कर सहस्रारतक जाती है और वहां वह शंखिनी कहलाती है। रीढमें नीचे जो सुषुम्ना है वह कुंडलिनीके साथे जुडी है और वहांसे वह टेढीमेढी आज्ञाचक्र तक जाकर फिर ऊपर ब्रह्मरंध्रसे जुडी है। इस प्रकार यह ब्रह्मरंध्रसे कुंडलिनी स्थान तक फैली है। इसके साथ इडा पिंगला-रीढके बाहरी ओरसे-चलती हैं। पिंगला दाहिनी ओरसे और इडा बाईं ओर से। पिंगलाको सूर्यनाडी और इडाको चंद्रनाडी कहा जाता है। ये दोनों मूलाधारके पाससे-गुदाकंदके अंतर्भागसे निकल कर सभी नाडीचक्रोंसे लपेटते हुई नासिका तक गयी है। १९५ परिशिष्ट ५