भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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योगीजन अथवा सिद्धपुरुष, बिन तारायंत्रसे संदेश पहुंचानेवालोंकी भांति अपने शिष्य साधकोंको इसी सुषुम्नाके द्वारा आवश्यक संदेश देकर उनके जीवनमें परिवर्तन करा देते हैं। इसी सुषुम्नाकेद्वारा ज्ञानसंपादन किया जाता है तथा ज्ञानदान भी होता है। यद्यपि सामान्य लोगोंके लिये यह मार्ग बंद है (!) योगी आज्ञा-चक्रको प्रभावित कर अपनी शक्तिसे साधककी कुंडलिनी जागृत कर देते हैं इस क्रियाको योगमें शक्तिपात कहा जाता है । सैंतीसवा—जैसे सांख्योंके मतसे विश्वके पच्चीस तत्त्व हैं वैसे शैव तत्त्वज्ञोंके मतसे विश्वके छत्तीस तत्त्व हैं। उन छत्तीस तत्त्वोंका नीचेसे ऊपर तक (१) अचित् तत्त्व अथवा अशुद्ध तत्त्व (२) विद्या-तत्त्व अथवा शुद्धाशुद्ध तत्त्व (३) चित् तत्त्व अथवा शुद्ध तत्त्व ऐसे तीन प्रकार हैं। अशुद्ध तत्त्व २४ ५ पंचमहाभूत, ५ तन्मात्राएं ५ कर्मेंद्रियां ५ ज्ञानेंद्रियां २१ मन २२ बुद्धि, २३ अहंकार २४ त्रिगुणात्मक प्रकृति शुद्धाशुद्ध विद्यातत्त्व ७ १ पुरुष, २ विद्या, ३ राग, ४ नियति ५ काल ६ कला, ७ माया और शुद्ध अथवा चित् तत्त्व ६ शुद्धविद्या, २ ईश्वर, ३ सदाशिव, ४ शक्ति, ५ शिव ६ परशिव अथवा परा संवित्-यह परा संवित् सैंतीसवा परमोच्च तत्त्व है । स्मृति—भारतमें श्रुति और स्मृति दो प्रकारके धर्म-ग्रंथ हैं। वेदोंको श्रुति कहा गया है जो गुरुसे सुना और शिष्यने पाठ करके अक्षुण्ण रखा। स्मृति गुरुसे सुना और स्मरणसे अक्षुण्ण रखा और वे नियमादि चलते आये। गुरुमुखसे सुन कर स्मरण रखकर, आचरणमें लाये गये नियमोंके जो ग्रंथ हैं उन्हें स्मृतिग्रंथ कहा गया है जो २० हैं। (१) मनुकी मनुस्मृति (२) अत्रिकी अत्रिस्मृति (३) विष्णुकी विष्णुस्मृति (४) हारीतकी हारीतस्मृति (५) याज्ञवल्क्यकी याज्ञवल्क्यस्मृति (६) उशनाकी उशनास्मृति (७) अंगिराकी अंगिरास्मृति (८) यमकी यमस्मृति (९) आपस्तंबकी आपस्तंबस्मृति (१०) संवर्तकी संवर्तस्मृति (११) कात्यायनकी कात्यायनस्मृति (१२) बृहस्पतिकी बृहस्पतिस्मृति (१३) पराशरकी पराशरस्मृति (१४) व्यासकी व्यासस्मृति (१५) शंखलिखितकी शंखलिखितस्मृति (१६) बौधायनकी बौधायन- स्मृति (१७) दक्षकी दक्षस्मृति (१८) गौतमकी गौतमस्मृति (१९) शातातपकी शातातप- स्मृति (२०) वसिष्ठकी वसिष्ठस्मृति । ये सारे स्मृतिग्रंथ समय समय पर कही गयी भारतकी प्राचीन आचारसंहिता है। सामाजिक अनुशासन पद्धति है। इसमें भारतीय समाज शास्त्रके बीज निहित हैं। हठयोग—ईश्वरसे जुड़नेके लिये-आत्मसाक्षात्कारके लिये-हठसे शरीरको तैयार करनेकी क्रियाको हठयोग कहते हैं। इसमें शरीर शुद्ध रखनेके लिये षट्कर्म शरीरके प्रत्येक इंद्रियपर स्वामित्व रखनेके लिये मूलबंध आदिका अंतर्भाव होता है। किंतु हठयोगके ग्रंथोंमें कहा गया है। चलता सूर्यसे हकार तथा ठकार जो चंद्रसे । सूर्य चंद्रमाका जो योग कहलाता हठयोग है ॥ दाहिने और बाये नाकसे जो प्राण चलता है उस प्राणका योग हठ योग है। अपने श्वासोच्छ्वासका संयम कर सूर्यनाडी और चंद्रनाडीमेंसे चलनेवाली प्राणशक्ति पर स्वामित्व प्राप्त करना ही हठयोग है। प्राणशक्तिद्वारा आत्म-साक्षात्कार करके आत्मलीन होना हठयोग है जैसे भावशक्तिद्वारा आत्मलीन होना भक्तियोग और बुद्धिशक्तिद्वारा आत्मलीन होना ज्ञान योग है! ॐ ज्ञानेश्वरी १९६