ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकाश्मीर शैवेति-शैवागमोंमें-मूलतत्त्व पर जो आवरण है उसको माया कहते हुए उसको पंचकंचुक पंचावरणयुक्त-माना है । वे कंचुक अथवा आवरण हैं कला, विद्या, राग, काल और नियति । इनके कारण मूलतत्त्व आवृत्त रहता है । द्वैतसिद्धांतानुसार अविद्या अथवा माया अनादि है । ब्रह्मासे यह प्रकट हुई । पंचमहाभूतोंका तमोगुण इसका उपादान है । इस अविद्याकी पांच श्रेणियां हैं। मोह, महामोह, तामिस्र, अंधतामिस्र तथा तम । जीवाच्छादिका, परमाच्छादिका, शैवला, माया ऐसे इस-अविद्याके चार भेद हैं । वल्लभाचार्यके शुद्धाद्वैतके अनुसार ब्रह्मकी शक्ति-सद्ंशकी क्रियारूपा और चित् अंशकी व्यामोहरूपा माया है । यह त्रिगुणात्मिका है । यह जगतकी कर्तृत्वरूपा मायाका अंश है । यह जगदुत्पत्तिरूपमें आनंदरूपका कारण भी है । मायामें भी जगत् का कर्तृत्व भगवानकी इच्छासे ही है । ज्ञान और क्रिया दोनों भगवानकी शक्तियां हैं । चिदंशकी शक्ति व्यामोहिकाको-अविद्या अथवा माया कहा गया है । मुक्ति अथवा मोक्ष--मुक्ति अथवा मोक्ष कोई स्थान नहीं किंतु एक स्थिति है । वह जीवनकी पूर्णावस्थाका अनुभव है । अपूर्णताका बोध ही दुःख है । "मैं पूर्ण हूँ" यह बोध होनेसे दुःख नाश और शाश्वत सुखका अनुभव होता है । सुख अथवा आनंद बाहरी साधन अथवा परिस्थिति पर निर्भर नहीं है । वह निरालंब है । वह अपनेमें अपनेसे ही प्राप्त होनेवाला सुख है । तभी वह शाश्वत रूपसे मिल सकता है । यह शाश्वत सुखावस्था दो प्रकारकी है । एक जीवन्मु- कावस्था, दूसरी विदेहमुक्तावस्था, बिना जीवन्मुक्तावस्थाके विदेहमुक्ति मिलना असंभव है । यह जीवन्मुक्तावस्था दो प्रकारकी है । पहिली क्षणिक, चित्तैकाग्रतासे ध्यान धारणाद्वारा समाधि लगा कर प्राप्त की जाती है । जब तक चित्त समाधिलीन है तब तक आनंदानुभूति । दूसरा सहजावस्थाका आनंद । यह सहज समाधि है ! यह विश्वकी मूल-शक्तिमें समरसजन्य आनंद है । मन ब्रह्मलीन और इंद्रियां कर्मलीन ! कहीं द्वैत भाव नहीं । यह दूसरी प्रकारकी जीवन्मुक्तावस्था है । मनुष्यकी सभी संकुचित मनोवृत्तियोंके विलयके बाद "मैं और मेरा" भी नष्ट हो जाता है तब वह "परमात्म्य समरसैक्य" अनुभव करने लगाता है । यही वास्तविक जीवन्मुक्ता- वस्था है । उस समय वह "अपनेको पानीमें गलाकर नमकीनपनके रूपमें रहनेवाले नमककी भांति" रहता है ! न रहनेका सा रहता है । एक बार ऐसी जीवन्मुक्तावस्था प्राप्त होने के बाद जब शरीर छूटता है तब विदेहमुक्ति अपने आप मिलती है [मीमांसादर्शनमें मुक्तिका विचार करते समय "प्रपंच संबंध विलयको मुक्ति" कहा गया है] शैव दर्शनके अनुसार स-शरीर मनुष्यको जब शिव-शक्ति सामरसका बोध होता है वह जीवन्मुक्तावस्था कहलाती है । इसे चिदानंद प्राप्ति कहा गया है । ऐसा मनुष्य शरीर छूटनेके बाद परम-शिवमें विलीन हो जाता है ।] भेदाभेद दर्शनके अनुसार सभी उपाधियोंसे छूट कर जीवका अपने स्वाभाविक स्वरूपमें रहना ही मुक्ति है । इसके दो भेद हैं । सद्योमुक्ति तथा क्रममुक्ति । ब्रह्मोपासना करनेपर जो मुक्ति मिलती है वह सद्योमुक्ति है और जो कार्यस्वरूप ब्रह्मके द्वारा मुक्ति मिलती है वह क्रममुक्ति है । ये लोग जीवन्मुक्ति नहीं मानते । ज्ञानेश्वरी १८४