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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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माध्वमतके अनुसार भक्ति ही मुक्तिका साधन है। केवल परमात्मकृपासे ही मुक्ति मिलती है। यह मुक्ति चार प्रकारकी है। सामीप्य, सालोक्य, सारूप्य, सायुज्य। माध्वोंमें मुक्तिको भी जीवका भोग माना है। मुक्तजीव संसारमें नहीं आते। ब्रह्मादि भी मुक्त हो जाते हैं और तब उनको सृष्टि आदिका व्यापार नहीं रहता। वेदांतियोंकी मोक्षावस्थामें सारूप्य, सालोक्य, सामीप्य, सायुज्य, ऐसी चार अवस्थायें हैं। जिस समय मनुष्य अपना मानवी रूप भूलकर उपास्य देवता रूप हो जाता है तब सारूप्यावस्था कहलाती है। वैसे ही वह अपने आपको मैं ईश्वरीय लोकमें हूँ ऐसे अनुभव करने लगता है तब सालोक्यावस्था कहलाती है। और वह अपनेको ईश्वरके समीप मानने लगता है तब सामीप्यावस्था कहलाती है तथा जब वह अपनेको ईश्वरमें लीन मानता है तब सायुज्यावस्था कहलाती है। मुद्रा—योगविद्यामें कमरके ऊपरके भागको विशिष्ट स्थितिमें रखनेकी क्रियाको मुद्रा कहा गया है। प्राणायाममें उत्तम सिद्धि प्राप्त करनेमें इन मुद्राओंकी आवश्यकता कही गयी है। साथ साथ धार्मिक विधि विधानोंके समय अवयवोंका विशिष्ट आकारमें रखना भी मुद्रा कहलाता है। मुद्रा शब्द मुद् आनंदित करना इस धातुसे बना है। ऐसा माना जाता है कि ये मुद्रायें १०८ हैं किंतु ये सब प्रचलित नहीं है। योग-संहिताओंमें सिंहमुद्रा, ब्रह्ममुद्रा, शांभवी मुद्रा, योगमुद्रा, काकीमुद्रा, महामुद्रा, षण्मुखीमुद्रा, अश्विनीमुद्रा, शक्तिचालन, खेचरी, भूचरी, चाचरी, अगोचरी आदि मुद्रायें प्रचलित हैं। योग-साधनामें इनका बड़ा महत्व कहा गया है। मूलबंध—अपानवायुको ऊर्ध्वमुख करके प्राण वायुके साथ मिलाना इसका उद्देश्य है। सिद्धासनमें बैठ करके बाईं पैरकी एड़ीसे सीवन दबाते हुए गुदद्वारका संकोच करके जहां तक हो सके गुदद्वारको ऊपर खींचना चाहिए जैसे घोडा मलोत्सर्गके बाद ऊपर खींचता है। इससे प्राण अपानका संयोग होकरके सुषुम्नामें प्राणकी गति तीव्र होनेमें बडी सहायता मिलती है। प्राणापानके संयोगसे नाभीके नीचे जो त्रिकोणाकृति-वैश्वानर अग्निमण्डल-अग्निस्थान है वहां अपानका प्रवेश होता है। तथा जठराग्नि प्रदीप्त होता है। साथ ही साथ इस अग्निके प्रदीप्त होनेसे, प्राणापानके साथ वैश्वानरके सुषुम्नामें प्रवेश होता है जिससे सुप्त कुंडलिनी जागृत होती है। प्राणापानका संयोग, अग्निस्थानका उदीपन, मलमूत्रका क्षय, सुप्तकुंडलिनीकी जागृति, अपानसिद्धि ये इस बंधके उद्देश्य हैं। मेरु पर्वत—पुराणोंमें स्थान स्थान पर मेरु पर्वतका उल्लेख आता है। यह स्वर्ग मृत्यु पाताल इन तीनों लोगोंका आधार है। यह विश्वके मध्यभागमें होनेका भी उल्लेख है। इसको स्वर्ण-पर्वत भी कहा गया है। इस पर्वतके अंतिम शिखरको स्वस्तिक कहा गया है। योग—अलग अलग लोगोंने अथवा व्यक्तियोंने इस शब्दका अलग अलग अर्थ किया है। जैसे गीतामें-योगको "कर्म कुशलता" कहा है। "आत्म-बुद्धिसे साम्य-दर्शनको योग" कहा है। पतंजलने "चित्तवृत्तिके निरोधको ही योग" कहा है तो योग शब्दका धात्वर्थ "जुडना" है। किंतु साधनाकी दृष्टिसे साधक अपनी अभ्याम्यशक्तियोंके सहारे आत्मदर्शन कर सकता है और इन भिन्न भिन्न पद्धतियोंके कारण अनेक प्रकारके अलग अलग योग कहलाते हैं। जैसे (१) प्राण- शक्तिके निरोध द्वारा शरीर और प्राण शुद्ध करके तद्द्वारा आत्मसाक्षात्कार करना हठयोग अथवा प्राणयोग कहलाता है। (२) क्रिया शक्ति-द्वारा निष्काम कर्मकरके आत्मानुभूति करना कर्मयोग १८५ परिशिष्ट ५ (13)