ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें" छूटती हृदय-ग्रंथी मिटते सब संशय " कठोपनिषदमें एक स्थान पर इस " आवरण " अथवा " गांठको " अध्रुव अर्थात् अनिश्चित, असत्य, बदलने वाली, आदि कहा गया है । इस आवरणको " असत्य " कहा है । यह कहते समय अनेक उपनिषदोंमें अनेक उपमायें दी हैं । किंतु श्वेताश्वतरमें स्पष्ट रूपसे " माया " शब्द आया है । यहां पर " सतत ईश्वर चिंतनसे ईश्वरसे एकरूप होनेके बाद यह " माया " नहीं रहती ऐसा कहा गया है । वैसे ही ऋग्वेदकी " मायासे दीखता ईश आप विविध रूपसे " इस बातको पुन: बृहदारण्यक उपनिषदने भी कहा है । इतना विवेचन करने पर यह कहना आवश्यक नहीं रहता कि माया अथवा मायावाद आद्य शंकराचार्यके प्रतिभा संपन्न मस्तिष्ककी उपज नहीं है । गीतामें भी ईश्वर सबके हृदयमें बैठकर-यांत्रिककी भांति-सभी प्राणिमात्रको संसार चक्र पर घुमाता है । " ईश्वरी मायासे लोगोंका तत्त्वभाव नष्ट होकर वे आसुरी योनिमें जाते हैं !" उपनिषदका तथा गीताकी इन सब बातोंको लेकर गौड-पादाचार्यने " जगत एक दृश्य और आभास है" ऐसा कहा । इतना ही नहीं अपितु " जगत निर्माण ही नहीं हुवा !" ऐसा भी कह दिया । भारतीय तत्त्व- ज्ञानमें इसको अजात वाद कहते हैं। "विश्व है" ऐसा न मान कर विश्वका अस्तित्व ही अस्वी- कार करनेसे इसके आवरणमें वह न दीखनेका प्रश्न ही नहीं रहता । इससे "द्वैत केवलं माया है अद्वैत ही सत्य है !" यह बात भी मिट जाती है। जगतके विषयमें कहते समय गौडपादाचार्य कहते हैं "कुछ लोग कहते हैं विश्व ईश्वरकी महिमा है तो और कुछ लोग कहते हैं यह ईश्वरी कृति है; कुछ लोगोंके मतसे यह एक स्वप्न है तो कुछ लोगोंके मतसे यह भास है। कुछ लोग इसे ईश्वरकी इच्छा मानते हैं तो कुछ लोग ईश्वरकी भोग्य-वस्तु मानते हैं । कुछ लोग उसे ईश्वरकी लीला कहते हैं तो कुछ ईश्वरका स्वभाव मानते हैं । इन सब मतोंके विरुद्ध, जगत निर्माण ही नहीं हुवा ऐसे माननेवालोंकी बात ही सही है !!" गौडपादाचार्य और एक स्थान पर कहते हैं " जहां बोलना समाप्त होता है, सभी चिंताएं समाप्त होती हैं, तथा शांति और चिरंतन सत्य प्राप्त होता है वही परमश्रेष्ठ समाधि है । जगत सत्य है, यही जिनको सच्चा लगता है, तथा जिनको नीतिमार्गसे जाना अपरिहार्य लगता है, चाहे तो उन लोगोंके लिये प्राचीन ऋषियोंने जगत निर्माण हुवा है ऐसे माननेका सुझाव दिया है !" इस प्रकार गौडपादाचार्यने "तत्त्वज्ञानकी दृष्टिसे " जगत निर्माण हुवा ही नहीं यह मानकर भी "नैतिक दृष्टिसे अथवा ईश्वर प्राप्तिके प्रयत्न सफल हो इस लिये " जगतका सत्यत्व स्वीकार किया है। और आद्यशंकराचार्यने उपनिषद और गौडपादाचार्यसे ली गयी सभी कल्पना- ओंके आधारसे अपने मायावादका ताना बाना बुना है। वे कहते हैं "सदसद् निर्वाचा स्वरूप-माया अनिर्वचनीय है क्यों कि वह न तो सत् हैं न असत् । वह तो एकका दूसरे पर आरोप है जैसे रस्सी पर सांपका आरोप है । सीप पर चांदीका भास है ।" " अपने मनस्थितिके अनुसार आकाशमें भी मलिनत्वके भावकी कल्पना होती है !" इसलिये शंकराचार्यके मतसे मायाका अर्थ "यह जगत केवल इंद्रियजन्य भास है जैसे मृगमरीचिका !" अर्थात् शंकराचार्यके मतसे " मायाका अर्थ ब्रह्मके अधिष्ठान पर प्रतीत होनेवाला जगतका भास है !" शंकराचार्यने "जगत एक कल्पना है।" "जगत एक शून्य है !" कहनेवालों पर अत्यंत कठोर प्रहार किये हैं। शंकराचार्यके मतसे " केवल इंद्रियोंकी दृष्टिसे-सिद्धांततः अथवा तत्त्वतः या परमश्रेष्ठ सत्यकी दृष्टिसे नहीं-जगतकी सत्यता स्वीकार है !!" जगतकी ओर देखनेकी शंकराचार्यकी पारमार्थिक तथा व्यावहारिक दृष्टि भिन्न है । १८४ परिशिष्ट ५