ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानमयकोश—आकाशादि पंचमहाभूतोंकी सामूहिक सात्विक अंशोंसे निश्चया- त्मक अंतःकरणकी बुद्धि शक्ति, संकल्प विकल्पात्मक मनःशक्ति, अनुसंधानात्मक अंतःकरणकी चित्तशक्ति, अभिमानात्मक अंतःकरणकी अहंशक्ति तथा पांच ज्ञानेंद्रियोंसे सम्मिलित तत्त्वसे विज्ञानमय कोश बनता है जो चैतन्यपर आवरण डालता है । विज्ञानमय कोशसे घिरा हुवा चैतन्य “जीव” कहलाता है। यही लोक परलोक भोगता है। चैतन्यके प्रतिबिंबसे विज्ञानमय कोशमें जो क्रियायें होतीं हैं इसीसे जीव कर्ता, भोक्ता, सुखी, दुःखी आदिका अनुभव करता है। यही संसारमें रहकर भोगता और जन्म मरणका अनुभव करता है। यही जीवकी बद्धावस्था है। नहीं तो चैतन्य सदैव मुक्त है। निःष्कल और निष्क्रिय है। आनंदमयकोश—ईश्वरने अपनी लीलाके लिये-खेलके लिये-बिना किसी प्रयोजनके सृष्टि- रचना की है। इस समस्त विश्वका “कारण शरीर” ईश्वर है। इस कारण अवस्थामें माया और ब्रह्मके अलावा दूसरा कोई प्रपंच नहीं रहता इसीलिये यह आनंदमय अवस्था है। आनंदमय अवस्थाका यह “कारण शरीर” व्यक्ति देहमें चैतन्यको घेरा रहता है इसको आनंदमय कोश कहते हैं। जब सारा प्रपंच लय होता है तब चैतन्य इसी कोशमें शांत रहता है। इसीलिये इसको सुषुप्ति भी कहते हैं। इस सुषुप्ति अवस्थामें केवल आनंद रहता है। मन, इंद्रियां, इंद्रियोंके विषय आदि नहीं होते। इस समय, स्थूल तथा सूक्ष्म शरीरका लय होता है और केवल चैतन्य आनंदमय अवस्थामें रहता है। पंचतत्त्व-या पंचमहाभूत—पृथ्वी, आप, तेज, वायू और आकाश इनको पंचतत्त्व अथवा पंचमहाभूत कहते हैं। इसीसे सारी भौतिक सृष्टि बनी है। प्रत्येक भौतिक पदार्थमें इन पंच तत्त्वोंमेंसे प्रत्येक तत्त्वका अंश रहता है। चार्वाकदर्शन चार तत्त्व मानता है। वह आकाश तत्त्वको नहीं मानता। क्यों कि वह इंद्रियगम्य नहीं है। सांख्यमतसे अहंकारके तामसिक अंशसे शब्द तन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा तथा गंधतन्मात्राएं बनी। अहंकारका तामस इन सबमें अलग अलग समान रूपसे विद्यमान है किंतु ये आपसमें मिले हुए नहीं है। इसीलिये इनसे होनेवाली सृष्टि भी अलग अलग है। शब्द तन्मात्रासे आकाशकी सृष्टि हुई। स्पर्शसे वायू, रूपसे तेजस् रससे जल तथा गंधसे पृथ्विकी सृष्टि हुई है। ये भूतसृष्टि-रचनाके स्थूलतम पदार्थ हैं। अर्थात् शब्दादि सूक्ष्म तत्त्व या भूत हैं जिससे पृथिव्यादि स्थूल तत्त्वोंकी सृष्टि हुई है। न्याय और वैशेषिक मतके अनुसार आकाश नित्य और व्यापक है। पृथ्वी—पंच महाभूतोंमें अथवा पंचतत्त्वोंमें पहला तत्व । शब्दार्थकी दृष्टिसे “जिसका विस्तार होता जाता है” ऐसा इसका अर्थ है। इसका वर्णन करते समय कहा गया हैं “गंध इसका गुण है। इसमें छ प्रकारका रस हैं। यह नित्य और अनित्य दो प्रकारकी हैं। इसका “अणुरूप नित्य” है। अन्य रूप अनित्य । शरीर, इंद्रिय तथा उसके विषय ये पृथ्वीके तीन रूप हैं। चार प्रकारके प्राणि इसके शरीर हैं। प्राण इसके इंद्रिय रूप हैं। अणुसे ब्रह्मांड तक सब इसके विषयोंका रूप हैं। ब्राह्मण ग्रंथोंमें पृथ्वी को “सर्व-भूतोंमें प्रथम जन्म पानेवाली” ऐसा कहा गया हैं। कहा गया हैं कि पहले इसे “वायु उडा ले जाता था!” “प्रजापतिने तपसे इसके फेन, सूखी मिट्टी, पत्थर, बालू, मोटी बालू-कंकड-शिलाखंड मोठे पत्थर लोहा सोना और औषधी ऐसे नौ प्रकार बनाये। ज्ञानेश्वरी ३६०