ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंऋग्वेदमें पृथ्वीकी प्रार्थना करनेवाले कई सूक्त हैं। उनमें "पृथ्वी तू हमसे प्रसन्न हो । तू किसीका अहित नहीं करती । अपनी गोदमें तू सबको समा लेती है । तू हमको सुख दे !" इस प्रकारकी प्रार्थनाए हैं। शतपथ ब्राह्मणमें पृथ्वीको "अग्निगर्भा" कहा गया है । उसमें कहा गया है कि माता जैसे संतानको अपने गर्भमें धारण करती है वैसे पृथ्वीने अग्निको अपने गर्भमें धारण किया है ! पृथ्वीका वर्णन करते समय शतपथ ब्राह्मणमें "पृथ्वी परिमंडल रूप-गोल-अपने ही चारों ओर घूमने वाली वातावरण धारण करनेवाली है !" ऐसे भी कहा गया है। इस पृथ्वीकी उत्पत्तिकी अनेक कथाएं अलग अलग पुराणग्रंथोंमें तथा ब्राह्मण ग्रंथोंमें हैं। पृथ्वीके रूपका वर्णन करते समय पृथ्वी मंडलके चारों ओर बना जल है उसके चारों ओर घनी उष्णता-तेजस्-है तथा चारो ओरसे ऊपरकी ओर बहनेवाला-ऊर्ध्व-टेढा वायु है ऐसे कहा गया है। आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टिसे पृथ्वी सूर्य-मंडलमें घूमनेवाला तीसरा ग्रह है। चंद्र पृथ्वीका उपग्रह है । चंद्रके प्रभावसे पृथ्वीपर समुद्रमें तूफान आता है। पृथ्वी नारंगी जैसे गोल है। पृथ्वी पर जो असमानता है-नीचे ऊपर-वह नहींके बराबर ही मानना चाहिए । पृथ्वी पर जो ऊंचा भाग है वह २९ हजार फूट ऊंचा है, वैसे ही गढ़ा-घाटी-करीब ३६।।-हजार फूट है। इसका विस्तार १९ करोड ७० लाख वर्ग मील है। इसमेंसे ७०-७१ प्रतिशत भाग पानीमें है। स्थलमंडल, जलमंडल तथा वायुमंडल इन तीन मंडलोंसे यह बनी है। वायुमंडल, स्थलमंडल और जलमंडलको घिरा हुआ है। इस वायुमंडलमें ९९ प्रतिशत नाइट्रोजन और १ प्रतिशत प्राणवायू है। पृथ्वीकी आयुके विषयमें वैज्ञानिकोंमें जो अनेक मतभेद हैं उस परसे कह सकते हैं कि इसकी आयू १८० करोड वर्षोंसे ३०० करोड वर्षकी है। पुराणोंके मतसे इसकी आयू करीब २२० करोड वर्षकी है। प्राचीन भारतीय संस्कृतिमें-सिंधुसंस्कृतिमें-पृथ्वीकी पूजा होती थी। पता नहीं कबसे पृथ्वी-पूजा रुक गयी है। अथर्ववेदमें कहा गया "ऋत, सत्य, उग्रक्षात्रतेज, दीक्षा, तप, तथा ज्ञान इस पृथ्वीको धारण करते हैं। यह भूत भविष्यका पालन करनेवाली है। पृथ्वी हमें विशाल कार्य-क्षेत्र दें।" अथर्वऋषि "पृथ्वीको माता और मानवको उसका पुत्र" मानते हैं। वे गाते हैं पृथ्वीमें अमृत भरा है। वह विश्वंभरा है। जो ज्ञानी है, जिसके पास वाक्शक्ति है, वही=पृथ्वीका हृदय जानता है। ऐसे ही मनुष्यके सम्मुख वह अपना अमररूप प्रकट करती है। पृथ्वीकी उपासना करनेसे मनुष्यको अनेक वरदान मिलेंगे। उसमेंसे अनेक प्रकारकी वीर्यवान् औषधियां उत्पन्न होती हैं जो मनुष्यको पुष्ट करती हैं। जिसका हृदय, प्रेम, सत्य और अमृतसे भरा है। वह पृथ्वी हमारे राष्ट्रको और हमको बल और तेज दें!" आप-ऋग्वेदमें "माता जैसी क्षम्य देती है वैसी उत्तम नीर देनेवाले" आपो देवताका वर्णन है। उसके बाद उपनिषदोंमें विश्वरचनाकी बात कहते समय तज्जलान् कहते हुए जलसे पृथ्वीका निर्माण हुआ ऐसा कहा गया है। सभी शास्त्र और पुराणोंमें "पृथ्वी जलसे उत्पन्न हुई" कहते हुए "यह जलमें ही डूब जायेगी !" कहा है। इसे प्रलय कहते हैं। किंतु आगे यह जल वायुसे सूख जाता है वायु आकाशमें लीन होता है ऐसा प्रलयका वर्णन आता है। न्यायदर्शनमें १६१ परिशिष्ट ५