ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमनोमयकोश (४) विज्ञानमयकोश (५) तथा आनंदमयकोश । कोशका अर्थ आवरण है । थैला है । जीव इस थैलेसे लिपटा गया है। इसका वर्णन करते समय कहा गया है कि माता पिताके द्वारा लाये गये अन्नसे जो रज वीर्य बनता है उससे मानवी देह बनता है और वह अन्न पर ही जीता है इसलिये वह अन्नमय कोश है । यह आत्मासे भिन्न है क्यों देहकी उत्पत्ति होनेके पूर्व और मृत्युके बाद उसका अभाव होता है। संपूर्ण देहको बल देनेवाला, इंद्रियोंको प्रेरणादेनेवाला जो व्यान- नामका प्राण है वही प्राणमयकोश है। देहको मैं कहनेवाला अहंता ममतादिसे भ्रांत होनेवाला वह मनोमयकोश है । चैतन्याभाससे युक्त जो बुद्धि है जो सुप्तावस्थामें लय होकर जागृतावस्था शरीरमें व्याप्त रहती है वह विज्ञानमयकोश कहलाती है । सुखका अनुभव लेते समय अंतःकरणकी वृत्ति अंतर्मुख होती है । इस लिये अंतःकरणमें आत्मस्वरूपका प्रतिबिंब उठता है। वही वृत्ति पुण्यकर्मका फलभोग शांत होनेसे निद्रामें लीन होती है। इस अंतर्मुख वृत्तिका आनंदमय कोश बनता है । ये सभी कोश चैतन्य पर आवरण मात्र है। ये ही चैतन्य नहीं है। मृत्युके बाद जीव इन सभी कोशोंको पार करता है । जीव अन्नमय कोशको त्याग कर प्राणमय कोशमें, प्राणमयकोशको त्याग कर मनोमय कोशसे प्रज्ञालोकमें विचरण करता है। फिर वह मनोमय कोशको भी छोड़कर अपने जीवलोकमें जाकर पुनः जन्म लेनेके लिये आवश्यक वातावरण तथा शरीरादिको एकत्र करने लगता है । इसीसे पुनर्जन्मके लिये आवश्यक परिस्थिति निर्माण होती है । अन्नमयकोश—पंचकोशमेंसे एक कोश । शरीर पंचभूतोंसे बना है । पंचभूतोंसे बने शरीरके प्रत्येक अंश शरीरपातके बाद अपने मूलरूपको पाता है । इस स्थूल शरीरको अन्नमय कोश कहा गया है । क्यों कि अन्नसे इसका पोषण होता है। जागृतावस्थामें जीव इस कोशमें रहता है । यह स्थूल शरीर चार प्रकारके होते हैं । बीज और मिट्टीसे पैदा होनेवाले-वृक्ष लतादि- उद्बीज कहलाते हैं। पसीने गर्मी ठंडीसे निकले हुए जीव मसक जूं, आदि वैसे ही अंडोंसे निकलनेवाले परिंद, साप आदि अंडज कहलाते हैं । और जारज जैसे मनुष्य पशु आदि । ये चारों प्रकारके स्थूलशरीर अन्न पर आश्रित हैं इसलिये इसे अन्नमय कोश कहा गया है । प्राणमयकोश—पांच कर्मेंद्रियोंके साथ पांच प्राणोके संयोगसे जो एक वलयसा बन जाता है वह प्राणमयकोश कहलाता है । यह कोश चैतन्यपर आवरण डालता है। इस प्राणमयकोशमें क्रियाशक्तिका प्राधान्य है । यह क्रियाशक्ति कार्यके रूपमें हमारे सम्मुख उपस्थित होती है । हमारी सारी क्रियायें अथवा कर्म इसी क्रिया शक्तिका परिणाम है । मनोमयकोश—जैसे कर्मेंद्रिय और पंचप्राणोंको मिला कर प्राणमयकोश निर्माण होता है वैसे पांच ज्ञानेंद्रिय और मनको मिला कर मनोमयकोश निर्माण होता है । यह कोश प्राणमय कोशसे अधिक सूक्ष्म होता है । अधिक चैतन्यशाली होता है । मनुष्यके सारे संकल्प विकल्प इसी कोश पर आधारित होते हैं। आकाशादि भूतोंमेंसे प्रत्येकमें तीन गुण होते हैं। उनमें जो सात्विक अंश होता है उस सात्विक अंशसे ज्ञानेंद्रिय बनती है । जैसे आकाशके सात्विक अंशसे कान बनते हैं। शब्द उसका विषय है । वायुके सात्विक अंशसे त्वक् बनती है जिसका विषय स्पर्श है । तेजसके सात्विक अंशसे चक्षु है रूप इनका विषय है । आपके सात्विक अंशसे रसना बनती है । रस इसका विषय है। और पृथ्वीके सात्विक अंशसे घ्राणेंद्रिय बनती है जिसका विषय गंध है । इन सबका मनसे संयोग होकर जो वलय बनता है वह मनोमय कोश है १५९ परिशिष्ट ५