भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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पृष्ठ 1104, कुल 1172 में से

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बिना कानके सब कुछ सुननेवाला, बिना पैरके सबके आगे दौड़नेवाला, खड़े खड़े दौड़नेवालोंसे भी आगे पहुंचने वाला ब्रह्म विश्वतश्चक्षु, विश्वतोमुख, विश्वतो बाहु और विश्वतो पाद् हुआ !" "यह नहीं वह नहीं" (नेति नेति) वाला परब्रह्म "यही यही" सर्वव्यापी हो गया । अणारमक परब्रह्म अनात्मक ईश्वर बनकर ध्यान धारणा चिंतन मननका साधन बना । इसलिये सगुण निर्गुण दो भेद चल पड़े । उपासनाके भी सगुणोपासना और निर्गुणोपासना ऐसे भेद हुए । उपासकके स्वभावानुसार अथवा सामर्थ्यानुसार उसके अनेक रूप बने । सगुण प्रारंभ है और निर्गुण अंतिम स्थान । इसलिये सबने सगुणका पुरस्कार किया । चलने लगे तो मंजिल पर पहुंच ही जायेंगे । जितना जल्द चालसे चले उतना जल्दी । सगुण उपासना, जहांसे चलना है वह स्थान है और निर्गुण जहां पहुंचना है वह स्थान । चलना छोड़ कर पहुंचना असंभव । इसलिये चिंतन, मनन, ध्यान भक्ति आदिका पहला कदम सगुणोपासना है जो सभी आचार्य और संतोंद्वारा इतना ही नहीं उपनिषदोंके ऋषियों द्वारा भी पुरस्कृत है । निवृत्ति—जीवनके दो अंग हैं । अभ्युदय-निःश्रेयस, प्रेय-श्रेय, प्रवृत्ति-निवृत्ति । अभ्युदय, प्रेय तथा प्रवृत्ति वासना पूर्तिजन्य सुख प्राप्तिकी साधना है । प्रापंचिक वैभवकी साधना है । और निवृत्ति श्रेय तथा निःश्रेयस वासना-विलोपजन्य सुखकी साधना । वासनाका अस्तित्व ही दुःख है और वासनाका अभाव ही सुख । दुःखके कारणीभूत वासनाका लय करना शाश्वत तथा निरालंब सुखका मूल होनेसे वासना विलयके लिये निवृत्तिमार्ग कहा गया है । निवृत्तिमार्गमें सबसे प्रथम मनसे बाह्य इंद्रियोंके व्यापार संयमित किये जाते हैं । इंद्रियोंको निरपेक्ष किया जाता है । फिर मनको संपूर्ण रूपसे बुद्धिमैं लीन करके मनोलय किया जाता है । उसके बाद बुद्धिको पूर्णरूपसे आत्मलीन किया जाता है । बुद्धिके आत्मलीन होनेके बाद आत्माकी सर्व-व्यापकताका पूर्णत्वका अनुभव होने लगता है । अपूर्णताके अनुभवसे वासनाका जो उदय होता है वह पूर्णत्वके अनुभवसे नष्ट होता है । यह वासना विलयजन्य सुख ही शाश्वत सुख है । निरालंब सुख है । अपनेमें आपनेसे आप अनुभव किया जानेवाला सुख है । इस लिये निवृत्ति जन्य सुख सर्वश्रेष्ठ सुख माना गया है । यही जीवकी जीवन्मुक्तावस्था है । निष्काम कर्म—वासना रहित कर्म । जिस कर्ममें कर्म फलकी कोई आशा नहीं वैसा कर्म । मानवी मन अनेक वासनाओंसे भरा रहता है । वासनाओंका खेल अतर्क्य होता है । बिना वासनाके कोई फल भोग नहीं होता । वैसे ही कोई भी कर्म-फल आकस्मिक नहीं होता । पूर्व जन्मकी फलवासनाओंसे पुनर्जन्म मिलता है । जैसे मनुष्य होकर भी बार बार पशुयोनिके अनु- सार कर्म करनेसे उन्हीं वासनाओंके परिणामस्वरूप मनुष्य पशु-योनिमें जाता है । इसीलिये वासना रहित कर्मका महत्व कहा गया है । गीतामें निष्काम कर्मका बड़ा महत्व गाया गया है । वासनाएं अनादि कालसे जन्मजन्मांतरसे-चली आती हैं । योग वासना विलोपकी साधना है । कर्म करते समय फलाशासे कर्म करना तथा कृष्णार्पण भावसे कर्म करना वासना विलोपकी साधना है । वासना विलोपसे-वासनाके अभावमें-शाश्वत सुखका अनुभव होता है तथा ऐसे किया हुवा कर्म पुनः वासनाको जन्म नहीं देता जैसे जला हुवा बीज नहीं फलता । पंचकोश—मनुष्य, पंचतत्त्व, पंचकोश, पंचप्राण, पांच शक्तियां, पांच ज्ञानेंद्रियां, पांच कर्मेंद्रियां आदिसे बना है । उनमेंसे पांच कोश हैं ( १ ) अन्नमयकोश ( २ ) प्राणमयकोश ( ३ ) ज्ञानेश्वरी १५८

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