ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(३-४) तप और स्वाध्याय, समाधिके अभ्यासके लिये आवश्यक अभ्यासमें अवरोध करनेवाले क्लेशादि विकार तप स्वाध्यायसे दूर होते हैं। इन अवरोधोंसे जो चित्त पुनः पुनः बहिर्मुख होता है उसको अंतर्मुख करनेमें सहायता मिलती है। चित्तके पुनः पुनः बहिर्मुख होनेसे इंद्रियां विषयोंकी ओर खिंचती हैं और चित्त चंचल होता है। इससे अविद्या, क्लेश आदि बढ़ते हैं। अर्थात् चित्तको सदैव प्रसन्न रखनेके लिये, चित्तकी बहिर्मुख होनेकी प्रवृत्ति रोकनेके लिये, तप तथा स्वाध्यायकी आवश्यकता है। इसमें तपसे मनका मालिन्य नष्ट होता है और स्वाध्याय (सद्ग्रंथोंका पठन और जपादि नामस्मरण) से सत्त्व गुणकी वृद्धि होती है। और (५) इनसे भी जो शुभाशुभ संस्कार बचे रहते हैं उनको ईश्वरार्पण करनेसे अविद्यामूलक अहंता ममतादि भाव नष्ट होकर चित्तप्रसन्नताकी स्थिति सहज होती है। निर्गुण-सगुण उपासना—इस सृष्टिकी उत्पत्ति होनेके पहले एक ही एक आत्मतत्व विद्यमान था। उसको आगे अनेक होनेकी इच्छा हुई। परिणाम स्वरूप यह विविध-रूप सृष्टि हुई। यह वेदांतका प्रसिद्ध और प्रमुख सिद्धांत है। इस सृष्टिके पहले जो एक ही एक आत्म-तत्व था वह अव्यक्त था। निर्गुण था। वह एक ही एक आत्मतत्व अनादि, अनंत, सीमातीत और सर्वव्यापी है। वह निरंतर है। अखंड है। स्वतंत्र और सर्वज्ञ है। वही सृष्टिकी उत्पत्ति स्थिति और लयका कारण है। यह सारी सृष्टि उसीमेंसे निर्माण हो कर उसीमें लय होती है। जिससे यह सारी सृष्टि उत्पन्न होकर उसीमें लय होती है उसे ब्रह्म कहा गया है। उस निर्गुण ब्रह्मसे यह सगुण सृष्टि उत्पन्न हुई है। उपासनाका अर्थ पास जा बैठना। चिंतन, मनन, स्मरण, ध्यान आदिके द्वारा परमात्माके पास जाना, वहीं स्थिर रहना आदिके लिये कोई साधन लगता है। किसी रूपकी आवश्यकता होती है। कोई आधार चाहिए। बिना इसके चिंतन मननादिकी क्रिया ठीक नहीं होती। यह जानकर इस विद्याके आचार्योंने अव्यक्तकी उपासनाके लिये व्यक्त अथवा सगुणकी कल्पना की। परमारथमें कल्पित ये सब गुण उपासककी योग्यतानुसार कम अधिक प्रमाणमें सात्विक होते हैं। उपनिषदमें भी ऐसे कई सगुण वर्णन किये हैं। "वह परमात्मा उत्तम पुरुष है।" "वह सभी भूतोंका अधिपति है!" "वह विश्वकी आंखें विश्वका मुख, विश्वके बाहू और विश्वके पैर है।" ये सारे विविध रूप उपासनाके लिये विविध प्रतीक हैं। वस्तुतः वे गौण हैं। परब्रह्म सगुण नहीं है। वह दर्शन श्रवण स्पर्शादिकी सीमाओंमें आनेवाला नहीं है। वह सच्चिदानंद स्वरूप है। किंतु वह नेति नेति परब्रह्म उपासनाके लिये इति इति हुआ। उपासनाके लिये प्रथम सगुण, फिर सगुण-निर्गुण उसके बाद संपूर्ण निर्गुण ऐसी व्यवस्था है। यह गुणोंसे निर्गुणों की ओर जानेकी प्रक्रिया है। इस विश्वके अलग अलग वस्तुओंके भिन्न भिन्न रूप ही उनका दिया हुआ भिन्न भिन्न नाम है। यह सारा विश्व नामरूपात्मक है। ये सब हर क्षण बदलते रहते हैं किंतु इन सबके मूलमें कभी न बदलनेवाला तत्त्व रहता है। वही तत्त्व सत्य है। इस सत्यके अथवा परमात्माके दो रूप हैं। एक इंद्रियोंसे समझे आकलन है। इसको व्यक्त अथवा सगुण कहते हैं। दूसरा इंद्रियां ही नहीं मन और बुद्धि भी आकलन नहीं कर सकती। उसे अव्यक्त अथवा निर्गुण कहते हैं। उपासनाके लिये जो चिंतन, मनन, ध्यान आदि करना पड़ता है जिसकी भक्ति करनी पड़ती है वह अनाकलनीय होके कैसे चलेगा? इसलिये "वह बिना आंखसे सब कुछ देखनेवाला, १५७ परिशिष्ट ५