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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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इनको छोड़ कर कुछ नैमित्तिक कर्म भी होते हैं। ये काम्य और निष्काम ऐसे दो प्रकारके होते हैं । समय समय पर यज्ञादि करना । किसी उद्देश्यसे यज्ञ, व्रत, शांति आदि करना काम्य नैमित्तिक कर्म हैं और श्राद्ध, ग्रहणमें स्नानादि निष्काम नैमित्तिक कर्म है। मनुष्यको अपने अपने अधिकारानुसार नैमित्तिक कर्म भी करना चाहिए । किंतु ये नहीं करनेसे पाप नहीं है। निद्रा—इस शब्दका अर्थ कहते समय पुराने ग्रंथोंमें मेध्या नामकी नाडी तथा मनका संबंध आनेसे निद्रावस्था आती है ऐसा लिखा है । उपनिषदोंमें स्थान स्थान पर जो निद्राकी व्याख्या की है वह आधुनिक शरीर शास्त्रके श्रमवादसे सम्मत ही है । "जैसे गीध पंख खोल कर आकाशमें उड़ते उड़ते थक जाता है तब विश्रांतिके लिये अपने घोसलेमें आता है वैसे थका हुवा जीव नींदका आश्रय करता है।" "सभी इंद्रियां मनमें जब लय होती हैं तब नींद आती है !" "मन प्रकाश सागरमें डूब जानेसे नींद आती है।" "जब मनुष्यको गहरी नींद आती है तब स्वप्न नहीं पडते तब आत्मा अपनी नाडीमें लीन होता है !" प्राचीन ऋषियोंकी मान्यताके अनुसार मनुष्यके शरीरमें पुरीतत नाडीकी ओर बहनेवाली ७२००० रक्तनलिकाएँ हैं। जीव जब इन रक्तनलिकाओंसे पुरीतत नाडीमें आता है तब मनुष्यको नींद आती है। जीव जब इस नाडीमें प्रवेश करता है तथा इस नाडीसे बाहर आने लगता है वह स्वप्नावस्था है। तथा जब जीव हृदय और पुरीतत नाडीमें भ्रमण करता रहता है वह जागृतावस्था है। छांदोग्य उपनिषदमें ऐसा भी कहा गया है कि "मन जब श्वासोच्छ्वासमें लीन होता है तब नींद आती है। इंद्रियोंको निद्रासे विश्रांति मिलती है क्यों कि निद्रामें इंद्रियोंको विषयोंका भान नहीं रहता । निद्राको मृत्युका छोटा भाई माना गया है। निद्रा लघु मृत्यु है और मृत्यु दीर्घ-निद्रा ! नियम—यह अष्टांग-योगका दूसरा अंग है । (१) शौच (२) संतोष (३) तप (४) स्वाध्याय (५) ईश्वरप्रणिधान ये नियम हैं । (१) शरीर और मन स्वच्छ रखना शौच है । शरीर अथवा मन यदि अस्वच्छ होगा तो चित्तवृत्तियोंका निरोध नहीं होगा । मन एकाग्र नहीं होगा। इसलिये साधकको स्नान आदिसे शरीर स्वच्छ रखना चाहिए । सभी मलद्वार स्वच्छ रखने चाहिए। सभी इंद्रिय स्वच्छ रखने चाहिए । मलिन स्थान मलिन व्यक्ति आदिका संपर्क छोड़ना चाहिए । यह सब देश काल परिस्थितिका विचार करके करना चाहिए । शरीर शुद्धीका ही एक रोग न हो जावे । नहीं तो उपाय अपाय होगा। वैसे ही चित्तको रजतमसे दूर रखनेका प्रयास करना चाहिए। रज तम मूलक वृत्तियां मनको उद्विग्न करती हैं। मनमें काम क्रोध लोभ आदि विकारोंको पैदा करती हैं । सत्संग, सद्ग्रंथवाचन, तथा विवेकसे मनको शुद्ध रखना भी शौच है। (२) जिस समय जो मिलता है उसीसे जो हित हो सकता है वह कुशलता पूर्वक साध कर मनको प्रसन्न रखना संतोष है । अतृप्तिसे संताप और संतापसे उद्विग्नताकी परंपरा प्रारंभ होती हैं। रजके कारण उत्पन्न होनेवाली काम क्रोधादि उद्विग्नताएं, अथवा तमके कारण उठनेवाली आलस प्रमादादि वृत्तियोंसे मन मलिन होता है । इसलिय् हित मित आहार विहार, सत्संगति, सद्ग्रंथोंका अध्ययन आदिसे मनको प्रसन्न रखना चाहिए । मनकी यह प्रसन्नता ही संतोष है । संतोषसे चित्त आसानीसे एकाग्र होता हैं । ज्ञानेश्वरी १५६