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ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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सोना और उसके सुवर्ण-सी !! इसी शिवशक्तिका स्फुरण ही विश्व है। जैसे दो आँखें एक ही दृश्य देखती हैं, दो कान एक ही ध्वनि सुनते हैं, दो होंठ एकही शब्द बोलते हैं, दो पैर एकही गंतव्यकी ओर चलते हैं वैसे शिव-शक्ति ऐसे दो नामोंसे पहचाने जानेवाली तत्त्वकी क्रिया है ! यह विश्वचक्र शिव-शक्तिकी आत्मरति है। इसका अनुभव ही अमृतानुभव अथवा जीवन मुक्तावस्था है । इस अनुभवको अनुभवनेका साधन योग है। यह हठयोग है। राजयोग है। पूर्णयोग है। इस संप्रदायमें अपने तत्त्वज्ञानके साथ आचारधर्मका भी विचार किया है। इस संप्रदायका अपना ही नीतिशास्त्र है। यह गुरुमार्गी संप्रदाय है। गुरुवचन ही इसका शास्त्र है। गुरुको "सन्मार्ग दिखानेमें कुशल" माना गया है। इनका गुरु "न होनेकासा रहता है !" "वह पानीमें घुलेगये नमकका-सा" रहता है। वह "ज्ञानाज्ञानसे परे" रहता है! इस संप्रदायके विषयमें अनेक लोगोंने खोजपूर्ण अनेक ग्रंथ लिखे हैं किंतु ज्ञानेश्वरका "अनुभवामृत" अमृततम ग्रंथ है जिस पर अबतक ४५ लोगोंने टीका लिखी हैं! यह महान् ग्रंथ प्राचीन मराठीमें है। नास्तिक—जो, परलोक, उसका साधन, अदृष्ट, उसका साक्षीभूत ईश्वर, इन बातोंको नहीं मानता वह नास्तिक कहलाता है। पाणिनीने कहा है "जो परलोक नहीं मानता वह नास्तिक है।” मनूने “नास्तिक है वेद निंदक" ऐसा नास्तिक शब्दका अर्थ किया है। अर्थात् "जो वेदको नहीं मानता वह नास्तिक" कहनेसे "जैन बौद्ध, लोकायतमतके लोग नास्तिक" बनते हैं। "परलोक और मृत्युके बादकी व्यवस्था न माननेवाले नास्तिक" कहनेसे "चार्वाकानुयायी" नास्तिक कहलाते हैं। "ईश्वर न माननेवाले नास्तिक" कहनेसे “भौतिकवादी, संदेहवादी, प्रत्यक्षवादी आदि सब नास्तिक कहे जा सकते हैं। किंतु भारतीय दर्शनकी दृष्टिसे "वेदनिंदक ही" नास्तिक हैं। अनीश्वरवादी, सांख्य नास्तिक नहीं कहाते । वेदमें देवताओंको न माननेवालोंका उल्लेख है । देवता और ईश्वर एक होनेकी कल्पना उपनिषदमें देखनेको मिलती है। सांख्य तथा कर्मकांडी पूर्व मीमांसकोंको ईश्वरकी आवश्यकता नहीं लगती । भारतके कई दार्शनिकोंने अनेक उदाहरणोंसे यह सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है कि विश्व स्वाधिष्ठित है तथा वह अपनेमें पूर्ण है इस लिए ईश्वरकी कोई आवश्यकता नहीं है। वेदका प्रमाण न माननेवाले चार्वाक, जैन, बौद्ध आदि दार्श- निकोंको ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार नहीं है। चार्वाक कहता है । "ईश्वरका प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होता इसलिये उसका अस्तित्व नहीं है।” जैन कहते हैं “यह विश्व सृष्ट न होनेसे किसी सृष्टिकर्ताकी आवश्यकता नहीं" और बुद्ध कहते हैं “ईश्वर विषयक सभी प्रकारकी जिज्ञासावें व्यर्थ है !" उपनिषदोंके एक महान ऋषि "वेद प्रमाण न मानना एक महान पातक मानते हैं। गौतम उनको पतितोंमें गिनते हैं। इन सभी बातोंको ध्यानमें रख कर यही ठीक लगता है कि मनूका “वेद निंदक नास्तिक" सिद्धांत सही है ! नित्य-नैमित्तिक कर्म—वेदके विद्वानोंने उसके दो कांड कहे हैं। (१) कर्मकांड (२) ज्ञानकांड । कर्मकांडके दो प्रकारके कर्म हैं। (१) नित्यकर्म और (२) नैमित्तिककर्म । नित्यकर्म करना ही है। वह कर्म करनेसे कोई पुण्य नहीं है किंतु न करनेसे पाप अवश्य है। नित्यकर्म करनेसे अधिकसे अधिक चित्तशुद्धि होती है। जैसे ब्राह्मणके लिये, संध्या, गायत्रीजप, ब्रह्मयज्ञ, आदि नित्यकर्म हैं। दिनके आठ प्रहरोंमें प्रत्येक प्रहरको कोई न कोई नित्य कर्म है। जैसे प्रातः स्मरण, शौचादि विधि, स्वाध्याय, पंचमहायज्ञ, भोजन, अध्ययन, लोक-सेवाकार्य ऐसे ये सब ब्राह्मणके नित्य कर्म हैं। यदि ये नित्य कर्म कोई नहीं करता है तो वह पाप-भागी बनता है। १५५ परिशिष्ट ५.