भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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निग्रही- निगमन करनेवाला। इंद्रिय, मन तथा प्राणका निरोध करनेवाला. निजजनाखिलमंगल- अपने भक्तोंका संपूर्ण कल्याण करनेवाला. निजजनमितभजनीय- नित्य अपने लोगोंकी ओरसे भजन किये जानेयोग्य. निजधाम- अपना स्थान, आत्मस्वरूप. निजनिर्झरसोमकांत-आप द्रवेनेवाला सोम- कांत मणि. निजसुख- आत्मसुख. नित्य- किसी न किसी रूपमें सदैव रहने- वाला. आत्मा, ईश्वर ब्रह्म, सदैव सतत. नित्यकर्म- रोज किया जानेवाला संध्यादि कर्म. नित्यतत्व-सतत रहनेवाला तत्व, आत्मा ब्रह्म नित्यपद- परमात्मपद. नित्ययुक्त-सतत परमात्मासे जुडा हुवा. नित्यनिस्तारखिलमल - जिसने सदा के लिये अपने सभी दोष निकाल दिये हैं, जो नित्यशुद्ध है. निदान-मूल कारण, परिणाम. निधान-आश्रय, आधार, निधि, कोष. निनाद-मूल मराठी शब्द, गूंजन. निबौंला-नीमका फल. निमिषोन्मिष-पलकोकी हलचल. नियतांतःकरण-संयमित-नियत-अंतःकरण. नियोजितवितंड-निश्चित प्रकारका मिथ्या वादविवाद, शाब्दिक तर्क या युक्तिवाद बातूनी कला. निरपेक्षालंकार-इच्छा रहितताके अलंकारसे सजा हुवा. निरवधि-अमर्याद. निराकार-बिना किसी खास आकाराका परमात्मा. ब्रह्म, आकाश शून्य. निरालंब-जिसे दूसरे किसीका आश्रय न हो, स्वयंसिद्ध. बाह्य साधना का आश्रय टूटा हुवा. सिद्ध. निरिच्छ-इच्छा रहित, कामना रहित. निरुपाधिक-उपाधिरहित, देहादि बाह्य प्रपंच रहित, संग रहित, अपने मूल रूपका. निरूपण-कहना, किसी पर विशेष प्रकाश डालना, किसीका विवेचन करना. निरोध-निग्रह, चित्त निरोधकी साधना. योग-साधना. निर्गुण-गुण रहित, गुणवर्जित, सत्त्वादि तीन गुणोंसे परेका. निर्भय-भय रहित, जिसमें भय का कारणभी न रहा हो. निर्मत्सर- मत्सररहित. दूसरोंका बिचार न करके अपना कर्तव्य करनेवाला. निर्मल- वासना रहित, काम-संकल्प रहित अंतर्बाह्य पवित्र, त्रिकरणशुद्ध, सात्विक चारित्र्यका, मत्सरादि दोष रहित, अर्जुन. निर्मोह- मोहरहित. वैषम्यभावरहित. अनिश्चिततामेंसे निकला हुवा, विवेकी, कार्याकार्य व्यस्थित जाननेवाला. निर्लिप्त- अलिप्त, लेप रहित, जैसेके वैसे रहनेवाला, परिवर्तनके परिणामसे रहित. निर्विकार- विकाररहित, जन्ममरणादि विकार रहित, कामक्रोधादि विकार रहित, कर्तृत्वादि विकार रहित, गुणजन्य विकार रहित, किसी भी विका- रोंसे रहित. निर्विकल्प- असंप्रज्ञात. बाह्य जगतका भान रहित, अहंकार-बीज रहित. समाधि स्थितिका अंतिम छो निर्विकल्प समाधि. इस स्थितिमें किसी भी प्रकारकी वासनाका बीज भी नहीं रहता. इसलिए इस अव- स्थाको 'निर्बीज' भी कहते हैं बीज ही नहीं रहा तब अंकुर कहां ?

ज्ञानेश्वरी २१०