भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

DevanagariMarathipublished1,172 पृष्ठ

पृष्ठ 1157, कुल 1172 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1157

निश्चिंत- चिंतारहित. संसारके विषयमें निश्चिंत, कर्म फलके विषयमें निश्चिंत, उदासीन. निष्काम- भोग वासना रहित. अन्य कामना रहित. फलेच्छा रहित, निरिच्छ. निःसंग- संगरहित, आसक्ति रहित, प्राप्त वस्तुके विषयमें स्नेह रहित, तथा अप्राप्य वस्तुके विषयमें कामना रहित. निःसीमागम्य- निःसीम+अगम्य, मर्यादा रहित, अनंत इसलिये अगम्य. समझकी सीमामें न आनेवाला. नीलोत्पल-नील कमल. नैष्कर्म्य- कर्मसमाप्तिकी अवस्था, अनंत कर्म करने पर भी न करनेकासा, रहना, न करनेकासा करना, कर्मके थकानसे मुक्ति ! प पगहा-गिरवाँ, पशुके गलेमें बांधा हुवा लकडीका लंबा टुकडा. पघा, असहायस्थिति. पंचक-पांचोंका समुदाय. अर्थ-पंचक, इंद्रिय पंचक (पांच ज्ञानेंद्रिय पांच कर्मेंद्रिय) शब्द स्पर्शादि विषय पंचक, पृथ्वी आप तेजादि भूतपंचक, आदि. पंचत्वलीन-मृत्यु. पंचम-सप्त स्वरोंमेंसे पांचवा स्वर, कोकिलाका स्वर. चांडाल. पंचानन-सिंह. पट-वस्त्र. पटीं-मूल मराठी ज्ञानेश्वरीके मराठी व्याक- रणको स्वीकार करके पट शब्दको ही " पटीं " सप्तमी विभक्ति बना करके " पटमें " ऐसा अर्थ लिया गया है. पण्यांगना-खरीदी गयी स्त्री, वेश्या, दासी. पद-मोक्षरूप, ब्रह्मपद, अक्षर ब्रह्म, प्राप्तव्य स्थान, साध्य. पदपिंडत्व-जीव-शिवत्व-आत्म-परमात्मत्व. पदबंध-विशिष्ट प्रकारकी शब्दरचना. पद्मकर-कमलसा हाथ. पर-वस्तु, ब्रह्म, उस पारका, दूसरी ओरका. परतत्त्व- परब्रह्म. परम- अंतिम, श्रेष्ठ, विश्वव्यापक, सर्वांतर्यामी. परमात्मतत्व- विश्वव्यापक आत्मतत्व. परमात्मा- सर्वव्यापक, सर्वांतर्यामी, चैतन्य स्वरूप, विश्ववाला, सर्वात्मक- सत्ता, तथा देहमें प्रतिबिंबित अंतरात्मा. परमेश्वर- सर्वश्रेष्ठ सर्वसत्ताधीश स्वामी. परा- उस ओरकी. पराकृति श्रेष्ठ- प्रकृति. परा भक्ति, श्रेष्ठभक्ति ज्ञानभक्ति. पराप्रमेयप्रमदाविलासिंया- परावाणीका विषय जो स्वरूपस्थिति है उस चिर तरुणीसे विलास करनेवाला. परिग्रह- व्यर्थ वस्तुओंका संग्रह. परिवार प्रपंच. परिणितोपरमॅकप्रिय- परिपक्व वैराग्य- वंतोंसे प्रेम रखनेवाला. परिमल- सुगंध. परिहार- उत्तर, निराकरण. पवित्र- पुण्यरूप, पावन करनेवाला. जहांके भाव, संस्कार, स्मरण आदि सभी पावन हों ऐसा अंतर्बाह्य शुद्ध. पसायदान-- प्रसाददान. पांडुरोगकी पुष्टि- पांडुरोग-रक्ताल्पता-में आनेवाली सूजन. पाणिग्रहण- हाथ थामना, करग्रहण, विवाह, अंतिम समय तक साथ देना. पातालव्याल- पातालका सर्प. पादज- पैरकी ओरसे जन्मनेवाला, भाग्यशाली. पाप- गीतामें अनेक प्रकारके पापोंका ३११ परिशिष्ट ६