ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउल्लेख है, स्वजन घातका पाप, पाप, पूर्वमीमांसा- कर्मकांड. पूर्व-मीमांसामें हीन विचारका पाप, स्वधर्म आचरण-धर्म है. दर्शन शास्त्रमें परित्यागका पाप, कर्तव्यच्युतिका ज्ञानका विचार करनेके प्रथम पाप, अपने लिये ही पकाकर अन्न कर्मकांड अथवा धर्मका विचार खानेका पाप, यज्ञ-रहित भोजनका करना आवश्यक माना जाता है. पाप, परधर्म स्वीकारका पाप, तभी वेदांतमें कहे गये आत्माका दुष्कर्मका पाप, पूर्वजन्मकृत पाप, विचार समझ सकते हैं. इसीलिये पापयोनि- पूर्वजन्मकृत पापका परिणाम. कर्मकांडको पूर्वमीमांसा तथा पापिष्ठ, पापी- अतिशय पाप करनेवाला. वेदांत विषयको उत्तरमीमांसा दुराचारी. परपीडक. कहा जाता है. जैमिनी इसका पारंगत- पार पहुंचा हुवा, निष्णात. मूल आचार्य है. बारह अध्या- पार्थिव- पृथिवी विषयक. योंमें जैमिनिने इसका विचार पारुष्य- कठोरता, कड़ापन. किया है इसलिये इस ग्रंथको पालनशीललालस- रक्षण करनेके स्वभाव "द्वादश-लक्षणी" कहा जाता है. वाला. पेरक- पेरनेवाला. पिंगलानल- पीला भूरा रंगवाला अग्नि. पोखरा- पुष्करणी, तालाब, सरोवर. पिनाकपाणि- शंकर. पौली- दक्षिणके मंदिरोंमें मंदिरके पिशाचोच्चाटन- पिशाचको अलग करना. चारों ओर बरामदा बनाकर किसीको लगे भूत वेतालादिको उसके एक ओर दीवार रहती उससे अलग करके भगाना. है, किसी बडे संतर्पणमें इसी पीनाकावयव- पुष्ट अवयववाला, पुष्ट- बरामदे पर बैठ कर भोजनादि शरीरवाला. किया जाता है, इन बरामदोंको पीयूष- अमृत. पौली कहा जाता है. पुण्य- सत्कार्य, सत्कार्य जन्य आनंद, प्रकृति- शरीर, माया, मूल स्थिति, मूल- यज्ञादि धर्मकृत्य तथा उसका फल, माया, कर्तृत्वकारण, त्रिगुणा- पुण्य-कर्मजन्य पावित्र्य, चित्त- त्मक, ब्रह्मकी सगुणावस्था, शुद्धि, शुभ-विचार, सत्त्वगुण, अवतार कारणार्थ ईश्वरीशक्ति, पुण्यकर्म- शुभकर्म, निष्काम-शुभकर्म, चित्त- जडाजड प्रकृति. शुद्धि, पाप-वासनासे निवृत्ति, भ्रम पुरुष- मनुष्य, ईश्वर, सर्वान्तर्यामी, ब्रह्म निरास, द्वंद्व-निरास, भक्तिमें द्वंद्वातीत सगुण-निर्गुणातीत-जीव, निष्ठा, ज्ञान-निष्ठा, क्षेत्र क्षेत्रज्ञ उपाधियुक्त, प्रकृतिपूरक, प्रकृतिसे ज्ञान, आत्मानारमज्ञान, आत्मा परे, निरुपाधिक क्षर-पुरुष,अक्षर- अगत तथा परमात्मा विषयक पुरुष, क्षराक्षर पुरुष, पुरुषोत्तम, ज्ञान, अधिभूतादिका विज्ञान, प्रकृति- शरीर, माया, मूल स्थिति, मूल- अंतकालीन साधना, ब्रह्मलीनता. माया, कर्तृत्वकारण, त्रिगुणात्मिका पुनरावर्तन- पुनर्जन्म, पुनः पीछे आना. ब्रह्मकी सगुणावस्था,अवतारार्थ पुलक- हर्षोन्मादसे आनेवाला रोमांच. ईश्वरीयशक्ती, जडाजडप्रकृति. प्रेमोद्वेगजन्य आनंद. उत्पत्ति, स्थिति, लयके कारणीभूत ज्ञानेश्वरी २१२