ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
पृष्ठ 1159, कुल 1172 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रकृति, ईश्वरी अवतारका काम, संकल्पादियुक्त जीव, प्रकृति ईश्वरकी विविध संकल्पमय निर्बीज प्रकृति पुरुषयुग्ममें पुरुषसे जुडी हुई प्रकृति प्रकृतिके अष्ट विकार- (१) प्रकृति (२) महत्तत्व (३) अहंकार (४) शब्द (५) स्पर्श (६) रूप (७) रस (८) गंध, भागवतमेंसे. (१) पृथ्वी (२) आप (३) तेज (४) वायु (५) आकाश (६) मन (७) बुद्धि (८) अहंकार गीता ज्ञानेश्वरी से. प्रक्षुब्ध- कुपित, क्रुद्ध, अधीर, भयभीत. प्रगल्भ- प्रतिभाशाली, उत्साही, साहसी, धीरजवाला, प्रवीण. प्रज्ञा- ईश्वरोन्मुख अथवा आत्मोन्मुख बुद्धि, आत्मसत्तात्मक ज्ञान जो इंद्रियोंद्वारा व्यक्त होता है. प्रतिभा- प्रतिबिंबित, अनुभव, प्रकाश, आत्मशक्तियुक्त प्रगल्भता. असाधारण मानसिक शक्ति, आत्मप्रतीतिजन्य बुद्धिप्रकाश नित्यनूतन मति अनुभव जन्य ज्ञानदीप्ति. प्रतिमल्ल- प्रतिद्वंद्वी मल्ल. प्रत्यग्बुद्धि- आत्मोन्मुखी बुद्धि, अंतर्मुख बुद्धि. प्रथा- परंपरागत व्यवहार. प्रभव- उत्पत्ति. प्रमा- यथार्थज्ञान, निश्चित ज्ञान, पूर्ण विवेक. प्रमाद्- भूल, असावधानता, वास्तविक ज्ञान पालेनेमें उदासीनता. प्रमेय प्रवाल सुप्रभ- श्रुतिस्मृतिमें निरूपित तत्त्वरूपी दूर्वादलोंसे सुशोभित. प्रयाणकाल- मृत्युसमय. प्ररूढ- पूर्णरूपसे ढका हुवा, सभी ओरसे आच्छादित, आवृत्त.
प्रलयवात-प्रलय कालका बवंडर. वायुका उमड आना, बवंडर जन्य विनाश. प्रलयसत्र-विश्व-संहारका यज्ञ, संहारकाल, विनाशकाल. प्रलयांबु-विश्व संहारकालीन महापूर, जब पानी समूचे विश्वको डूबो देता है. प्रलोभन-लालच. प्रवचन-वेदांतव्याख्या, जीवनकी गूढ समस्याओंको भलीभांति समझा देना. अपने हृदयके भावको जगदंतर्यामी सर्वात्मक देव तक पहुंचा देना. प्रशंसा-गुणगान, स्तुति, स्तवन करना. प्रसाद-अनुग्रह, दया, जो वस्तु प्रसन्नतासे देवता या गुरुजनोंसे छोटों को मिलता है. नैवेद्य लोगोंमें बांटना. प्रहर-तीन घंटे, दिनके आठ भागोंमें एक. प्राग्ज्योतिकी आरति- आत्मप्रकाशसे साधककी आरती उतारना. प्रांजल-सरल, प्रामाणिक. प्राण-देहजीवित, पंचप्राण, आकुंचन प्रसरणके कारणरूप शक्ति, शरीरजन्य वायुतत्व, समाधि साधनेके लिये जिसका नियमन करना पडता है, श्वास प्रश्वास शरीर जन्य सभी शक्तियोंका मूलस्रोत, जीवन, प्राणि-जिसमें प्राण है वे सारे जीव. प्रायश्चित्त-पापक्षालनके लिये किया जाने- बाला कर्म. प्रेम, प्रीति-स्नेह, भक्ति, चाव, आत्मीयता. प्रेरणा-प्रवृत्त करना, किसी कार्यमें स्फूर्ति देना. प्रौढ- गंभीर, दृढ, गूढ, विचारपूर्वक कार्य करनेवाला. फ फल-कर्मजन्य विविध परिणाम. फलाशा-अपने कर्मके परिणामके भोगकी आशा. परिणामकी आकांक्षा.
प. छ. २ ११३ परिशिष्ट ६