ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(कर्म) फलसंयोग-कर्मसे उसके परिणामोंको जोड़ देना. फुरहर-स्फूर्त, स्फुरण, उद्भूत, निकलना निष्पन्न होता. फुरसै-रेंगनेवाला एक जहरीला जंतु जो काटनेसे बडा कष्ट होता है, कभी कभी आदमी मर भी जाता है. ब बछनाग-एक प्रकारका जहर, जो पहले मीठा लगता है. बंजर-ऊसर भूमि. बंधनवार-तोरण, घरके दरवाजेके चौखटमें घरके सामने फूल पत्तियां आदि बांधकर सजाना. बद्ध-बंधा हुवा, बंधित, बंदी. बहुधाकार अनेक आकार प्रकार. बहुश्रुत-जिसने बहुत सुना हो, अनेक विषयोंका जानकार. बहेलिया-व्याध, चिडियामार, क्रूरकर्मी. बाह्यावर्ती-बाहरका, बहिरंग, बिजुका-पशु पक्षियोंको डरानेके लिए खेतमें खडी की जानेवाली काली हांडी. बिंदु-शून्य, बिल्लौर- स्फटिक, पारदर्शक पत्थर, स्वच्छ शीशा. बीज-धर्म, रहस्य, बीजशक्ति, प्रत्येक प्राणि- मात्रके विषयमें जो ईश्वरी-संकल्प है वह, प्रेरणा. प्रत्येक मानवी शक्ती तथा मानवमें स्थित दैवी शक्तीकी छिपी संभावना, चिदाभास, चेतनास्पर्श. बुद्धि- विवेकशक्ति, समझ, आत्मौपम्य बुद्धि. भेद-बुद्धि, मनोबुद्धि, ममत्व-बुद्धि योग-बुद्धि, व्यवसा- यात्मिका-बुद्धि, समत्व-बुद्धि, सांख्य-बुद्धि, स्थिर-बुद्धि, हत-बुद्धि हीन-बुद्धि, आत्माभिमुखबुद्धि, भावना, वृत्ति, प्रकृतिगत बुद्धि- तत्त्व, आकलनशक्ति, कल्पना- शक्ति, चिंतनका इंद्रिय, समर्पण- बुद्धि. बुद्धिनाश- संशयाकुल बुद्धि अस्थिरबुद्धि, स्वार्थाभिमुखबुद्धि, परमात्मविमुख बुद्धि, ये हतबुद्धिके, बुद्धिनाशके लक्षण. बोध- आकलन, ज्ञानकी जागृति, अनुभूतिजन्य ज्ञान. बोधार्क- बोधरूपी सूर्य. ब्रह्म- बृहत् बडा, इतना बडा और कुछ भी न हो, सर्वव्यापक, जगतका मूलकारण परमात्मतत्व, सगुण ब्रह्म, जो ईश्वरार्पण बुद्धिसे कर्म करता है, कर्मोहंताका नाशक निर्गुण ब्रह्म सर्वव्यापक बनकर सोऽहंभावका शान्त आनंद, देता है. ब्रह्मानंद- ब्रह्मानुभूतीका आनंद, सोऽहं- भावका आनंद, तत्वमसिक्रा आनंद, ब्रह्मसमरसैक्यका आनंद. ब्रह्मकर्म- अध्ययन अध्यापनादि ज्ञानसा- धनाके ब्राह्मण कर्म, शांति क्षमादि शमदमावि ब्राह्मणोंका ब्रह्मकर्म है. ब्रह्मचर्य- ब्रह्म जिज्ञासा तथा ब्रह्मचिंतनसे उसी उद्देश पूर्तिकाके लिये की जानेवाली सर्वेंद्रियसंग्रमपूर्वक ध्येयनिष्ठ एकात्म साधना, अनन्य भक्ति, ब्रह्मगोलक- ब्रह्मांड. ब्रह्मरंध्र- योग सामर्थ्यसे जहांसे प्राण बाहर ले जा सकते हैं वह गुप्त छिद्र. जो मस्तकमें-तालूमें- रहता है ब्रह्मस्थान- सहस्रदल कमल सहस्रार चक्र. भ भक्त- ईश्वरका भजन करनेवाला, ईश्वरसे निष्काम प्रेम करनेवाला, ईश्वरो- ज्ञानेश्वरी २१४