ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपासक, भक्तके गुणोंका उपासक, आर्तभक्त, जिज्ञासुभक्त, अर्थार्थी भक्त, ज्ञानी भक्त, भक्तभावभुवनदीप- भक्तके प्रेमरूपी घरका दीपक. भक्तानुग्रह- भक्तपर अनुग्रह, भक्त वत्सलता. भक्ति- ईश्वरसे निस्सीम और निष्काम प्रेम, ईश्वरोपासना, अनन्य- भक्ति, पराभक्ति, अव्यभिचारी भक्ति, अद्वैतभक्ति, सहजभक्ति, श्रवणभक्ति, कीर्तनभक्ति, स्मरण- भक्ति, पादसेवनभक्ति, अर्चन- भक्ति, वंदनभक्ति, दास्यभक्ति, सख्य आत्मनिवेदनभक्ति. भर्ता- भरण-पोषण करनेवाला, भार वाहन करनेवाला, सहायक. भवतरु, भवद्रुम- संसाररूपी वृक्ष. भवद्रुमबीजिका-- संसार वृक्षका बीज. भवभंवर-- संसाररूपी भंवरा संसारका चक्कर. भवेभ कुंभभंजनं-- संसाररूपी हाथीका मर्मस्थल, गंडस्थल भेद करनेवाला. भातुक- मूल ज्ञानेश्वरीका मराठी शब्द. खाना, खानेकी वस्तु, मिठाई. भानु- सूर्य. भाव- स्थिति, अस्तित्व, भक्ति, श्रद्धा, कल्पना, अभिप्राय, वस्तु, पदार्थ भावार्थ गूढार्थ, अष्ट-सात्विक-भाव, अनन्यभाव, अहंभाव, धर्म-भाव, नम्रभाव, ब्रह्म-भाव, मूढ भाव, शिष्य भाव, सहज-भाव, स्वभाव तात्पर्य, आविर्भाव, पूर्वजन्मकृत संस्कार अन्य-भाव, तत्त्व, ब्रह्म. भावना- बुद्धिकी वह अवस्था अभ्याससे जो छीजगयी हो, सगबगा गयी हो, चित्तवृत्ति, मनकी एक शुद्ध अवस्था, आदि. भावशुद्धि- अंतःकरण शुद्धि. भास- अस्पष्ट दीखना, अल्पसा दीखना, झलकना, थोडे समयके लिये दीखना, भ्रमात्मक संवेदना. भास्कर- सूर्य. भुवनोद्भवारंभस्तंभ-स्वर्ग मृत्यु आदि भुवनोंकी उत्पत्तिका आधार स्तंभ भूतचतुष्टय- भूत=प्राणिमात्र भूत+चतुष्टय चार प्रकारके प्राणि, उद्भिज, स्वेदज, अंडज, जारज, इसे योनिचतुष्टय अथवा भूतचतुष्टय कहा जाता है, या पृथ्बी, आप, तेज, वायु, आकाश नही दीखता इसलिये अस्वीकार्य. भूतभावना- भूत अथवा जगतकी कल्प- नाका आश्रय, भूतोंका रक्षण करनेवाला. भूताभास- जगतका आभास. भेद- प्रकार, रहस्य, क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ भेद, बुद्धिभेद, भंग, तोड गिराना, अंतर भिन्नता. भेदाभेदवतम- भेद अभेदका अंधःकार. भोक्ता- भोगनेवाला, भोगनेका अधिकारी. भोक्तृत्व- भोगना, अनुभवना. भोग- सुखदुःखानुभव, कर्मफलभोग, ऐहिक पारलौकिक. विषयभोग, राज्यापभोग ऋद्धि सिद्धीके योग- भोग, आध्यात्मिक आनंद भोग. भ्रूलता-भौवें. म मकरंद-मधु, शहद. मकारांतसोपान, - योगमार्गका आज्ञाचक्र मख,-यज्ञ. मंगलमणिभिधान-कल्याणरूपी रत्नोंकी खान मज्जा-शरीरगत धातुविशेष. मठ- मटका. मणिज- अंडज, अंडोमेंसें उत्पन्न होनेवाले जीव मद-गर्वातिरेक, उन्मत्तता, उन्माद, धुंध प. छ. ३ २१५ परिशिष्ट ६