भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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मदत्रय- कुलमद, विद्यामद, धनमद. मंत्र-युक्ति, विशेषशक्तिसंपन्न ऋषिमुनियोंका वाक्य, यशका प्रेरक विचार वेदमंत्र मदांध-मदके कारण अंध, मदमें चूर मंदराचल-मंदार पर्वत मध्यमा- सुषुम्नानाडी, चार वाणियोंमें कंठस्थ तीसरी वाणी. मध्यमा मध्यविवर - सुषुम्नानाडीके बीचमेंसे. मनपवनखिलौना - मन और प्राणनिरो- धका खिलौना . मन- संकल्प कल्प करनेवाली शक्ति, अंतःकरण सामान्य, इंद्रिय व बुद्धिके बीचका जोड, विका- राश्रय, मननकारी, मन+बुद्धि चित्त,चित्तका विकाराश्रित घटक. मनशुद्धि- मनकी निर्मलता, चित्तशुद्धि. मनसोक्त- यथेच्छ, स्वैर विहार. मनौती-मन्नत, मानना, देवपूजा. ममता- अपनापन, प्रेम, वात्सल्य, कर्मसंग, परिग्रहका अपनापन. मरगज- एक प्रकारका रत्न, हरे रंगका. मलत्रय- आणवमल, माथामल, कार्मक- मल इन मलोंके कारण अनेक- त्वका आभास होता है. महज- केवल. महदहंबुद्धि-महत्+अहं+बुद्धि. महदाकाश-महत्तत्वका विश्रांतिस्थान, जहां महत्तत्व लीन होता है वह. महादिक- शरीरमें महत्तत्वसे स्थूल शरीरतक महार्णवसिंधु- मोहरूप समुद्र जो लहरें मारता रहता हैं. महाकालकाल जो महाकालका भी काल है. महातेजमहार्णव-महान तेजका महासागर. महोदधि- महासागर. मांझी- नांव खेनेवाला मल्लाह,. माझा- मूल ज्ञानेश्वरीका मराठी शब्द, अर्थ मेरा, प्रासके लिये अनिबर्य होनेसे लिया गया है.

मात्रात्रय- ॐ अ, उ, म्. माया- आभास निर्माण करनेवाली ईश्वरीशक्ती, अज्ञान, जीवोंका अंधार, अविद्या, अज्ञान. मारुत- वायु. जब प्राणवायु निकलकर गगनमें विलीन हो जाता है उस स्थितिमें कुंडलिनी मारुत कहलाती है. मिस- निमित्त, बहाना. मीलनोन्मीलन-खुलना रुकना बारबार खोलना और बंद करना. मुकुल - कमलकली. मुदित-प्रसन्न. मुद्री- मूल मराठी शब्द, प्रासके लिये लिया गया. मुद्रिका अंगूठी. मुमुक्षु- मोक्षकी इच्छ करनेवाला. मूर्धन्य- मस्तक, मूर्धन्याकाश- मस्तककी रिक्तताम. मेखला- कटिसूत्र, कमरबंध. मेघ- यज्ञ. मेधा- बुद्धि, धारणाशक्ति, स्मरणशक्ति. मोक्ष- संतिम पुरुषार्थ तिरालंब शास्वत आनंदकी स्थिति, जीवन-मोक्ष, मरणोत्तर मोक्ष, देहरहित परिशुद्धि, ब्रह्मनिर्वाण मोघ- पाप. मोह- भ्रम, कर्त्तव्यनिर्णयमें आसक्ति- जन्य मोह, स्वर्ग नरक सुकृत-दुष्कृ- तादि द्वंद्वजन्य मोह, कर्तव्य-पराङ्- मुखताका मोह, अनिश्चय या स्वधर्म त्यागका संस्कारजन्य मोह, पापकारी मोह, भूतवैषम्यजन्य मोह; मानवोंमे ईश्वरका ग्रहण न करने देनेवाला मोह, तमरूपी जडताजन्य मोह, भेदबुद्धिजन्य मोह, ऐसे अन्य अनेक प्रकारके मोह वासनाओं के कारण होते हैं.

ज्ञानेश्वरी २१६