भारतकोश
ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)

Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary

संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा

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य यजन- यज्ञ, पूजन. यज्ञोपकरण- यज्ञके उपकरण, यज्ञके साधन. युक्तित्रय- योगका पारिभाषिक शब्द, तीन बंध, मूलबंध, जालंधरबंध, तथा उड्डियानबंध. यूप- यज्ञका एक स्तंभ. योग- कर्म-कुशलता, सिद्धांतोंको व्यव- हारमें लानेकी कला, फल वासना त्याग द्वारा. कर्ममें ही एकाग्रताका अभ्यास व तज्जन्य कर्म-समाधि, समाधिकी परिपक्वता; स्थित प्रज्ञता, ईश्वर प्राप्तिके लिये एकाग्र साधना, आत्मदर्शनोपायसाधन, आत्म- ज्ञाननिष्ठ समर्पणजन्य निष्काम कर्मयोग, यज्ञादि कर्माचरणानुष्ठान, चित्तवृत्तिनिरोध, समदृष्टि व साम्यभाव, एकाग्र चित्तसे ब्रह्मानु- संधान, समत्व भावसे ईश्वरसे जुडना, ईशत्व प्राप्तिकी सिद्धि, ईश्वर तुल्य होकर समत्व सिद्धि, योग समुच्चय कर्म भक्ति ज्ञान द्वारा आनंद प्राप्ति, ईश्वरी शक्तिका आविर्भाव, सदैव ब्रह्मानुसंधान, ब्रह्मलीन समरसता. योग-क्षेम- सर्वस्व ईश्वरार्पणकी प्रेरणा, इससे जो साधकके पास नहीं है और उसके लिये जिसकी आवश्यकता है वह परमात्म- कृपासे मिलेगा और जो उसके पास है और साधकके लिये आवश्यक है उसकी रक्षा परमात्मा करेगा यह भाव. योगाब्जिनीसरोवर- योगरूपी कमल उगनेवाला सरोवर. योगी- कर्मयोगी जो न करनेका सा करता रहता है, कर्मजन्य थकानसे मुक्त, कर्मयोगीका प्रत्येक श्वास और धडकन ईश्वरो- पासना होती है, सदैव सर्वत्र ईश्वरानुभव जन्य साम्यता और एकाग्रता इसका परिपाक है. ध्यानयोगी ध्येयसे समरस हुआ साधक, जहां ध्येय और ध्याता ऐसा द्वैत नहीं रहा, ध्येयरत ध्येय-लीन, सगुण-निर्गुण उपासक ज्ञानयोगी, ज्ञेयसें समरस हुआ ज्ञानी. सदैव सर्वत्र ज्ञेयरत ज्ञेय लीन, भक्त-योगी; नित्य भगवद्रू- पमें भक्तिरत भक्त.

र रत-तन्मय, लीन, किसीमे डूबा हुआ. रथ्योदक-रास्ते पर बहनेवाला नालोंका पानी. रव- शब्द. रविचंद्रराहुमेल- सूर्यचंद्रग्रहण. रश्मिकर- सूर्य. रश्मिजाल- किरणोंका जाला. रस- आर्द्रता, पानी, औषध, रसायन, अन्नके रुचिके छह प्रकार-षड्रस, अंतःकरणमें उत्पन्न होनेवाले वृत्तिरूप भावरस नवरस, पतला पदार्थ, पारद पांच विषयोंमें एक जिव्हाका विषय. रसाई- प्रवेश, पैठ. रसायन- भस्मादि पौष्टिक औषधविशेष. रसोईदार- रसोई बनानेवाला. रातोत्पल- लालकमल. रुतना- गढना, घुसना, रुझना. रूख- वृक्ष, पेड. रोमबीज- बालका मूल. रोमांच- अष्ट सात्विक भावमे एक.

ल लगन- प्रवृत्ति, रुचि, एकाग्रता, चाह.

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