ज्ञानेश्वरी (भावार्थ दीपिका - मूल मराठी ओव्या व हिन्दी व्याख्या)
Dnyaneshwari / Bhavarth Deepika with Hindi Commentary
संत ज्ञानेश्वर महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंलसितकंचन- तेजस्वी, सोना. लालनकील- लालन पालन करनेकी क्रीडा करनेवाला. लिंग- चिन्ह, लक्षण, आराध्यदैवत, शिवलिंग. लिंगदेहकमल- वासनात्मक तत्त्वोंसे बने लिंग देहका कमल, देह कमल. लिंग देहके वासना तत्व १७ होते हैं. पंचज्ञानेंद्रिय, पंचकर्मेन्द्रिय पंचप्राण मन और बुद्धि. लिप्त- लिपा हुआ. पुताहुवा, आसक्त. लीलना- निगलजाना. लीला-विलास- क्रीडाका विलास करनेवाला, लीला सहज क्रीडायें लुब्ध- लोलुप, मोहित, ललचाया हुवा. लुब्धक- व्याध, बहेलिया, चिडियामार, शिकारी. लेंडूक- लैंड, मलकी बत्ती. लोक- जगत, स्वर्गलोक, मृत्युलोक, पाताललोक, त्रिलोक, अथवा त्रिभुवन. अतल, वितल, सुतल, तलातल, रसातल, महातल, तथा पाताल ये सात अधोलोक और भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महा- लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक ये सात ऊर्ध्वलोक मिलकर चौदा लोक अथवा चौदा भुवन माने गये हैं. लोकाचल- ऊर्ध्वलोकोंका शिखर. लोकोत्तर- अलौकिक. व वक्त्र- मुख, वंग- कलंक, सोनेका मल. वंचना- धूर्तता, ठगी, छल. वज्रकवच- अभेद्य आवरण, वज्रकी अमेद्य पोषाक. वज्राग्नि- वज्रासन करनेके कारण मूलबंधसे उत्पन्न होनेवाली उष्णता.
वज्रयोग- वज्रासन जन्ययोग. वटांकुर- वटबीजका अंकुर. वडवानल- समुद्रके नीचे जलनेवाला प्रचंड अग्नि. वध्य- मारनेका विषय. वह्नी- अग्नि. वर्ण वपु- वर्णरूपी शरीर. वर्णाश्रम- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये चार वर्ण तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, और संन्यास, ये चार आश्रम मिलकर वर्णाश्रम धर्म कहलाता है. वसु- विभूति परिचयमें अष्टवसु देखें. वाक्पूजा- शब्दरूपी पूजा. वाग्जाल- शब्दपांडित्य. वाग्ब्रह्म- वेद. वाग्विलासिनी- वाणीकी क्रीडा करनेवाली. वाचस्पति- बृहस्पति. वांछित- जो चाहा था वही. वार्तिक- सूत्रोंपर किये गये व्याख्यान. विकर्म- भावनात्मक कर्म, विशेष कर्म, यह गीताका विशेष पारिभाषिक शब्द हैं. विकार- प्रकृतिजन्य इंद्रिय विकार, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर यह षड्विकार जन्य मनोमल. विकाराष्टक- अष्ट सात्विक भावको ही कई स्थान पर अष्ट विकार, अथवा विकाराष्टक कहा गया है. विगत विषय वत्सल- विषय वासना ओंको नष्ट करनेवालोंसे प्रेम कर- नेवाला. विचक्षण- चिकित्सक, आलोचक, विचार- वान. वितरण- बांटणा. वितृष्णा- निरिच्छा, निरपेक्षा, विदलित मंगलकुल- अशुभकुलोंको समूल नष्ट किया हुवा.
ज्ञानेश्वरी २१८